रिसर्च: निराशा और तनाव की चपेट में आ रहे कॉलेज के बच्चे

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लंदन: ‘सेंटर फॉर कॉलीगिएट मेंटल हेल्थ रिपोर्ट’ में बताया गया है कि मौजूदा समय में कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों को एक गंभीर बीमारी अपनी चपेट में ले रही है। ये बच्चे तनाव और डिप्रेशन से ग्रसित हो रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कॉलेज में पढ़ने वाला हर पांच में एक छात्र दिमागी तनाव और निराशा की परेशानी से जूझ रहा है। यह बात वेन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किये गए एक रिसर्च में सामने आई है।

रिसर्च में कहा गया है कि मौजूदा समय में कॉलेज में पढ़ने वाले सबसे ज्यादा छात्र चिंता और निराशा यानि डिप्रेशन के लिए काउंसलिंग की मांग कर रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि कॉलेज में पढ़ने वाले के हर पांच में से एक स्टूडेंट को चिंता और डिप्रेशन की दिक्कत होती है।

वेन स्टेट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डेविड रोसेनबर्ग ने छात्रों में निराशा और तनाव की समस्या पैदा होने के पीछे के मख्य वजहें भी बताई हैं।

प्रोफेसर डेविड का कहना है कि मौजूदा दौर में तकनीक में हो रहे बदलाव, युवाओं की दिमागी परेशानी का सबसे बड़ा कारण बने हुए हैं। इसमें सबसे पहले आता है सोशल मीडिया जो कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों पर सबसे ज्यादा असर डालता है। उनका कहना है सोशल मीडिया पर पूरे समय चिपके रहने वाले बच्चे वर्चुअल दुनिया और हकीकत के बीच लगातार लड़ाई लड़ते रहते हैं। इन स्टूडेंट्स को इस बात की चिंता सताती रहती है कि उनकी वर्चुअल दुनिया पर बनाई गई छवि को कोई नुकसान न हो।

इसके अलावा अध्ययन का ये भी मानना है कि स्मार्टफोन एजडिक्शन भी छात्रों में नींद की दिक्कत, निराशा, तनाव और चिंता बढ़ाता है। एक अध्ययन कहता है कि 50 प्रतिशत कॉलेज छात्र देर रात नींद से जागकर मैसेज का रिप्लाई करते हैं।

कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई का प्रेशर, अलग-अलग एक्टिविटी करने की चिंता जैसे तमाम चीजों को झेलने के लिए अक्सर छात्र दवाइयों का सेवन शुरू कर देते हैं। लेकिन कभी-कभी ली जाने वाली दवाइयों को अक्सर लेने से बच्चों को इसकी लत लग जाती है। प्रोफेसर डेविड का कहना है कि पिछले पांच सालों में मेरे पास ज्यादातर ऐसे मामले आए जिसमें मां-बाप ने बताया कि दवाइयों के कारण उनके बच्चे में तनाव बढ़ गया है।

ऐसा देखा गया है कि बीते 20 सालों में हमारे समाज में निराश की समस्या में काफी इजाफा हुआ है। यानि मां-बाप भी ज्यादा तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में चिंता और निराशा की दिक्कत जीन्स के जरिए उनके बच्चों में आ जाती है।

कॉलेज में पढ़ने वाले कई छात्रों को घर से बाहर पढ़ने पर घर की याद और घरवालों से अलग होना बार-बार परेशान करता है। ऐसे बच्चों में चिंता और डिप्रेशन जल्दी पनपने लगता है। इसके अलावा घर से दूर रह रहे छात्रों को चिंता होती है कि अगर उनके मार्क्स अच्छे नहीं आए या फिर अगर उन्हें कॉलेज के बाद नौकरी नहीं मिली तो घरवाले क्या कहेंगे। या फिर कुछ बच्चों को इस बात कि फिक्र होती है कहीं उन्हें कॉलेज से निकलकर घर तो नहीं बैठना पड़ेगा।

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