विनम्र स्वभाव से कटू सत्य तक मेरी कहानी…

0

मै एक औरत हूँ…मै एक जननी हूँ.. मै ही सृष्टी की रचनाकार..मै ही औरत हूँ..
लाचार भी हूँ और कमजोर भी, पर मत भूलो कि मैं मजबूत भी हूँ…

 

सूरज की रौशनी भी मैं, समुद्र में उठता ज्वार भी मैं। त्याग की मूरत भी मैं, आग की तपिश भी मैं। मैं वहीं औरत हूं…मै वही हूँ जिसकी अस्मत भरे बाजार लुटती है, लेकिन मैं वही हूँ जो इज्जत बचाने के लिए हाथों में हथियार उठाती हूँ। मैं वही औरत हूँ जिसकी याद में ताज महल बने, मै वहीँ जिसके नाम से शहर बसे। मैं वहीं औरत हूं…

मैं जर्रा-जर्रा हूँ लेकिन मैं ही खुद को समेट के तूफ़ान खड़ा करती हूं। मैं ही हूँ जो काली बनकर दुश्मनों पर टूट पड़ती हूँ, मैं वही हूँ जो मां बनकर सीने से लगा लेती हूँ। मैं ही वो औरत हूँ जिसकी वजह से रामायण का रण और महाभारत का कुरुक्षेत्र रचा गया। मैं वहीं औरत हूं..

मैं ही वो औरत हूँ जो अपने वतन की आज़ादी के लिए दुश्मनों पर टूट पड़ती हूं। मैं वही हूँ जिसने जौहर किया क्योंकि औरत होना ही ही मेरी ताकत है और औरत होना ही मेरी कमजोरी भी।

मैं ही हूँ वो औरत हूँ जो सियासत में अपना रुतबा रखती हूँ और वही जो हर रोज अपने पति से पिटती भी हूँ। मैं ही वो औरत हूं जिसकी आवाज पर सारी दुनिया झूमती है मैं ही वो औरत हूं जो अपनी सिसकियों को कमरे में कैद भी कर लेती… मैं वही औरत हूँ जो लाखों बच्चों के सर पर हाथ रखती हूँ, मैं वही औरत हूँ जो अपने बच्चों के रोटी के लिए लोगों की गलियां भी सुनती हूँ।

मैं वहीं औरत हूं जो आसमान में उड़ने का हुनर जानती हूं, और मैं वहीं हूं जो आसानी से समाज की बेड़ियों को भी पहन लेती हूं… मैं ही मारी भी जाती हूं और मैं ही मानी भी जाती हूं… समाज के हर जुल्म को सहती हूं.. फिर भी खुद को जिंदा रखती हूं.. इस दकियानूसी समाज की सोच, सभ्यता और संस्कृति को अपनी गोद में लिेए हुए मैं वहीं औरत हूं…

loading...
शेयर करें