निकाय चुनाव में इस तरह हार कर भी जीती है BJP, हैरान करने वाला सच आया सामने

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में बीजेपी की जीत सवालों के घेरे में है। क्या ये जीत उतनी बड़ी जीत नहीं है जितना बीजेपी बता रही? क्या ईवीएम से छेड़छाड़ कर ही बीजेपी को इतनी बड़ी जीत मिली है? क्या दिग्गजों के गढ़ में ही बीजेपी उम्मीदवार हारे हैं? क्या आधे से ज्यादा उम्मीदवारों  की जमानत जब्त हुई है?

बीजेपी की जीत पर खड़े हुए बड़े सवाल 

इन्ही सवालों को लेकर विपक्ष अब बीजेपी पर हमलावर है। साथ ही जो आंकड़े आये हैं वो भी हैरान करने वाले हैं। आंकड़ों के जरिए ही समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने सवाल उठाये हैं। मंगलवार को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए रामगोपाल यादव ने ये सवाल उठाये हैं। उनका कहना है कि नगर निकाय चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) भले ही अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन हकीकत कुछ और है। बीजेपी अपने ही गढ़ में बुरी तरह हारी है।

क्या बीजेपी जीत कर भी हारी है.. हैरान करने वाले आंकड़े   

उन्होंने कहा कि राज्य विधानसभा चुनाव 43 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा को नगर निकाय चुनाव में केवल 30 प्रतिशत मत मिले है। रामगोपाल ने कहा कि इस चुनाव में भले ही बीजेपी 16 में से 14 जगहों पर मेयर के पदों पर कब्ज़ा किया हो। लेकिन नगर पालिका परिषद अध्यक्ष के 198 पदों में से बीजेपी 130 जगहों पर चुनाव हार गई और सिर्फ 68 जगहों पर जीत पाई।

ऐसे ही बीजेपी नगर पंचायत अध्यक्ष पद के 438 पदों में से सिर्फ 100 सीटें की अपने नाम कर पायी। नगर पालिका परिषद के सदस्यों के लिए 5261 पदों पर चुनाव हुए जिनमें बीजेपी 4347 पदों पर हार गई और सिर्फ 914 जगहों पर जीत पाई। राम गोपाल यादव ने ये भी आरोप लगाया कि जहां ईवीएम से चुनाव कराये गए हैं वहां बड़ी मुश्किल से बीजेपी जीत पायी है।

अगर कुल आंकड़ा देखा जाए तो बीजेपी के 3,656 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है जबकि 2,366 सीट पर उन्हें जीत मिली है। इन आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो अन्य पार्टी के उम्मीदवारों की जीत की संख्या ज्यादा है। बीजेपी ने यूपी निकाय चुनाव में दूसरी पार्टियों की अपेक्षा सबसे ज्यादा उम्मीदवार खड़े किए थे। बीजेपी के 12,644 सीट्स पर 8,038 उम्मीदवार खड़े किए थे। इनमें से लगभग आधी सीट्स पर बेजीपी को हार का सामना करना पड़ा है।

इन आंकड़ों की अगर 2012 के यूपी नगर निकाय चुनाव से तुलना करें तो एसपी और बीएसपी दौड़ में शामिल नहीं थी। उस समय मुकाबला सिर्फ बीजेपी और दूसरी छोटी पार्टियों में थी।

 

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