सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार से सीधा सवाल, जो चुनाव नहीं लड़ सकते वो कैसे बन सकते हैं पार्टी के मुखिया

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार से पूछ गए सवाल ने देश के राजनीतिक दलों की नींदे उड़ा दी हैं। सोमवार को एक जनहित याचिक की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने सरकार से पूछा है कि जो व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए प्रतिबंधित करार दिया गया है वो किसी राजनीतिक दल का मुखिया कैसे बन सकता है। ऐसा करना कोर्ट के उस आदेश का उल्लघंन है जिसमे कहा गया था कि चुनावों की शुचिता बरकरार रखने के लिए राजनीति से भ्रष्टाचार को अलग करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए दो हफ्ते का समय दिया

याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। मामले पर अगली सुनवाई 26 मार्च को की जाएगी। कोर्ट के सामने सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि दोषी पाए जाने पर कोई व्यक्ति चुनाव भले ही नहीं लड़ सकता है लेकिन वह पार्टी का गठन कर सकता है। उसे ऐसा करने से रोकने के लिए कोई कानून नहीं है।

सरकार के इस सवाल का जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा है कि ये अलग स्थिति है कि कोई व्यक्ति स्वंय तो चुनाव के मैदान में उतर नहीं सकता लेकिन वह चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों का चयन कर सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे लोग अगर स्कूल या कोई दूसरी संस्था बनाते है तो इसमें किसी भी तरीके की कोई समस्या या परेशानी नहीं लेकिन वह एक पार्टी बना रहे हैं जो सरकार चलाइएगी। अदालत ने सरकार से चुनाव प्रक्रिया की प्राथमिकता तय करने पर भी बल दिया है।

मामले पर निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार दिए जाने की मांग की है।

आयोग का कहना है कि अभी वह पार्टियों का रजिस्ट्रेशन तो करता है, लेकिन नियम तोड़ने वाली पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार उसके पास नहीं है। हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने ये भी मांग की है कि कानून में बदलाव हो, ताकि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र को सुनिश्चित करने के लिए वो गाइडलाइंस बना सके।

निर्वाचन आयोग के मुताबिक वो इसके लिए 1998 से सरकार से अनुरोध कर रहा है लेकिन इस मामले में सरकार का रवैया सकारात्मक नहीं रहा है।

कोर्ट में दागी नेताओं के पार्टी प्रमुख बनने का यह मामला बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका दायर कर उठाया था। जिसमें दोषियों के राजनीतिक पार्टी बनाने और अयोग्यता की अवधि के दौरान पदाधिकारी बनने पर रोक का अनुरोध किया गया है।

अगर कोर्ट दागी नेताओं के पार्टी प्रमुख बनने व राजनीतिक पार्टी बनाने पर रोक लगा देता है तो ये भारत की राजनीति से भ्रष्टाचार खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

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