आरक्षण से राष्ट्र को नुकसान

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आरक्षणराजीव गुप्ता।
आरक्षण का दंश अब भारत के लिए एक बहुत बड़ा नासूर बनता जा रहा हैं। यह राष्ट्र को जितनी क्षति पहुंचा रहा है और उसकी छवि ख़राब कर रहा है उससे ज़्यादा भारत के आने वाले भविष्य और सपूत जो कि अपनी बौद्धिक क्षमता से अपने प्रदेश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सम्पूर्ण राज्य करने का जो उत्साह है, वह उत्साह आत्महत्या में तब्दील होता जा रहा है। जाट आरक्षण आंदोलन में जो राष्ट्र की संपत्ति का नुकसान हुआ है उसकी भरपाई एक बार फिर आम जनता को कर अदा करके पूरी करनी पड़ेगी। समझ से परे है कि क्‍या हो रहा है। क्या हम भारतीय शुरू से ऐसे ही थे कि भीख मांग के खाने वाले नरभक्षियों की तरह आरक्षण की आड़ में जंगल राज पैदा करना।

देश की संपत्ति के साथ आम पब्लिक की संपत्ति को नष्ट करना मात्र ये दर्शाता है कि हम राजनैतिक और देश की व्‍यवस्था को चुनौती देकर उन्हें मजबूर कर देंगे। अपनी मांगों के प्रति मुझे फिल्म का वो सीन याद आता है जिसमे खलनायक एक चाकू की नोक पर नारी की इज़्ज़त लूटने पर उससे विवश करता है और एक फिल्म में बाप को बच्चे की धमकी देकर उससे नाजायज़ काम कराता है। आज जो सरकार की हालत दिखाई दे रही है वो उसी नायिका और बच्चे के बाप की तरह दिखाई दे रही है, इधर कुँआ उधर खाई। कब तक राजनैतिक लोग अपने फायदे के लिए इस तरीके के अव्वल दर्जे के घटिया पैतरे अपना कर राष्ट्र को नुकसान पंहुचाते रहेंगे।

आरक्षण के कारण काबिलियत दम तोड़ रही

मुझे लगता है कि इन राजनैतिक लोगों को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।  इनके परिवार का कोई सदस्य ऐसे आरक्षण के दंश में फंसना चाहिए और आरक्षण के कारण अपनी क़ाबलियत का गला घुटते हुए और आत्महत्या होते हुए देखेंगे, शायद तब ही इन लालचियों का राष्ट्र के प्रति प्रेम जागेगा।  हालांकि राष्ट्र के कई न्यायालयों में आरक्षण जैसे दंश पर अपनी कई महत्वपूर्ण टिप्‍पणियों की है। परन्तु भारत का एक बहुत बड़ा बौद्धिक वर्ग क्यों इस विषय पर नहीं बोलता है ये समझ से परे है। जबकि वह ये जानते हैं कि यह भष्मासुर की आग है। इसमें एक दिन उसे भी जलना पड़ेगा। फिर भी वह अपनी आवाज़ व मांग न तो किसी प्लेटफॉर्म पर उठा रहा है और न ही राजनैतिक दलों को उनकी मनमानी रोकने का प्रयास कर रहा है।

दुनिया भर के कार्टून और मैसेज तो हमें मिलते हैं पर इसको रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं। ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। मुझे लगता है कि एक बौद्धिक लोगों को इस विषय पर चिंतन करके ठोस कदम उठाना चाहिए और न्यायालयों के माध्यम से राज्य और केंद्र सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। हर शहर के विधायक सांसद के साथ न्यायालयों से भी मदद लेनी चाहिए। मेरे हिसाब से अब समय आ गया है कि इस कैंसर रुपी बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए आवाज़ उठाई जायें। मेरा मानना है कि आरक्षण केवल इन लोगों को मिलें ।
1. आर्थिक आधार पर हर गरीब को, चाहे वो किसी जाति धर्म का क्यों न हो ।
2. हर अपंग(दिव्यांग)को ।
3. हर अनाथ को ।
4. देश के लिए शहीद होने वाले बच्चों को।

(यह लेखक के निजी विचार हैं )

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