उर्जित पटेल कौन होते हैं……..खर्च का ब्यौरा लेने वाले!

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आरबीआईदेवेश सिंह।

जी हां, उर्जित पटेल कौन होते हैं, शादी में खर्च का ब्यौरा लेने वाले? शादी के लिए बैंक से 2.5 लाख रूपये निकालने के लिए आरबीआई की ओर से जो शर्तें रखी गई हैं वह न तो जायज हैं और न ही व्यवहारिक। शायद ही इन्हें कोई पूरा कर पाए। आरबीआई पहले उन धन्नाशाहों का ब्यौरा ले, जिनके यहां शादी समारोह में 50 लाख रूपये फूलों पर खर्च कर दिये जाते हैं। हफ्ते भर तरोताजा रहने वाले यह फूल स्विट्जरलैंड से मंगवाये जाते हैं, भले समारोह अगले दिन समाप्त हो जाए। पांच सितारा होटलों व बड़े-बड़े फार्महाउसों में होने वाले शादी समारोह में करोड़ों रूपये एक रात में स्वाहा हो जाते हैं। आरबीआई को पहले ऐसे पूंजीपतियों व राजनेताओं का ब्यौरा तलब करना चाहिए। उसके बाद आम आदमी के गिरेबान पर हाथ डालना चाहिए। क्या गारंटी है नोटबंदी के बाद ,ऐसे आयोजनों पर लगाम लगेगी? क्या सरकार या आरबीआई ऐसे धन्नाशाहों से ऐसा न करने का हलफनामा लेगी जो अपनी शानोशौकत के लिए जनता का पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं?

अजीब तामाशा बनाकर रख दिया है, आज लोगों को अपनी मेहनत की कमाई का जमा धन निलाने के लिए बैंको के आगे धक्के व पुलिस की लाठियां खाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। आपकी पंगु व्यवस्था ने आम आदमी को भिखारी बना दिया है। ऊपर से आरबीआई की ओर से शादी में 2.5 लाख रूपये के खर्च का ब्यौरा सौपे जाने का अजीब तुगलकी फरमान, अब क्या सरकार ऐसे ही फरमानों के सहारे चलेगी? आप कौन होते है, शादी मेंखर्च का ब्यौरा लेने वाले? यह तो सरासर व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है, जरूरी नहीं आप मेरी राय से इत्तेफाक रखें, लेकिन उनके दिल से पूछिये जिसकी बेटी की शादी सिर पर है ऐसे में वह शादी के इंतजामात ले लगे या फिर आइबीआई की शर्तों को पूरा करें।

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8 नवम्बर को बड़े नोटों पर पाबंदी के बाद, आम आदमी विचित्र स्थिति से गुजर रहा है। कालेधन के विरोध में पूरा देश सरकार के साथ खड़ा है, मैंने हमेशा इसकी मुखालफत की है। लेकिन गौर करने वाली बात है, इस मुल्क में आज भी तमाम लोग ऐसे हैं जिन्होंने आज तक न तो काला धन देखा है और न ही सफेद, वह भी बैंक के आगे लाठियां खाने के लिए मजबूर हैं, उनकी क्या खता है? उसका तो पूरा जीवन दो वक्त की रोटी के जुगाड़ने में निकल जाता है। इन्होंने आपको वोट दिया है क्या यही इनकी खता है?। कहीं न कहीं आम आदमी को लेकर सरकार से चूक हुई है, भले सरकार इसे न माने।

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कल जनता की अदालत में उसे जवाब देना ही होगा। नोट बंदी के बाद दिनों-दिन हालात बिगड़ते जा रहे हैं। गांव में स्थिति और भी खराब होती जा रही है। गरीब किसान खून के आँसू रो रहा है। हफ्ते- पन्द्रह दिन में गेहूं की बुआई नहीं हुई तो उसे जीते जी मर जायेगा। देश की 80 फीसदी आबादी गांवों में रहती है, जिन्हें ठीक से बोलना तक नहीं आता, पढ़ना तो दूर उन्हें आप किस दिशा में ले जा रहे हैं। यह एक गंभीर सवाल है।

मोदी जी! हमें आपकी नीयत पर कोई संदेह नहीं है, आपने वो करके दिखाया जिसे पिछले 70 वर्षों में किसी ने नहीं किया, लेकिन जरूरी तो नहीं हर बार जनता को ही अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़े। आज जरूरत है गांवो में बुनियादी जरूरतों को पूरा करनें की, जहां आज भी लोग कुपोषण,अशिक्षा और बेरोजगारी का दंश झेल रह हैं, आज भी तमाम गांव ऐसे है जहां अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है। भला आप कैसे इस हकीकत मुंह मोड़ सकते हैं। मोदी जी! गरीब को बेईमान समझने की भूल न करें।

मैं पूछता हूँ आपके सरकारी बैंको ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों का सवा लाख करोड़ का बकाया किस अधिकार के तहत बट्टे खाते में डाल दिया, क्या इसका वित्तमंत्री के पास है कोई जवाब? यह जनता का पैसा है आपको किसने इनका कर्जा मांफ करने का अधिकार दिया है? वहीं हजारो किसानों ने कर्ज न अदा कर पाले के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर लह है। यह दोहरे मापदंड क्यों? आपकी सरकार तो गरीबों के लिए है फिर गरीबों को ही क्यों सूली पर चढा़या जा रहा है? तमाम ऐसे सवाल आम आदमी के जहन में उठ रहे हैं जिनका उत्तर सरकार को देना होगा।

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