कम्प्यूटर गेम्स की दुनिया में आइए और घर बैठे बनिए करोड़पति

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आप खेल खेल में लाखों रुपए कमा सकते हैं। इसके लिए आपको अपने घर से निकलने की भी ज़रूरत नहीं होगी। आपको यक़ीन भले न आ रहा हो, मगर ये बात सौ फ़ीसदी सच है। दुनिया भर में हज़ारों लोग, खेल-खेल में करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। कुछ ऐसी है कम्प्यूटर गेम्स की दुनिया। अब यूक्रेन के रहने वाले अलेक्सी क्रुपनिक को ही लीजिए। उन्हें बचपन से ही कम्प्यूटर गेम्स का शौक़ था और आज वो इस शौक़ की वजह से लाखों कमा रहे हैं। नब्बे के दशक में, अपने बचपन में क्रुपनिक, ख़ाली वक़्त में कंप्यूटर गेम्स खेलते थे। ख़ुद का कंप्यूटर था नहीं, सो, क्लब में जाकर खेलते थे। जल्दी ही इसमें उन्हें महारत हासिल हो गई और साल 2003 में 23 बरस साल की उम्र में क्रुपनिक ने पहला बड़ा ई स्पोर्टिंग टूर्नामेंट जीता। इसमें उन्हें इनाम में लैपटॉप मिला। जिसकी क़ीमत थी 1430 डॉलर या क़रीब आज के 97 हज़ार रुपए क्रुपनिक के लिए ये बहुत बड़ी रक़म थी। जिससे उस वक़्त यूक्रेन में कार ख़रीदी जा सकती थी। सो उन्होंने फ़ौरन लैपटॉप बेच डाला।

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जल्द ही वो पैसे के लिए गेम खेलने लगे थे. साल 2011 आते-आते क्रुपनिक, वर्चुअल दुनिया के खलनायकों को मारकर लाखों रुपए कमा रहे थे। हर टूर्नामेंट से क़रीब 23 लाख रुपए। इसके अलावा क़रीब सवा लाख रुपए हर महीने वो अपने स्पॉन्सर्स से कमा लेते थे। ई स्पोर्ट्स की दुनिया पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि आज कंप्यूटर गेम्स में बहुत पैसा आ गया है। टूर्नामेंट जीतने पर मिलने वाली इनाम की रक़म अब करोड़ों में होती है। इसके अलावा ई-गेम्स खेलने वालों को स्पॉन्सरशिप से भी काफ़ी कमाई होती है। ई-स्पोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि कंप्यूटर गेम्स के चार टॉप खिलाड़ियों ने पिछले साल यानी 2015 में क़रीब 12 करोड़ रुपए कमाए। जबकि दूसरे छोटे खिलाड़ियों की कमाई भी लाखों में थी। ई-स्पोर्ट्स की दुनिया पर नज़र रखने वाली न्यूयॉर्क की संस्था, सुपर डेटा रिसर्च के मुताबिक़, आज कंप्यूटर गेम्स का कारोबार क़रीब 5,000 करोड़ रुपयों का हो चुका है। अगले दो सालों में यानी साल 2018 के अंत तक इसके 1.9 बिलियन डॉलर यानी क़रीब 130 अरब रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है। 2013 में ऑनलाइन या टीवी पर कंप्यूटर गेम्स देखने वालों की संख्या जहां सात-सवा सात करोड़ थी. वहीं पिछले साल, दुनिया भर में, कंप्यूटर गेम्स के दर्शकों की तादाद क़रीब 19 करोड़ तक जा पहुंची गई।

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वैसे फ़ुटबॉल या बास्केटबॉल जैसे खेलों के मुक़ाबले ये पैसा या इतने दर्शक बहुत कम हैं। मगर, ये सुनहरे भविष्य की ओर इशारा ज़रूर करते हैं। कंप्यूटर गेम्स के फैलते बाज़ार की कई वजहें हैं। दिनों-दिन वर्चुअल गेम्स खेलने वालों की तादाद बढ़ रही है। लोग इंटरनेट पर एक दूसरे से मुक़ाबला कर सकते हैं. ई-स्पोर्ट्स में शामिल होने वाले ज़्यादातर युवा होते हैं और ऐसे ग्राहकों को तलाशने वाली कंपनियां, ई-स्पोर्ट्स को बढ़-चढ़कर स्पॉन्सर कर रही हैं। सुपर डेटा रिसर्च के प्रमुख जूस्ट वान ड्रयूनेन बताते हैं कि पिछले साल, दुनिया भर में क़रीब 114 अरब डॉलर यानी कि लगभग 7800 अरब रुपए के कंप्यूटर गेम्स बेचे गए। अब आप इसी से कंप्यूटर गेम्स में आने वाली रक़म का अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज दुनिया में कंप्यूटर गेम्स खेलने वाले सैकड़ों ऐसे लोग हैं जो ख़ुद को प्रोफ़ेशनल खिलाड़ी मानते हैं। आने वाले वक़्त में ये तादाद और बढ़ने ही वाली है। हालांकि कंप्यूटर गेम्स से धुआंधार कमाई करने वालों की संख्या अभी कम ही है। ज़्यादातर खिलाड़ी अभी भी लाखों की कमाई वाली कैटेगरी में ही आते हैं. ई-स्पोर्ट्स अर्निंग नाम की वेबसाइट, ऐसे खिलाड़ियों का हिसाब-किताब रखती है। उसमें रजिस्टर्ड 500 में से 300 खिलाड़ियों ने 2015 में टूर्नामेंट जीतकर औसतन सिर्फ़ 50 हज़ार डॉलर यानी क़रीब 34 लाख रुपए कमाए। हालांकि इस बात की पूरी उम्मीद है कि जैसे जैसे गेमिंग की दुनिया का दायरा बढ़ेगा, इसके खिलाड़ियों की आमदनी बढ़ेगी।

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लेकिन, कंप्यूटर गेम्स का प्रोफ़ेशनल खिलाड़ी बनना इतना आसान भी नहीं। अपने बेडरूम या लिविंग रूम में कंप्यूटर गेम्स खेलना और बात है लेकिन, ई-स्पोर्ट्स का बड़ा खिलाड़ी बनने के लिए ज़बरदस्त प्रैक्टिस और तेज़ दिमाग़ की ज़रूरत होती है। कंप्यूटर गेम्स खेलने वाले आम लोग जहां एक मिनट में क़रीब 100 कमांड देते हैं। वहीं, प्रोफ़ेशनल खिलाड़ी एक मिनट में 350 से 500 कमांड देते हैं। लीग ऑफ़ लीजेंड्स, स्टारक्राफ्ट टू, डोटा टू जैसे बड़े ई-स्पोर्ट्स टूर्नामेंट्स में जीत के लिए, तेज़ दिमाग़, प्रैक्टिस और लगन की ज़रूरत होती है। जानकार कहते हैं कि ई-स्पोर्ट्स, हाई स्पीड में चेस खेलने जैसा है या फिर आइस हॉकी और चेस का मिला-जुला रूप भी कहा जा सकता है। आपको लगातार अपने विरोधी की हरकत पर नज़र रखनी होती है और तुरंत उसका तोड़ खोजकर जवाब देना होता है। इस खेल में कमाई का एक ही तरीक़ा है। बस जीतते जाओ, जितना जीतोगे, जेब में उतने पैसे आएंगे। अब यूक्रेन के क्रुपनिक को ही लीजिए। घर पर कंप्यूटर नहीं था, सो वो एक कंप्यूटर क्लब जाने लगे।

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वहां जीतने लगे तो दो क्लबों के मुक़ाबले में शामिल होने लगे। जीत का सिलसिला आगे बढ़ा तो वो स्टारक्राफ्ट ब्रूडवार जैसे ई-स्पोर्ट्स टूर्नामेंट में शामिल हुए और जीत हासिल की। बाद में वो ऑनलाइन गेम्स खेलने लगे और कंप्यूटर गेम्स के गढ़ दक्षिण कोरिया के कई महारथियों को भी मात दे दी। हालांकि, टॉप का खिलाड़ी बनने का सबसे अच्छा तरीक़ा ये है कि आप किसी बड़ी टीम का हिस्सा बन जाएं। टीम में रहने का फ़ायदा ये होता है कि स्पॉन्सर ख़ुद अच्छे खिलाड़ियों को तलाशते हैं और फिर उन्हें दुनिया भर में होने वाले टूर्नामेंट में खेलने का मौक़ा देते हैं, वो भी अपने ख़र्चे पर। क्रुपनिक ने 2004 में जब पहली स्पॉन्सरशिप डील की थी, वो महीने में महज़ सौ डॉलर कमा रहे थे. लेकिन, जल्द ही उन्होंने दूसरी टीम ज्वाइन कर ली और सिर्फ़ स्पॉन्सरशिप से वो सालाना 24 हज़ार डॉलर कमाने लगे। टूर्नामेंट जीतने की रक़म जो मिलती थी, वो अलग.ई-स्पोर्ट्स की सबसे ख़ास बात ये है कि ये पूरी दुनिया में खेला जा सकता है. आप अपने घर में बैठे-बैठे दुनिया के किसी भी टूर्नामेंट में शामिल हो सकते हैं. हालांकि आज भी दक्षिण कोरिया, कंप्यूटर गेम्स का गढ़ है।

मगर अमरीका, यूरोप और एशिया के दूसरे देशों में ये खेल तेज़ी से फैल रहा है. एशिया में साल 2015 में ई-स्पोर्ट्स में 312 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 2200 करोड़ रुपए का निवेश हुआ, जो अमरीका में हुए इन्वेस्टमेंट से क़रीब सौ मिलियन डॉलर या इसके एक तिहाई से ज़्यादा था। हालांकि ई-स्पोर्ट्स की दुनिया की एक कमी भी है. इसे ज़िंदगी भर के लिए करियर नहीं बनाया जा सकता। ये युवाओं के बीच ही लोकप्रिय है और कंप्यूटर गेम्स में जिस तेज़ी की ज़रूरत होती है, उस पर युवा ही खरे उतर सकते हैं। इसमें कंप्यूटर गेम्स की लोकप्रियता भी बड़ी तेज़ी से बदलती है. मान लिया कि आप किसी गेम के उस्ताद बन गए, मगर उसका बाज़ार ही ख़त्म हो गया. तो, आपकी आमदनी में भारी गिरावट आ जाएगी। बढ़ती उम्र के साथ, परिवार की ज़िम्मेदारियां आती हैं, तब आप खेल को उतना वक़्त नहीं दे पाएंगे, जितने की ज़रूरत है। अब क्रुपनिक को ही ले लीजिए, जब से पिता बने हैं, खेलना कम कर दिया है।

लेकिन, अच्छी बात ये है कि ई-स्पोर्ट्स की दुनिया में ही दूसरे मौक़े भी सामने आए हैं. ख़ुद क्रुपनिक एक ऑनलाइन गेमिंग टीवी चैनल में मैनेजर हैं। वैसे ही जर्मन कंपनी टर्टल एंटरटेनमेंट में आज की तारीख़ में 400 लोग काम करते हैं। कंपनी को 40 और लोगों की ज़रूरत है। इसमें ई-खिलाड़ियों से लेकर, टीवी शो होस्ट, मार्केटिंग, प्रोडक्शन और हिसाब-किताब देखने वाले तक शामिल हैं. यानी कंप्यूटर गेम्स न भी खेलें, तो यहां रोज़गार के तमाम मौक़े हैं। फिर क्या है…आप भी शुरू हो जाइए…देर किस बात की है…
साभार- BBC

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