दवाइयों से नहीं गोबर के लेप से करिए कैंसर का इलाज

नई दिल्ली। कैंसर का नाम आते ही लोगों के चेहरे की हवाईयां उड़ जाती हैं। इलाज करवाने के बाद भी लोग यही सोचते हैं कि अब जिंदगी खत्‍म। लोगों की दवाइयां चलती हैं। कीमोथेरपी होती है। काफी अच्‍छा खासा खर्च हो जाता है। लेकिन इससे इतर कैंसर को एक चीज और खत्‍म कर सकती है। वह है गोबर। जी हां गोबर में इतनी शक्ति होती है कि वह कैंसर को हमेशा के लिए खत्‍म कर सकता है। कैंसर का गोबर से इलाज सफल भी हो रहा है।

अब दवाइयों से नहीं गोबर के लेप से करिए कैंसर की बीमारी का सफल इलाज

यूं करें कैंसर का गोबर से इलाज

देश की राजधानी नई दिल्‍ली में एक शख्‍स है जो इस तरह का इलाज कर रहा है। उसने दावा किया है कि गोबर से कैंसर को ठीक किया जा सकता है। दिल्‍ली के पंजाबी बाग में एक आयुर्वेदिक हॉस्पिटल है जो पिछले डेढ़ साल से कैंसर मरीजों का इलाज कर रहा है।

गोबर का लेप निभाता है महत्‍वपूर्ण रोल

‘गौधाम आयुर्वेदिक कैंसर ट्रीटमेंट एंड रिसर्च’ हॉस्पिटल का यह भी कहना है कि जड़ी-बुटियों के साथ गोबर के लेप और तुलसी के पानी से भी कैंसर कम किया जा सकता है। यह हॉस्पिटल देसी गाय के गोबर, मूत्र, दूध, दही, घी और जड़ी-बूटियों से कैंसर का इलाज पिछले डेढ़ साल से करता आया है। इसी हॉस्पिटल के कैंसर स्पेशलिस्ट वैध भरत देव मुरारी ने कहा कि कैंसर भले ही शरीर में दिखाई देता हो लेकिन यह रोग मन में भी होता हैं, जिस कारण इसका इलाज करना और भी ज़्यादा आवश्यक है। उन्होनें बताया कि यह कोई चमत्कारी दवा नहीं बल्कि पंचगव्य है, अर्थात देसी गाय का मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी है। जो कैंसर में अत्यन्त लाभकारी है, और साथ ही इन दवाईयों में गाय का मूत्र और गोबर अहम योगदान रखते हैं।

11 से 21 दिनों तक होता है कैंसर का गोबर से इलाज

वह ये भी दावा करते हैं कि अगर मरीज़ समय रहते इलाज के लिए आ जाए तो उसका कैंसर पूरी तरह से रूक भी सकता है। मरीज़ को हॉस्पिटल में 11 से 21 दिनों तक रखा जाता है। जिस दौरान उसका एक रुटीन सेट कर दिया जाता है, जिसमें वह सुबह के योग के साथ पंचगव्य निश्चित मात्रा में पीता है। और फिर उसके खाने में भी बदलाव कर उसे जड़ी-बूटी के साथ जौं की रोटी और हरी सब्ज़ी भी दी जाती है।

सुबह-शाम लगाया जाता है लेप

डॉ. मूरारी का कहना है कि आयुर्वेद में कहीं कैंसर का नाम नहीं है, वह इसे गांठ कहते है। मरीज़ की इसी गांठ पर सुबह-शाम लेप लगाया जाता है, जिस पर सूरज की किरणों का पड़ना आवश्यक होता है। हालांकि इस ट्रीटमेंट पर अभी तक कोई रिसर्च नहीं हुई है, और ना ही मरीज़ो का कोई टेस्ट हुआ है। यहां के वैध स्वयं रिसर्च की मांग कर रहे है। अस्तपताल चलाने वाली ट्रस्ट ने बताया कि उन्होनें पंचगव्य पर रिसर्च को लेकर पहले ही आयुष मंत्रालय को पत्र लिख दिया है।

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