लोहड़ी विशेष : अग्नि पूजन से दुर्भाग्य होता है दूर, घर आती हैं फसलें

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नई दिल्ली। लोहड़ी का त्योहार सर्दियों के जाने और बसंत ऋतु के आने का संकेत माना जाता है। लोहड़ी खुशियों व उमंग का त्यौहार है। माना जाता है कि लोहड़ी पर अग्नि पूजन से दुर्भाग्य दूर होते हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी दौरान फसलें कटकर घर आना शुरु होती हैं। फसल को अग्नि को अर्पित करने के लिए माना जाता है कि इससे सभी देवताओं को फसलों का भोग लग जाता है। लोहड़ी की रात को खुले स्थान में परिवार और आस पड़ोस के लोगों के साथ मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर पूजा की जाती है। आजकल तो लोगों द्वारा होटलों में लोहड़ी व पार्टी मनाने का प्रचलन भी शुरू हो चुका है।

जानिए क्यों मनाते हैं लोहड़ी

लोहड़ी मनाने के पीछे भगवान शिव व माता सती से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। मान्‍यता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि में दहन की याद में ही लोहड़ी की अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को मां के घर से इस त्योहार पर वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फल आदि भेजा जाता है। ऐसा यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति के प्रायश्चित्त के रूप में किया जाता है।

दुल्ला भट्टी की कहानी भी है प्रचलित

बादशाह अकबर के शासन काल में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं। जिनको उनका चाचा विधिवत शादी न करके एक राजा को भेंट कर देना चाहता था। उसी समय दुल्ला भट्टी नाम का एक नेक दिल डाकू था। उसने दोनों लड़कियों सुंदरी एवं मुंदरी को उनके चाचा से छुड़ा कर उनकी शादियां कीं। इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने लड़कियों की मदद की और लड़के वालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर दोनों लड़कियों का विवाह करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया।

जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी न हो सका इसलिए दुल्ले ने उन लड़कियों की झोली में एक सेर शक्कर डाल कर ही उनको विदा किया। डाकू होकर भी दुल्ला भट्टी ने निर्धन लड़कियों के लिए पिता की भूमिका निभाई।

जानिए लोहड़ी में गाए जाने वाले गीत

  •  ‘सुंदर मुंदरिये होय, तेरा कौन बेचारा होय। दुल्ला भट्टी वाला होय, दुल्ले धी बिआई होय। सेर शक्कर पाई होय, कुड़ी दे बोझे पाई होय, कुड़ी दा लाल हताका होय। कुड़ी दा सालु पाटा होय, सालू कौन समेटे होय।’
  •  ‘देह माई लोहड़ी, जीवे तेरी जोड़ी, तेरे कोठे ऊपर मोर, रब्ब पुत्तर देवे होर, साल नूं फेर आवां।

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