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ये है फिल्‍म एयरलिफ्ट का सच और असली हीरो

जोधपुर देशभर के मीडिया में फिल्‍म एयरलिफ्ट के रंजीत कत्याल के कैरेक्टर को लेकर खूब खबरें छपीं। सवाल उठे कि कौन है यह रंजीत कत्याल। इस विवादित कैरेक्टर की असलियत जानने के लिए कुवैत में एयरलिफ्ट मिशन के इंचार्ज रहे सुरेशमल माथुर ने बताया कि आखिर 1990 में 1 लाख 70 हजार भारतीयों को बचाने में रंजीत की क्या भूमिका है।

एयरलिफ्ट

एयरलिफ्ट मिशन के इंचार्ज ने क्‍या बताया

– उन्होंने कहा कि मैं 1990 में कुवैत में भारतीय एम्बेसी का सेकेंड सेक्रेटरी था। उस समय जब कुवैत पर इराक ने हमला किया तो वहां फंसे एक लाख 70 हजार भारतीयों की वतन वापसी कराना हमारी प्राथमिकता थी, लेकिन हकीकत में ऐसा कोई एनआरआई था ही नहीं, जिसने इस हमले के बाद भारतीयों की वतन वापसी में रंजीत कत्याल की तरह मदद की हो।

– माथुर के मुताबिक कि उस समय भारतीयों को वापस लाने का पूरा खर्च भारत सरकार ने उठाया था। एयर इंडिया के विमान रोजाना 6 से 8 फेरे करके जॉर्डन में बने कैंप से भारतीयों को दुबई पहुंचा रहे थे। इतने बड़े पैमाने पर चलाए गए मिशन में अहम योगदान के लिए एयर इंडिया का नाम गिनीज बुक में भी दर्ज किया गया।

– उन्होंने बताया कि मैंने कुवैत से ही नहीं, बसरा और जॉर्डन से भी भारतीयों को निकाला। कुछ लोग छोटी-मोटी मदद करने के लिए जरूर आगे आए थे, लेकिन वे केवल भारतीयों को बसों से भेजने की लिस्ट बनवाने में मदद करते थे।

– तो लोगों ने किस तरह की मदद की इस सवाल के जवाब में माथुर ने कहा, “हां, एक एनआरआई ने अपना घर दे रखा था, जहां ऑफिस बना रखा था और वहां हम डिस्कस करते थे। इनमें ऐसा कोई एनआरआई नहीं था जिसने रंजीत कत्याल की तरह मदद की हो।”

क्या हुआ था कुवैत में

कुवैत पर दो अगस्त को दोपहर चार बजे अटैक हुआ था और पूरे देश में खलबली मच गई थी। भारतीय भी अपने वतन वापसी के लिए बेकरार हो रहे थे। सुबह होते ही लोग दूतावास पहुंच जाते कि उन्हें किसी तरह भारत भेज दें। हमले के बाद से कुवैत की फोन लाइनें बंद कर ही गई थीं। केवल लोकल कॉल ही हो पा रहे थे। कुवैत पर हमला होने के 15-20 दिन बाद तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल वहां आए थे। गुजराल पहले ऐसे विदेशी पॉलिटिकल लीडर थे जिन्हें कुवैत आने दिया गया था। एम्बेसी में गुजराल ने भारतीयों की मीटिंग बुलाई। इसमें 15-20 हजार भारतीय पहुंचे थे। उनके सामने ही गुजराल ने घोषणा की थी कि उनके भारत लौटने का पूरा खर्च भारत सरकार उठाएगी। इसके बाद भारत सरकार ने एयर इंडिया की फ्लाइट्स का अरेंजमेंट किया।

जॉडर्न में बना था कैंप

एयर इंडिया की फ्लाइट कुवैत से एक हजार किमी दूर जॉडर्न से थी, इसलिए कुवैत से वहां तक भारतीयों को पहुंचाने के लिए बसों का अरेंजमेंट करने के लिए एम्बेसी ने इराक की एक कंपनी को कॉन्‍ट्रोवर्सी दिया था। रोज बसों से भारतीय जॉडर्न में बने कैंप तक पहुंचते। ये कैंप जॉडर्न सरकार, रेडक्रॉस और भारतीय एम्बेसी ने बनाए थे।

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कुवैत में तो कोई कैंप था ही नहीं।

एम्बेसी में करीब 50 अधिकारी थे। इनमें से 20 बशरा में आ गए थे और बाकी कुवैत में थे। जॉडर्न में लोग कम होने के कारण भारत और आसपास के दूतावासों से 30 अधिकारी और भेजे गए। ये ही वहां रोजाना फ्लाइट्स से जाने वालों की लिस्टिंग कर उनके डॉक्युमेंट्स पूरे कराते और एयरपोर्ट ले जाकर फ्लाइट में बिठाते। जिनके पास पासपोर्ट नहीं था, उन्हें आईडेंटिटी डाॅक्यूमेंट दिए गए। एयर इंडिया रोजाना 6 से 8 फ्लाइट जॉडर्न से दुबई ले जाती। फिर दुबई से रेग्यूलर फ्लाइट के जरिए लोग भारत पहुंचे। आईडेंटिटी प्रूफ या पासपोर्ट वगैरह कोई एनआरआई नहीं दे सकता, जबकि तब अधिकांश लोगों के पासपोर्ट कुवैत में ही रह गए थे।

क्यों उठा सवाल?

अक्षय कुमार की फिल्म एयरलिफ्ट सच्ची घटना पर आधारित बताई जा रही है। अक्षय ने खुद कई इंटरव्यू में कहा कि निर्देशक राजा मेनन उस एनआरआई से मिले भी हैं, जिसका वे रोल कर रहे हैं। यह भी कहा कि रंजीत कत्याल को नेशनल हीरो होना चाहिए था। भास्कर से उन्होंने इस विषय पर बातचीत से इंकार कर दिया। कहा जा रहा है कि वे जिस एनआरआई रंजीत कत्याल का किरदार निभा रहे हैं ऐसा कोई शख्स इस मिशन में था ही नहीं। यह मनगढ़ंत किरदार है।

 

(दैनिक भास्‍कर से साभार)

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