उद्योगपति विजय माल्या से मेरी मुलाकात !

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दिनेश पाठक. 
सिर में दर्द हो रहा था. दोपहर में दफ्तर से घर आ गया. डॉक्टर ने एक गोली बताई. खाया और बिस्तर पर लेट गया. टेलीविजन देख रहा था. तभी पूरे देश की नजर में भगोड़े राज्यसभा सांसद उद्योगपति विजय माल्या से मुलाक़ात हो गई. मैं भी अचरज में था, कि देश भर में इन्हें लेकर शोर हो रहा है और ये श्रीमान मुझ नाचीज से मिलने चले आए. जरूरी खैर-मकदम के बाद मैंने हालचाल पूछा तो भड़क गए.
बोले मि. पाठक, आप को तो पता है कि मैं जो भी काम करता हूँ, ठीक से करता हूँ. यह पूरा देश जानता है.
विजय माल्या
हवाई जहाज चलाया, दिल से. खूब नाम हुआ. शराब, बियर की चर्चा करके मैं क्यों अपना समय ख़राब करूँ. यह तो आम आदमी भी पीता है और खास भी. जैसे ही चढ़ती है तो चीख-चीख कर कभी ब्रांड का नाम लेता है तो कभी मेरा. पर, क्या बताऊँ, इन बैंक वालों को. सब के सब बेवजह मेरे पीछे पड़े हुए हैं. अरे भाई, पैसा होता तो दे दिया होता. नहीं है तभी तो चुकाने की समस्या से गुजर रहा हूँ. अब मैं कोई ऐसा-वैसा आदमी तो हूँ नहीं. देश के बड़े उद्योगपतियों में गिनती होती है. हमारे अधिकारी-कर्मचारी लाखों का टैक्स देते हैं. सांसद भी हूँ. देश की तरक्की में मेरा भी योगदान है. जब मेरी कम्पनी के जहाज चलते थे, तो लोग उस पर यात्रा करने को इन्तजार भी करते थे. जानते हैं क्यों? क्योंकि हमने एयर होस्टेस ऐसी राखी थीं, कि चंद दिनों में ही मरी एयर लाइंस का नाम हो गया.
शायद ही कोई आदमी ऐसा रहा होगा, जिसने हमारे जहाज में यात्रा की हो और एयर होस्टेस की चर्चा सबसे पहले न की हो. मेरी बनाई शराब की अभी भी बड़ी पूछ है बाजार में. सुरा प्रेमियों के दिल में उतरती हैं हमारी बोतलें. शायद मैं देश में अकेला ऐसा उद्योगपति हूँ, जिसके बनाये कलेंडर पाने के लिए लोगों में बेताबी मैने देखी है. उस कलेंडर पर छपने के लिए माडल्स भी हमारे लोगों के चक्कर लगते रहे हैं. क्योंकि अगर कलेंडर में जगह मिली तो भविष्य चमकते देर नहीं लगी. देश के लिए क्रिकेट टीम खरीदी. डूब रही जहाज कंपनी डेक्कन खरीदी. मेरे मन में था कि देश की बर्बाद हो रही कम्पनी को किसी विदेशी के हाथ क्यों जाने दें? देश की शान में बट्टा न लगाने पाए इसलिए टीपू सुलतान की तलवार मैंने दो करोड़ रुपये में खरीद ली. आखिर मेरे लिए उसका क्या अर्थ है, आलावा इसके कि देश की संपत्ति थी. आजादी से लेना-देना रहा है उसका. अब व्यापार में घाटा-मुनाफा चलता रहता है. बेवजह लोग परेशान हैं. बैंकों ने अपनी कागजी कार्रवाई कर दी. इससे ज्यादा तो वे कर भी नहीं सकते थे.
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कोई गलत सूचना तो दी नहीं, जब मैं विदेश में हूँ तो यही जानकारी न देगी सरकार. लोगों को इतना भी ज्ञान नहीं है कि आज भी विदेश जाने के लिए पासपोर्ट की जरूरत होती है, जो मेरे पास था, तभी तो मैं विदेशी धरती पर आ पाया. सरकार चाहती तो मुझे वहीं गिरफ्तार करा लेती.
अब संसद चल रही है तो सत्ता पक्ष के सांसद अपना और विपक्ष के सांसद अपना-अपना काम तो करेंगे ही. अगर संसद में इस मुद्दे पर चर्चा नहीं होती. कांग्रेस के लोग मेरे विदेश जाने पर सवाल नहीं उठाते तो भी मीडिया परेशान रहती कि कांग्रेसियों ने तो संसद में मौन व्रत रख लिया. अब बेचारे बोल पड़े तो अलग तरह की परेशानी खड़ी दिखाई दे रही है. हमने कोई एक-दो करोड़ तो लिया नहीं है बैंकों से. अरे भाई दसियों हजार करोड़ ले रखा है. चर्चा तो होनी चाहिए. लेकिन मीडिया को बेवजह मजा आ रहा है. जब देश छोड़कर आ ही गए हैं तो यार चैन से जी लेने देते. दिन भर से लगे हुए हैं. अब इनके शोर करने से होगा क्या? न तो बैंकों का पैसा मिलने जा रहा है और न ही मेरी गिरफ्तारी. इन लोगों को समझना चाहिए कि दो बार से मैं राज्य सभा निर्दल ही पहुँच रहा हूँ. ऐसे तो नहीं हुआ होगा. अरे बहुतों ने मलाई काटी होगी. चुनावी चंदा हम दें. वक्त जरूरत चार्टर्ड प्लेन हम दें. शायद ही कोई ऐसा दल हो, जिसके लोगों को मैंने उपकृत न किया हो. ऐसे में नेता इतनी नमकहरामी तो नहीं करेंगे कि मैं विदेश जाना चाहूं तो वे मेरा रास्ता रोक लें. इन्हें यह भी नहीं समझ आता कि मैं कोई अकेले नहीं चला. चीख-चीख कर जब आप यह कहते हैं कि एक मार्च को माल्या संसद में थे और दो मार्च को विदेश चले गए तो इसमें कौन सी खास बात है. अपने देश में यह सब चलता है. और मैं विदेश आकर कौन सा गलत काम कर रहा हूँ. बहुतेरे लोग विदेश पहुँचने के बाद मजे में हैं, फिर क्यों न करूँ. नेताओं को तो हम समझा लेंगे, लेकिन अपनी बिरादरी को समझाओ मि. पाठक. यह ठीक बात नहीं. उनकी बातें सुनते हुए मैं असहज हो रहा था…मैंने कहा-विजय माल्या साहब, जाइए यहाँ से, मेरा जीवन क्यों नरक कर रहे हैं..तब तक पड़ी गाल पर एक जोर से..मैं चौंक कर उठा तो खुद को अपने गरीबखाने में ही पाया. लेकिन जो भी हो, विजय माल्या जी के तर्क थे बड़े मजेदार…आप भी आनंद उठाइए.
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