अयोध्या विवाद मामले में आया नया मोड़, रामजन्मभूमि पर बौधिष्ठों ने ठोंका दावा

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लखनऊ। अयोध्या विवाद मामले में नया मोड़ आया है। रामजन्मभूमि परिसर पर बौद्धों ने ठोका है। बिहार से आए दो वृद्ध बौधिष्ठों ने राममंदिर के समतलीकरण के दौरान मिले प्रतीक चिन्हों को सावर्जनिक करने की मांग करते हुए रामजन्मभूमि पर अपना दावा ठोका है। जिसके लिए बिहार से अयोध्या पहुंचे अखिल भारतीय आजाद बौद्घ धम्म सेना संगठन के भंते बुद्घशरण केसरिया ने सोमवार को कलेक्ट्रेट परिसर में आमरण अनशन शुरू कर दिया। दोनों बौद्धों की मांग है कि प्राचीन मूर्तियों, प्रतीक चिन्हों को सार्वजनिक करे।

उनका कहना है कि अयोध्या में बन रहे राममंदिर निर्माण हेतु चल रहे। समतलीकरण के दौरान बुद्घ संस्कृति से जुड़ी बहुत सारी बुद्घ मूर्तियां, अशोक धम्म चक्र, कमल का फूल एवं अन्य अवशेष मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान अयोध्या बोधिसत्व लोमश ऋषि की बुद्घ नगरी साकेत है। उन्होंने कहा कि अयोध्या मुद्दे पर हिंदू-मुस्लिम एवं बौद्घ तीनों पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। लेकिन सारे सबूतों को दरकिनार कर एक तरफा फैसला हिंदुओं के पक्ष में राममंदिर के लिए दे दिया गया।

इसके लिए उनके द्वारा राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट, अध्यक्ष राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सहित जिले के डीएम सहित अन्य अधिकारियों को पत्र भेजकर अपनी मांग मुखर की है।रामजन्मभूमि पर इससे पूर्व भी बौद्घ समाज दावा करता रहा है।

आपको बता दें, साल 6 मार्च 2018 अयोध्या के ही रहने वाले बौद्ध विनीत मौर्य ने बौद्ध समुदाय की तरफ से सुप्रीस कोर्ट में याचिका दायर की थी। बौद्ध विनीत ने अपनी याचिका में कहा था कि बाबरी मस्जिद बनाए जाने से पहले वहां बौद्ध समुदाय का स्मारक था। बौद्ध समुदाय ने दलील दी थी कि भारतीय पुरातत्व विभाग ने विवादित भूमि पर चार बार खुदाई करवाई है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश के बाद 2002-2003 में वहां अंतिम बार खुदाई हुई थी। भारतीय पुरातत्व विभाग ने उस जगह पर खुदाई में बौद्ध धर्म से जुड़े स्तूप, दीवारें और खंभे भी पाए थे। उनका दावा था कि विवादित भूमि पर बौद्ध विहार था। आगे उन्होंने कहा वह बौद्ध समुदाय के सदस्य हैं। वह अयोध्या में बौद्ध धर्म के अनुसार जीवन यापन कर रहे हैं। बौद्ध धर्म के लोगों के साथ न्याय हो, इसलिए उन्होंने याचिका दायर की है।

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