इलाहाबाद हाईकोर्ट जिसे चाहेगा वही बनेगा प्रमुख सचिव न्याय

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इलाहाबाद। प्रदेश में प्रमुख सचिव न्याय की नियुक्ति कर पाने में नाकामी रही प्रदेश सरकार को हाईकोर्ट की खरीखोटी सुननी पड़ी। अफसरों के मनमाने रवैये और बे-सिरपैर के जवाब से नाराज सात जजों की पीठ ने कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि एलआर प्रमुख सचिव न्याय के पद पर न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति करना हाईकोर्ट का अधिकार है। प्रदेश सरकार का नहीं। जिस अधिकारी का नाम हाईकोर्ट भेजेगा वही प्रमुख सचिव न्याय होगा। यदि सरकार किसी नाम पर सहमत नहीं होती तो कारण स्पष्ट करते हुए बताना होगा। मगर एलआर की नियुक्ति करना सरकार का अधिकार नहीं है यह अधिकार हाईकोर्ट का है। संविधन के अनुच्छेद 235 में किसी न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति का विशेषाधिकार हाईकोर्ट का है। अधिकारी का नाम हाईकोर्ट द्वारा ही दिया जायेगा।

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प्रमुख सचिव न्याय: बेंच ने की गंभीर टिप्पणियां

एलआर की नियुक्ति में कई महीनों का विलम्ब होने पर वृहद पीठ ने यह प्रतिक्रिया देते हुए गंभीर टिप्पणियां की। अदालत आईएएस अधिकारी प्रवीण कुमार के उस पत्र पर भी काफी नाराज थी जिसमें आईएएस अधिकारी ने महानिबंधक को लिखकर कहा है कि एलआर की नियुक्ति सरकार का अधिकार है। हाईकोर्ट सिर्फ न्यायिक अधिकारियों के नामों का पैनल भेजेए सरकार तय करेगी कि कौन अधिकारी एलआर बनेगा। इस पत्र पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत यह हाईकोर्ट का अधिकार है। हाईकोर्ट ही किसी न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति के लिए एकमात्र अधिकृत संस्था है।

एक माह में मांगी रिपोर्ट

लखनऊ में वकीलों और पुलिस के बीच हुए बवाल के घटना की विस्तृ जांच कर कार्यवाही रिपोर्ट के साथ हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह से एक माह में रिपोर्ट मांगी है। न्यायालय ने अवध बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव विशाल दीक्षित को कोर्ट परिसर में प्रवेश पर रोक के अपने पुराने आदेश को आज सशर्त वापस ले लिया। कोर्ट ने कहा कि यदि दीक्षित पुनः किसी भी प्रकार का अमर्यादित कृत्य करते हुए न्यायालय परिसर में पाये जायेंगेे तो उनके परिसर में प्रवेश पर लगा प्रतिबंध का पूर्व आदेश प्रभावी हो जायेगा।

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