अपने रास्‍ते खुद न बनाइए, ट्रैफि‍क नियमों का पालन कीजिए

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अजय कश्‍यप। देख रहे हैं न…। क्या-क्या कोशिशें हो रही हैं। आप तो कहते हैं कि सब चलता है। हमें क्या करना। नहीं ऐसा नहीं है…। सब नहीं चलता है…। क्‍योंकि हम चलाते हैं इसलिए सब चलता है। वरना वैसे भी चल सकता है जैसे चलना चाहिए। अब लखनऊ के ट्रैफि‍क को ही देख लीजिए। हजरतगंज हो या अमीनाबाद। दोनों भीड़ वाली जगहें। यहां ट्रैफि‍क सुधरा कि नहीं सुधरा। किसने सुधारा। आपने ही तो। बस आपने इतना किया कि नियमों को माना। जो भी व्‍यवस्‍था बनाई गई उसका पालन किया। भले ही कानून के जोर से। सजा के डर से। मौके पर सारे अधिकारी मौजूद रहते हैं। नियम तोड़ा तो न कोई जुगाड़ काम आ रहा है न कोई भौकाल।

ट्रैफि‍क सिस्‍टम बिगाड़ने का जिम्‍मेदार कौन

रामायण में समुद्र पार करने के दौरान भगवान राम के एक संवाद का जिक्र है- … बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत। तो क्या बिना डर के बात बन नहीं सकती। बननी तो चाहिए। अब ये हमारे ऊपर है। हम खुद सुधर जाएं जग अपने आप सुधर जाएगा। बस इतना ही तो करना है। अब ये शिकायत नहीं की जा सकती कि प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है। गाडि़यां हम खरीद रहे हैं। एक-एक घर में जितने सदस्य नहीं, उससे ज्यादा गाडि़यां हैं। इनमें कारें भी हैं स्कूटर और मोटरसाइकिल भी। अब चलेंगी ये सब तो उसी सड़क पर ही। जरा सोचिए, आपके घर के आसपास नया अपार्टमेंट बनता है। इसके एक फ्लैट की कीमत 50 लाख रुपए। एक करोड़ रुपए या उससे भी ज्‍यादा। क्‍या इतने महंगे फ्लैट में रहने वाले सज्‍जन के घर में एक ही गाड़ी होगी। यह निकलेगी तो सड़क पर ही न। जाम लगना स्‍वाभविक है।

ट्रैफि‍क

चलिए मान लिया गाडि़यां आपकी जरूरत हैं। तो क्या हम यातायात नियमों का पालन नहीं कर सकते। शहर के किसी भी चौराहे का नजारा देख लीजिए। ट्रैफि‍क लाइट जलने-बुझने की परवाह किए बिना हमारी गाडि़यां बेलगाम रहती हैं। हरी बत्ती जलने से पहले ही गाडि़यां आगे बढ़ चुकी होती हैं। और लाल बत्ती होने पर गाडि़यों का एक्सीलेटर तेज करके हम ऐसे चौराहा पार कर लेना चाहते हैं मानो इसके बाद हरी बत्ती जलनी ही नहीं है। ऐसे हालात अराजकता नहीं पैदा करते हैं तो क्या करते हैं। यही नजारा किसी भी रेलवे फाटक पर भी देख आम है। अपनी-अपनी तरफ की सड़क पर खड़े रहने की बजाय एक दूसरे की साइड गाड़ी खड़ी कर देना हमारी कौन सी शराफत को दर्शाता है।

नियमों को तोड़ना, उन्हें न मानना और उसके बाद पैदा होने वाले अराजक माहौल पर व्‍यवस्‍था को कोसना,  हमें जाने क्‍यों तसल्‍ली देता है। लखनऊ की बात करें तो इस नए साल में हजरतगंज, अमीनाबाद और कैसरबाग जैसे भीड़ वाले इलाकों में कुछ रास्‍तों पर वन वे लागू हुआ। नियम तोड़ने और अपने रास्‍ते खुद बनाने के आदी लोगों को कुछ दिक्कतें तो हुईं लेकिन व्‍यवस्‍था सुधरी। ट्रैफि‍क का दबाव कम हुआ। भीड़ कम हुई। जाम लगना बंद हुआ। यह सब सिर्फ इस वजह से हुआ क्यों‍कि लोगों ने नियमों का माना या ये कह सकते हैं कि नियम-कानून मानने को मजबूर हुए। कुछ दिन पहले ही हेलमेट और सीट बेल्टों को लेकर भी कानून में कड़ाई की गई। हेलमेट नहीं पहना तो मौके पर चालान की बजाय आपको हेलमेट खरीद कर पहनाया गया। इसमें लड़के-लड़कियों किसी को भी नहीं बख्शा गया। अब आप ये न कह दीजिएगा कि हेलमेट कंपनियों से साठ-गांठ के कारण ऐसा किया गया। जाहिर है हेलमेट इसलिए कि आपकी सुरक्षा रहे। कोई भी हादसा हो तो आपको हेलमेट बचा सकता है। सारी कोशिश हमारे-आपके फायदे के लिए ही तो है।

जरा सोचिए, ट्रैफि‍क के सामान्‍य नियमों का पालन करके हम अपना कितना फायदा कर सकते हैं। जाम नहीं लगेगा तो समय बचेगा, पेट्रोल-डीजल की बचत होगी, मानसिक उलझनों से बचेंगे, बीमारी या बीपी से दूर रहेंगे। प्रशासन ने अपनी सारी कोशिशें की हैं। हेलमेट, सीट बेल्‍ट, वन-वे, बैरीकेडिंग, टैफि‍क सिग्‍नल आदि सारे नियम-कानून लोगों के फायदे के लिए हैं। बिना किसी अतिरिक्‍त प्रयास के हम इनका पालन कर सकते हैं। अगर ऐसा किया तो यकीन मानिये यातायात संबंधी परेशानियां दूर हो जाएंगी। चालान या जुर्माना जैसा बुरा लगने वाला शब्‍द सुनने को कम मिलेगा। और हां, जाम के लिए अतिक्रमण को दोष देना अभी ठीक नहीं है। क्‍योंकि वो भी तो हम-आप ही करते हैं या करवाते हैं। हम आपमें में नेता भी हो सकते हैं, अफसर भी।

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