लखनऊ : ठिठुरती रातों में बेघरों का दर्द बढ़ाता रैनबसेरा

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लखनऊ। करीब तीन महीने पहले झारखंड में जब आधार कार्ड की बंदिश के चलते भूख से एक बालिका मरी तो पूरा देश पसीज गया था। उसके परिवार को सरकारी राशन नहीं मिल सका था। इस पर सरकार और अफसरों की जमकर आलोचना हुई। कुछ ऐसे ही हालात लखनऊ में भी देखने को मिल रहे है। यहां रैन बसेरा में बिना आधार कार्ड वालों के ठहरने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

 

 

बेघरो को शाम ढलते ही रैनबसेरा का ही सहारा नजर आता है। लेकिन सरकार के इस फरमान के आगे बेघर, गरीब जिनके पास रहने को घर तक नहीं है वो ठण्ड में कांपने को मजबूर है। रविवार रात दर्जन भर लोग ठंड में बस स्टैंड के प्रांगण में ठिठुरते रहे। रैन बसेरा खाली पड़ा रहा, लेकिन कर्मचारियों ने उन्हें रुकने की इजाजत नहीं दी।

अभी कुछ ही दिनों पहले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में रैनबसेरों का का औचक निरीक्षण किया था। जिसमे खामियां मिलने पर जिम्मेदार अधिकारियों को फटकार भी लगाई थी।
गर्मियों में तो रात आसानी से कट जाती है मगर इस कपकपाती ठण्ड में इन बेघर लोगों का रात काटना बहुत ही मुश्किल होता है, एक एक पल भरी पड़ता है।

रुपया न होने के चलते यहां कहीं झोपड़ी भी नहीं बनवा सकता। ऐसे में रैनबसेरे में भी आसरा न मिला तो क्या करें। कुछ ऐसा ही दर्द केसरबाग चौराहे के पास गत्ते और प्लास्टिक के टुकड़े जलाकर गर्मी पाते चंद भिखारियों ने भी बताया। उन्होंने कहा कि वहां आस-पास बने रैनबसेरों में छोटे-छोटे गुट से बन चुके हैं। बाहरी को देखते ही वे सब झगड़ा और मारपीट करने पर उतारू हो जाते हैं। पुलिस से सहयोग मांगो तो वह भी टालने लगते हैं। ऐसे में खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर होना पड़ता है। डालीगंज पुल के पास बुजुर्ग महिलाओं का एक जत्था बोरी पर रात गुजारने पर मजबूर था, तन पर एक पतली सी चादर डाले ठिठुरती बूढ़ी दादी को देख कर मन पसीजना स्वाभाविक था।
रैनबसेरे में चोर उच्चके और स्मैकियों के डर की वजह से नहीं जाती है क्योंकि अगर वहां गए तो बेवजह का लड़ाई झगड़ा कौन मोल ले। हालांकि, गोमतीनगर में हुसड़िया चौराहे पर झाड़ जलाकर खुद को गर्म कर रहे रिक्शा चालकों में से एक फैजाबाद के मोहम्मद सलाहुद्दीन बताते हैं कि नगर निगम की ओर से समय रहते कभी भी लकड़ियां नहीं दी जाती हैं। कभी-कभी खानापूर्ति करने के लिए लकड़ियों की खेप मुहैया करा दी जाती है। मगर ठंड तो शाम ढलते ही रोजाना कहर ढाने लगती है। ऐसे में हम लोग यदि मदद की गुहार लगाएं भी तो उसे सुनने वाला कोई नहीं है। पता ही नहीं चलता कि हम जीने का अधिकार कब मिलेगा। वह अपना दुख बताते हुए कहते हैं कि अक्सर देखता हूं कि बड़ी-बड़ी दुकानों के सामने नगर निगम वाले अपनी गाड़ी से लकड़ियां उतार देते हैं। जो आम आदमी के लिए कम और उन अमीरों के लिए ज्घ्यादा फायदेमंद होती है। ठंड में भी गरीबों का हक छीना जा रहा है। उन्नाव के अमित गौतम बताते हैं कि रैनबसेरों में ऐसी चादर लगाई जाती है जो दस जगहों से फटी होती है। ठंड से बचना तो दूर उसमें से रिसने वाली शीतलहर कहर ढाती रहती है। किसी से कुछ कहो तो बुरा-भला सुनाने लगते हैं। ऐसे में रैनबसेरों का होना और न होना एक समान है।

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