नजरिया जो आपको बदल देगा ॥

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HIMANSHU RAWAT

हिमांशू रावत। अक्सर मै देखता हूँ गली में, चौराहे पर, चाय कि दुकान पर, नाई कि दुकान पर, समाज के अति विशिष्ट लोग चर्चा करते नज़र आते है कि जिंदगी मॆ बहुत दौड़ भाग है। बहुत कॉंपिटेशन है। आज कल नौकरी चाकरी पाना बड़ा मुश्किल है। बहुत घिसना पड़ता है। फ़िर भी कुछ हाथ नहीँ लगता और उसी के बाद वो अपना परिचय भी देते है कि मै फला फला फील्ड पर इतने समय से कार्य कर रहा हूँ और अभी तक अपनी जिंदगी में कुछ खास नहीं कर पाया हूं।

वहां बैठे युवा और उस महफिल का हिस्सा बने युवा और भी ज्यादा होशियार तुरंत ही उन महानुभावों के मीठे वचन सुनकर अपना चलता हुआ कार्य रोक कर अपने मार्ग से भटकने मॆ ज़रा भी समय नहीँ लगाते है। सब कूछ छोड़ कर चल देते है आसान पाने कि चाह में। जिसका परिणाम यह निकलता है कि न समय बचता है और न ही पैसा। घर वाले भी अपना हाथ खड़ा कर देते है और कहते है बेटा देखों मेरे पास जो पैसा और समय था दोनों ही दे दिये है,अब नही बचा है मेरे पास कुछ देने को अपने हिसाब से अब देख लो।  उस वक़्त न हम घर के होते है न घाट के और शुरू करते है कुछ ऐसा जिससे अपना खुद खर्च निकल आये। यही पहिया चलता रहता है और फ़िर यही युवा अपना अनुभव लेकर खड़े होते है उन्ही जगहो पर, जहाँ से इन्होने इस ज्ञान कि प्राप्ति कि थी।

इसी तरह से कुछ कर गुजरने वाले लोगों को भी देखा है मैने। जो ऐसी ही जगह से निकलते है और सबकी सुनते है, लेकिन वो अपने मार्ग से नहीँ भटकते और एक दिन अपनी मंजिल को हासिल कर ही लेते है। बस फर्क आप पर निर्भर है कि आप किसको किस तरह से चुनते हो, क्योंकि नकारात्मकता तो परचून कि दुकान मॆ मिलने वाली चीज़ है जो कि हर इंसान लेकर बैठा है जितना मांगोगे उससे ज्याद ही प्राप्त होगी हो सकता है मुफ्त मॆ ही मिल जाये।

अक्सर मेरी भी समाज मॆ ऐसे लोगों से भेट हो जाति है। जो कहते है कि कुछ नहीँ रखा यहां बहुत दौड़ भाग है। पैसा नहीँ है सोर्स पौवा चलता है। कुछ नहीँ हो पायगा यहां और कूछ देख लो। उसी वक़्त मुझे मेरे गुरु के कूछ शब्द याद आ जाते है कि बेटा सोर्स पॉवर पैसा आपको ऊपर तो पहुँचा सकते है, लेकिन वहाँ टिकना आप पर निर्भर है। बिना ज्ञान के वहाँ नहीँ टिक पाओगे इसलिए मेहनत करके ज्ञान कि प्राप्ति करके वहाँ पहुंचो और टिक कर दिखाओ इस नाकारात्मकता से भरी दुनियाँ को, लेकिन सवाल यह है कि ऐसा लोग बोलते क्यों है ? कूछ तो उनके साथ अनुभव होगा तभी तो बोल रहे होंगे, तो मेरे द्वारा किये गये शोध से परिणाम यह आया कि है ऐसा लोग मेहनत करते है, लेकिन सिर्फ ज़रूरत भर क्योंकि ज्याद कोई नहीँ करना चाहता।

यहाँ समान्य और सेम ऐज के लोग एक साथ अपना कार्य शुरू करते है बस अंतर उनकी दिनचर्या मॆ हो जाता है। जहाँ एक सोच का इंसान अपना घर खर्च और अपनी जरूरतों के लिये जीता है और शाम को अपने शरीर और दिमाक को थका हुआ बता कर मदिरा नामक विस को एनर्जी टॉनिक और थकावट दूर करने वाली दवा बताकर, समझौता करके, उस दौरान अपने को मनोरँजन करा कर, अपने को आराम देकर, तांडव नामक नॄत्य करके वो परमसुख कि प्राप्ति करते है और अपने कल कि शुरुआत उसी दिनचर्या से करते है।

उसी जगह दूसरी सोच वाले लोग जो अपने को और अपने काम को निखारने के लिये जीते है, जो अपना दिन और दिनचर्या नहीँ समझते। मै नहीँ कह रहा कि वो साधू ही होते है इस मामले में, लेकिन वो जो शाम से रात के सोने तक के समय को ज़रूर प्रयोग करते है, क्योंकि जिस वक़्त पहले वाले लोग अपना समय खुद को और दूसरो को मनोरँजन करने में लगाते है, वही समय यह दूसरे लोग अपने को तराशने और अपने कार्य मॆ शोध करने मॆ लगाते है और सोने के समय अपनी ज़रूरत के हिसाब कि एनर्जी टॉनिक लेकर अपनी नींद पूरी करके सूबह अपने कारवां को अंजाम देते है। बस फर्क इतना होता है कि उनके विचार और परिश्रम समाज मॆ आसानी से पहुँच नहीँ पाता। जितनी आसानी से नाकारात्मक सोच रखने वाले महानुभाव होम डिलीवरी कि सुविधा प्रदान करते है।

इसलिए मेरा सबसे अनुरोध है कि अगर आप जिक्र कर ही रहे है,तो सिक्के के दोनो पेहलुओं पर नज़र डालिये, दोनो तरफ़ कि दुनियाँ अलग है जो आपको दुनिया दिखाती है आप वही देखते है। कूछ चीजे आप खुद से तलासीये आपके रहने, कार्य करने और जीवन जीने का तरीका खुद ब खुद बदल जायगा ।

राही जब घर से चला तो कई मोड़ पाया ॥             

जब पता चला उसे सही रास्ते का ।

तब उसे एहसास हुआ कि राही तो अपनी पूरी

जिंदगी को ही उन रास्तों मॆ छोड़ आया 

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