बिंदास तरीके से निकलते हैं मेरे बेबाक बोल..

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हर्षिता

हो जाती हूं बेखौफ इस राह पर आकर..

आज़ादी का मज़ा आज मुझे भी मिल गया..

डरती थी, सोचती थी कि क्या आज़ाद हूं ?

इस जगह पर आज मुझे अपने सवालों का जवाब भी मिल गया…

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आज हम औरतों की आज़ादी और अधिकार और बराबरी की बात करते हैं लेकिन क्या वाकई आधी आबादी को वो समान अधिकार मिल पाया है। जब भी औरतों के अधिकार की बात होती है तो एक सीमा रेखा चिन्हित कर दी जाती है। उनके दिमाग में ये बात बिठा दी जाती है कि उन्हें वो सीमा पार नहीं करनी है।

औरतों के मन में भी चीजों को करने, बोलने, खुलकर जीने में झिझक होती है। लेकिन आज एक दौर में सोशल मीडिया ऐसा माध्यम बन गया जहां औरतों झिझकते-डरते अपने कदम रख दिए हैं। अपने बंधनों की बेड़ियों को तोडना भी शुरू कर दिया है।

इस प्लेटफोर्म पर औरते वो सब कर रही हैं जो जमीनी धरातल पर शायद करने से डरती हैं, झिझकती  हैं। सोशल मीडिया पर औरतें बिंदास अपने फोटोज अपलोड करती हैं। बेखौफ इनबॉक्स चैंटिंग करती हैं। अपने व्यक्तित्व का खुलकर परिचय देती हैं। अपनी भावनाओं को बेहद ही सरलता के साथ व्यक्त करती हैं।

देश दुनिया के मसलों पर बहस में कूदकर अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराती हैं। इतना ही नहीं सोशल मीडिया पर लाचार मजबूर दिखने के जगह एक सशक्त महिला की तरह लिखना शुरू कर दिया है। जिस भावनाओं को अपने दिल में संजो रखा था उसे पूरी दुनिया में बाँट रही हैं। अपने हौसलों की उड़ान भरने लगी हैं।

लेकिन ये रास्ता भी उतना आसान नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि यहां महिलाओं को खुलकर बोलने-चलने पर पाबंदी नहीं लगायी जाती, उनके चरित्र पर लांछन नहीं लगते लेकिन अब महिलाओं ने इस जमीन पर डरना छोड़ दिया है। पिजड़े से निकलकर आसमान में विचारना सीख लिया है। महिलाओं की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को चरित्र से जोड़कर देखने वालों की जुबान पर ताला लगाना भी उन्हें आगया है। पिंजरे में बंद चिड़िया ने आसमान का रंग देख लिया है। उसे आज़ादी का  रास्ता भी नजर आगया है..अब दोबार पिजड़े में लौटना मुश्किल होगा…

 

 

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