उत्तराखंड के इस मंदिर में पहली बार दलित और महिलाओं का प्रवेश…

देहरादून। उत्तराखंड में लगभग चार सदी, यानी 400 साल तक गढ़वाल के जौनसार बावर में स्थित मशहूर परशुराम मंदिर में परंपरा के नाम पर महिलाओं और दलितों के घुसने पर मनाही थी। लेकिन समय के साथ ही यह परंपरा भी अब बदलने जा रही है। मंदिर प्रबंधन ने घोषणा की है कि ‘भविष्य में मंदिर आने वाले किसी भी व्यक्ति का स्वागत है।’ उधर उत्तराखंड के दलित कार्यकर्ताओं का कहना है कि वह लंबे समय से इस भेदभाव को खत्म करने के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। उनका कहना है कि यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। कहा जा रहा है कि पूरे उत्तराखंड में अभी भी 339 मंदिर ऐसे हैं जहां महिलाओं और दलितों के प्रवेश पर पूरे तौर पर प्रतिबंध है।

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परशुराम मंदिर के प्रबंधन का कहना है कि दलितों और महिलाओं पर मंदिर में प्रवेश पर कायम प्रतिबंध को हटाने का फैसला ‘समय में हो रहे बदलाव के साथ खुद को बदलने की कोशिश का ही एक हिस्सा है।’ प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जवाहर सिंह चौहान ने पूरी दुनिया डॉट काम को बताया, ‘यह क्षेत्र विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है और हमारे यहां साक्षरता स्तर भी बढ़ा है।

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उत्तराखंड के मंदिरों में हर वर्ग का व्यक्ति कर सकता दर्शन  

इस बीच मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा है कि राज्य के किसी भी मंदिर में वर्ग विशेष के लोगों के प्रवेश पर रोक नहीं है। कुछ मंदिरों में वर्ग विशेष के लोगों के प्रवेश पर कथित तौर पर रोक के बारे में पूछे जाने पर सीएम ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

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मुख्यमंत्री ने ये भी कहा कि राज्य के लोगों में आपसी सद्भाव की परंपरा सदियों से रही है। उत्तराखंड में हिंदुओं के सबसे बडे़ धार्मिक आस्था के केंद्रों श्री बदरीनाथ धाम और श्री केदारनाथ धाम में प्रवेश से पहले लोगों की जाति और धर्म के बारे में कोई पूछताछ नहीं की जाती है।

मुख्यमंत्री ने इस बात पर भी दुख जताया कि कुछ लोग उत्तराखंड में आपसी सद्भाव की महान परंपरा को मजबूती देने के बजाए गलत बातों का प्रचार कर रहे हैं। जिसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता।

 

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