कर्नाटक विधानसभा चुनाव : कांग्रेस के ‘लिंगायत कार्ड’ को बीजेपी कर सकती है कैश, जानिए कैसे

नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा चुनाव पूरा हो चुका है। इसके साथ ही राजनीतिक दलों की नजर अब चुनाव परिणाम पर है। राज्य की सिद्दारमैया सरकार ने इस बार कई बड़े दांव खेले। जिसमें लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देना सबसे बड़ा पैतरा माना गया था। कांग्रेस को उम्मीद थी कि इस दांव के साथ वह बीजेपी की कर्नाटक में मजबूत होती पकड़ को कमजोर तो करेगी साथ ही राज्य में एक बार फिर से सत्ता में काबिज होगी। लेकिन चुनाव खत्म होते-होते कांग्रेस का यह पैतरा उल्टा पड़ता साबित हुआ और लिंगायत समुदाय का बीजेपी के पाले में आ गया। ऐसे में कांग्रेस के सामने अब कर्नाटक की सत्ता बचाना कठिन दिख रहा है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव

कर्नाटक में लिंगायत समुदाय का महत्व

दरअसल, लिंगायत को कर्नाटक की अगड़ी जातियों में गिना जाता है। यहां के 18 फीसदी लोग लिंगायत समाज से आते हैं। ऐसे में लिंगायत समाज के वोट को अपने पाले में लाने के लिए राज्य के मख्यममंत्री सिद्धारमैया ने ‘मास्टार स्ट्रोंक’ खेलते हुए लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता दे दी। लेकिन भाजपा ने उसी के दांव से पटखनी देने के लिए इस बहुसंख्यक समाज को तोड़ने और धर्म की राजनीति करने का आरोप लगाया।

इसके साथ ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने एक के बाद एक ताबड़तोड़ रैलियां की। लिंगायत समाज के मठ-मन्दिर में जाकर शीर्ष मठाधीषों से समर्थन हासिल किया। जिससे कांग्रेस का यह दांव उस पर उल्टा साबित होने लगा। हालांकि सीएम सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अपने पाले में लेने के लिए कई कोशिशें की लेकिन बीजेंपी उनपर भारी साबित हुई।

बीजेपी ने सिद्धारमैया के वोट बैंक कहे जाने वाले अहिंदा (माइनॉरिटीज, बैकवर्ड क्लासेज, दलितों का कन्नड़ में शॉर्ट फॉर्म) को तोड़ने का प्रयास शुरू कर दिया है।

लिंगायत समुदाय और राजनीति का संबंध

दरअसल, 1989 में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो राजीव गांधी ने एक विवाद की वजह से चुने हुए सीएम पाटिल को पद से हटा दिया जिसके बाद लिंगायत समुदाय ने कांग्रेस का दामन छोड़कर रामकृष्ण हेगड़े का समर्थन किया। हेगड़े के निधन के बाद बीजेपी के येदियुरप्पा लिंगायतों के नेता बने। लेकिन जब बीजेपी ने उन्हें सीएम पद से हटाया तो लिंगायत फिर नाराज हो गए और बीजेपी से मुंह मोड़ लिया क्योंकि येदियुरप्पा का लिंगायत समुदाय में अच्छा प्रभाव था।
इसलिए कर्नाटक में आने वाले चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही लिंगायत समुदाय को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी ने येदियुरप्पा को एक बार फिर नेता बनाया है क्योंकि उनका लिंगायत समुदाय में जनाधार बहुत मजबूत है।

बहरहाल राज्य में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुका है और जल्द ही परिणाम घोषित होने वाले हैं। ऐसे में कांग्रेस का ये दांव उसके लिए हितकर साबित होगा या उसे एक बार फिर से बीजेपी के हाथों मात खानी पड़ेगी यह परिणाम के साथ ही पता चलेगा।

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