कस्तूरबा को छोड़ वेश्या के पास चले गए थे मोहनदास!

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महात्मा गांधी की पहचान जब किशोरावस्था में मोहनदास के रूप में थी, तब गलत सोहबत के चलते वह गलत रास्तों पर भी चले। चोरियां की, सिगरेट पी। आत्महत्या का इरादा किया। वेश्या के कोठे पर भी गए। उन्होंने ये कदम कस्तूरबा से शादी के बाद उठाया था।

पोरबंदर और राजकोट में वो दिन किशोर मोहनदास के लिए अजीब से थे, वह कुंठाओं से घिरे रहते थे। कमजोर और दब्बू से थे। उल्टी सीधी हरकतें करते थे। अपनी हर हरकत के बाद खुद को अपराधबोध से घिरा पाते थे।

मेहताब से दोस्ती और अजीबोगरीब प्रयोग
स्कूल के दिनों में मोहनदास की मित्रता और जान पहचान न के बराबर थी। शेख मेहताब उनके परिवार के बाहर का इकलौता दोस्त था। दरअसल, वह गांधीजी के बड़े भाई कर्णवदास का मित्र था। शेख मेहताब निडर और साहसी था। मोहनदास उतने ही दब्बू। वह अपने मुसलमान मित्र की निडरता और ताकत से प्रभावित थे। उसके जैसा बनना चाहते थे। मेहताब के साथ पहले उसने मांस खाने की कोशिश की, ताकि ताकत बढ़ाई जा सके। लेकिन, इसमें बुरी तरह असफल रहे। ये उनका पहला प्रयोग था।

कोठे पर भी गए थे मोहनदास

फिर मेहताब ने मोहनदास पर दबाव डाला कि उन्हें अपना पुरुषत्व देखने के लिए वेश्यालय चलना चाहिए। उसने आश्वस्त किया कि इसमें कोई बुराई नहीं है। बल्कि इस प्रयोग के बाद वह खुद को गजब के पुरुष के रूप में महसूस करने लगेंगे। इस प्रयोग के लिए पैसा मेहताब की जेब से निकला। दोनों साथ में कोठे पर पहुंचे। वहां मेहताब किसी वेश्या के साथ अलग कमरे में चला गया। किशोर गांधी को एक अन्य महिला के हवाले कर दिया।

थर थर कांप रहे थे गांधी
मोहनदास कोठे में महिला के साथ कमरे में चले तो गए, लेकिन उस एकांत ने उनके होश उड़ा दिए। वह एक कोने में सहमे बैठे रहे। एकाध बार जब उस महिला ने उन्हें हाथ लगाया, तो वह थर- थर कांपने लगे। थोड़ी देर तक जब यही स्थिति बनी रही, तो वह महिला ऊब गई। उसने उन्हें धक्का देकर कमरे से बाहर निकाल दिया।

अपराधबोध और बढ़ गया
मोहनदास यकीनन उस प्रयोग से सकुशल बच गए। लेकिन, कोठे पर जाने के इस कदम ने उनके अपराध बोध में एक और वृद्धि हो गई। अब उन्हें लगने लगा कि उन्होंने वेश्यालय जाकर अपने पुरुषत्व को चोट पहुंचाई है। चूंकि, ये कदम उन्होंने कस्तूरबा से शादी के बाद उठाया था, लिहाजा वह ज्यादा ग्लानि से भी भर उठे थे। खैर बाद में धीरे-धीरे उनकी आंखें खुलीं। उन्होंने खुद को मेहताब से दूर कर लिया।

चोरी कर सिगरेट पीते थे
मेहताब की दोस्ती से पहले मोहनदास जब हाईस्कूल में थे, तो उन्हें सिगरेट पीने की लत लग गई। अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर वह खूब सिगरेट पीते थे। सिगरेट वे अपने चाचा के यहां से चुराते थे। जब सिगरेट खत्म हो जाती, तो हरी सब्जियों के पत्तों की सिगरेट बनाकर पी लेते। कभी कभी नौकरों के पैसे चुराकर असली सिगरेट खरीद लाते। नौकरों के यहां जब ज्यादा चोरियां होने लगीं, तो दोनों अपराध बोध से भर गए। उन्होंने अपराध स्वीकार तो नहीं किया, बल्कि अपराध से छुटकारे के लिए आत्महत्या करने का फैसला किया।

जब आत्महत्या करने निकले मोहनदास
दोनों आत्महत्या करने जंगल गए। धतूरा ढूंढने लगे। फिर एक मंदिर गए। मृत्यु से पहले के संस्कार पूरे किए। उसके बाद एक सुनसान स्थान पर धतूरे के बीच खा लिए। अब वो आगे के कदम पर बहस करने लगे। वो ये सोच रहे थे कि अगर धतूरे से भी नहीं मरे तो आगे क्या करेंगे। फिर अगला सवाल मन में आया- क्या आत्महत्या करनी बहुत जरूरी है। इस सवाल पर गंभीरता से विचार करने के बाद दोनों मंदिर में पूजा कर घर लौट आए।

साभार : hindi.news18.com/ न्यूज 18 हिंदी 

 

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