‘इंदु सरकार’ फिल्म रिव्यू : पुराना जादू नहीं चला पाए मधुर भंडारकार

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फिल्म का नाम : इंदु सरकार

डायरेक्टर: मधुर भंडारकर

स्टार कास्ट: कीर्ति कुल्हारी, नील नितिन मुकेश , तोता रॉय चौधरी

अवधि:2 घंटा 19 मिनट

सर्टिफिकेट: U /A

रेटिंग: 3 स्टार

मुंबई। लीग से हटकर फिल्म बनाने वाले मधुर भंडारकार की ‘इंदु सरकार’ तमाम मुसीबत के बाद आखिरकार शुक्रवार को रिलीज हो गई। आज से  42 साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई गई थी। इसी इमरजेंसी बैकग्रॉउंड पर बनी फिल्म का कांग्रेस ने जबरदस्त विरोध किया। सेंसर बोर्ड ने भी काफी तांडव किये लेकिन मधुर किसी के सामने नहीं झुके और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद फिल्म पर्दे पर आ ही गई।

फिल्म की कहानी 

फिल्म इमरजेंसी पर बनी है तो जाहिर सी बात है कांग्रेस इसका विरोध करेगी ही। मधुर की इस फिल्म में 1975 से 1977 के के बीच रहे 21 महीनों के हालात को दर्शाया गया है। फिल्म इंदु सरक़ार की कहानी 27 जून 1975 के दौरान देश लागू हुई इमरजेंसी से शुरू होती है। आपातकाल के 21 महिनों को तुर्कमान गेट (पुरानी दिल्ली) के अतिक्रमण और नसबंदी को दिखाया गया है। इंदु के पति एक सरकारी मुलाजिम हैं और इमरजेंसी के दौरान अपने करियर को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

लेकिन इंदु अपनी नैतिकता और विचारधारा की वजह से अपना अलग रास्ता चुनती है। इस मधुर किसी इंडस्ट्री की काली हकीकत न उधेड़ कर वो उस हालात को दर्शाने की कोशिश कर रहें हैं। इस बार मधुर ने काल्पनिक कहानी का बहाना बनाकर इमरजेंसी के हालात दुनिया के सामने लाने की कोशिश करते नजर रहें हैं। दरअसल इंदु एक हकलाने वाली लड़की जिसकी मुलाक़ात नवीन से होती है। नवीन उससे पूछता है कि वो अपनी जिंदगी से क्या चाहती है। आखिरकार उसे उसका जवाब शादी के बाद मिलता जब नवीन की हकीकत उसके सामने आती है। जब वो देखती है कि उसके खुद का पति नेताओं एक साथ मिलाकर नियमों को ताख पर रखकर अपना फायदा कर रहे हैं। इंदु ये सब बर्दास्त नहीं कर पाती और अपने पति को छोड़कर देश हित में अलग निकल जाती है।

निर्देशन

डांस, सिनेमेटोग्राफी और कैमरा वर्क बढ़िया है। हालांकि की कहानी पर और काम किया जाना चाहिए था। इंदु सरकार में मधुर भंडारकार ने एमरजेंसी बड़ी जल्दबाजी में दिखाया गया है। तो वहीं भंडारकर पोलिटिकल व्यू रखने में निष्पक्ष नहीं रह पाए हैं। एक तरफ पार्टी के नेताओं को हद से ज्यादा बुरा बताया गया है तो वहीं इंदु जिस संस्था से जुड़ कर नेताओं के खिलाफ लड़ रहीं हैं उन्हें हद से ज्यादा बुरा बताया गया है।

फिल्म के डायलाग लिखे हैं संजय छैल ने। कभी-कभी सीन के बीच भागते नजर आये हैं। कुछ डायलाग्स को बिना वजह के हाइक किया गया है। आधी फिल्म गुजर जाने के बाद जब फिल्म दर्शकों को बाँधने की कोशिश करती है तभी एक कव्वाली आकर फिल्म का फ्लो तोड़ देती है। हालांकि इंदु सरकार को बेहतर लगती है जब वो पोलिटिक्स को पीछे छोड़ छोड़ते हुए लीड किरदार के भावनाओं को दर्शाने की कोशिश करती है।

स्टारकास्ट की परफॉर्मेंस

कीर्ति कुल्हाड़ी की परफॉरमेंस कमाल का है उन्होंने अपने कन्धों पर लीड किरदार की जिम्मेदारी बड़ी ही खूबसूरती के साथ सम्भाला है। कृति ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। इसके पहले आपने फिल्म पिंक में देखा था। अपने रोल के साथ तोता राय कृति की मदद करते नजर दिखे हैं। नील नितिन मुकेश भी अपने रोल में दमदार नजर आये हैं। अनुपम खेर का काम सहज है। वहीं तोता रॉय चौधरी के साथ-साथ सुप्रिया विनोद ने भी बढ़िया काम किया है।

संगीत

कुला मिलकर फिल्म का संगीत ठीक ठाक है।

 

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