अलीगढ़ की स्टोरी पढ़कर चौंक जाएंगे, खुद देंगे 5 स्टार

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फिल्म का नाम: अलीगढ़
निर्देशक: हंसल मेहता, प्रोडक्शन: इरोज एंटरटेनमेंट, कर्मा पिक्चर्स
स्टार कास्ट: मनोज वाजपेयी, राज कुमार राव, डिलनाज ईरानी, आशीष विधार्थी
रेटिंग: 4/5

अलीगढ़

अलीगढ़ का फिल्म रिव्यू

मुद्दा आधारित फिल्में बनाने के लिए मशहूर निर्देशक हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ आज रिलीज़ हो गई है। ये एक सच्ची घटना पर आधारित है, जिसके बारे में उनका कहना है कि इसमें अकेलेपन का चित्रण है। इस फिल्म में अभिनेता मनोज वायपेयी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस का किरदार निभाया है, जिन्हें समलैंगिक रुझान के कारण नौकरी से निलंबित कर दिया जाता है।

कहानी
फिल्म में मनोज वाजपेयी ने प्रोफेसर सिरास का रोल निभाया है। सिरास की जिंदगी उस वक्त बदल जाती है, जब कॉलेज के स्टाफ मेंबर्स सिरास को एक आदमी के साथ संबंध बनाते हुए पकड़ लेते हैं। इस घटना के बाद सिरास को नौकरी से निकाल दिया जाता है और उन्हें हर जगह बेइज्जती झेलनी पड़ती है। इस मुश्किल वक्त में उनका सहारा बनता है जर्नलिस्ट दीपू (राजकुमार राव) जो इस केस की छानबीन करता है। इस दौरान वो सिरास का खास दोस्त बन जाता है।
एक्टिंग
फिल्म में मनोज बाजपेयी ने बेहतरीन अभिनय करके अपने उन आलोचकों को करारा जवाब दिया है, जो उनकी पिछली एक-आध फिल्म फ्लॉप होने के बाद उनके कॅरियर पर सवाल उठा रहे थे। प्रो. सिरस के किरदार की बारीकी को हरेक फ्रेम में आसानी से देखा जा सकता है। यूनिवर्सिटी द्वारा सस्पेंड होने के बाद अपने फ्लैट में अकेला और डरा-डरा रहने वाले प्रो. सिरस के किरदार में मनोज ने लाजवाब अभिनय किया है। एक साउथ इंडियन जर्नलिस्ट के किरदार को राज कुमार राव ने प्रभावशाली ढंग से निभाया है। एडवोकेट ग्रोवर के रोल में आशीष विद्यार्थी ने अपने रोल में ऐसी छाप छोड़ी है कि दर्शक उनके किरदार की चर्चा करते हैं।
डायरेक्शन
शाहिद और सिटीलाइट्स जैसी फिल्में बनाने वाले हंसल मेहता ने इस फिल्म में भी अपनी सिग्नेचर स्टाइल को कायम रखा है। ऐसी ब्रेव फिल्म बनाने के लिए हंसल तारीफ के हकदार हैं। फिल्म में एक ही कमी है और वो है इसकी धीमी गति। करीब दो घंटे की इस फिल्म की लंबाई और कम की जा सकती थी। फिल्म में ऐसे कई सीन्स हैं, जिन्हें हटाया जा सकता था। खासकर सिरास के अकेलेपन को दिखाने वाले सीन्स।
म्यूजिक
ऑफबीट फिल्मों में गानों की गुंजाइश कम ही रहती है। ऐसी फिल्मों में बैकग्राउंड म्यूजिक की अहमियत अहम होती है। अलीगढ़ का बैकग्राउंड म्यूजिक दिलो-दिमाग में प्रभाव छोड़ता है। कहानी की डिमांड के मुताबिक फिल्म में लता मंगेशकर के गाए गानों को जगह दी है, जो प्रभावशाली है।
देखें या नहीं
अगर आप मनोज वाजपेयी के फैन हैं और आपको ऑफबीट फिल्में पसंद हैं तो ये फिल्म देखने जरूर जाएं। फिल्म आपको निराश नहीं करेगी।

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