उत्तरायणी मेला बागेश्वर की शान

बागेश्वर। उत्तरायणी मेला बागेश्वर की खास पहचान है। उत्तरायणी मेला अपने आप में इसलिए भी खास है, क्योंकि इसका सांस्कृतिक के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। हर साल बागेश्वर में उत्तरायणी मेला 14 जनवरी से शुरु होता है और करीब सप्ताह भर चलता है।

उत्तरायणी मेला 1

उत्तरायणी मेला में हुई थी अंग्रेजों की खिलाफत

साल 1929 में अंग्रेजों के खिलाफ चलाये गये प्रसिद्ध कुली-बेगार आंदोलन की शुरुआत इसी दिन हुई थी। लोगों ने सरयू-गोमती नदी के संगम पर अंग्रेजों के दस्तावेजों को बहाकर विरोध की शुरुआत की थी। इस गौरवशाली आंदोलन को मेले के दौरान हर साल याद किया जाता है, और इसी दिन सरयू बगड में विभिन्न राजनैतिक दलों और सामाजिक संगठनों के जमावड़े भी लगते हैं। यही कारण है कि यह त्यौहार पूरे कुमाऊं की भावनाओं का अनोखा प्रतीक है। सालों से चले आ रहे इस मेले के आयोजन के लिए इस बार भी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

 

उत्तरायणी मेला 2

मकर संक्रांति से सूर्य का उत्तरायण शुरु हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है, और इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाओं का विशेष महत्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करता है, लेकिन कर्क और मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से बेहद शुभ माना गया है। यह प्रवेश क्रिया छह-छह महीने के अंतराल पर होती है।

उत्तरायणी मेला 3

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, पर्व और त्यौहार यहां की संस्कृति में बसते हैं इसी को आगे बढ़ाता है बागेश्वर का उत्तरायणी मेला। हर साल मकर संक्रांति के मौके पर 14 जनवरी को ये मेला शुरू होता है। इस मेले में न केवल उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं बल्कि देश-विदेश के भी पर्यटक शामिल होते हैं। इस दौरान श्रद्धालु सरयू और गोमती नदी के संगम पर डुबकी लगाकर बागनाथ के मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करते हैं और ब्राह्मणों और भिक्षुकों को दान-दक्षिणा देकर पुण्य प्राप्त करते हैं।

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