धोखे की टट्टी

कौंसिलगणेश शंकर विद्यार्थी

किसी चीज को अच्छी तरह जाने-सुने बिना उस पर राय दे देना अदूरदर्शिता है और उसके यथार्थ गुणों को देखे बिना उस पर आशाओं के बड़े-बड़े महलों को तैयार कर डालना मूर्खता में अलिफ़-लैला के अलनिसचार को भी मात करना है. मारलेमिन्टो रिफार्म के समाचार देश में आये और उनकी सूरत का कुछ अनुमान किये बिना ही हमारे देश के कितने ही नेता ख़ुशी से उछल पड़े और लगे आशाओं की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं उसकी नींव पर तैयार करने. राम-राम करके हमें कौंसिलों का वर्तमान रूप मिला. बड़ी-बड़ी आशाओं पर कुछ ओस तो अवश्य पड़ी, लेकिन बढ़-बढ़ कर कदम मारने और दूर-दूर तक के स्वप्न देखने तब भी अपनी लम्बी बातों और उनसे भी लम्बी आशाओं से न चूके. लेकिन काठ की हाड़ी चल ही कै दिन सकती है? अंत में बालू की दीवार धीरे-धीरे गिर चली और अब हम देखते हैं कि हमारे बड़े-बड़े वे लोग, जिन्होंने बड़ी-बड़ी आशाओं के पुल बांधने में निराशा को बिलकुल ही निराश कर दिया था, अब अपनी स्थिति को जान गए हैं और इस जानकारी से उन्हें जो निराशा हुई है, उसे वे दाब भी नहीं सके हैं.

इसके पहिले, कि हम आगे बढ़ें, हम कौंसिलों के विषय में अपना मत साफ-साफ प्रकट कर देना उचित समझते हैं. जहाँ तक कौंसिलों की शान और टीम-टाम से सम्बन्ध है, जहाँ तक उनके रोब-दाब, उनमें बड़े-बड़े उपाधि-धारी आदमियों के होने की, उनके लम्बे-चौड़े कमरों और शानदार कार्यवाही की बात है, तहां तक वे अच्छी हैं और बहुत ही अच्छी. इतनी अच्छी, कि इतने अच्छे से अधिक अच्छे होने का अनुमान हमारी तुच्छ बुद्धि नहीं कर सकती. लेकिन, अन्य बातों में, हम इस बात को साफ-साफ कहने के लिए तैयार हैं कि, वे पूरी धोखे की टट्टी हैं. हम मानते हैं कि उनमें प्रजा के प्रतिनिधियों का अस्तित्व है, लेकिन हम उनका उनमें होना और न होना दोनों बराबर समझते हैं. प्रजा के मेम्बरों में से थोड़े ही से ऐसे हैं, जिन पर देश को पूरा विश्वास हो. उपाधि-धारी या धनवान होना जनता का प्रतिनिधि होने का चिन्ह नहीं है. मेम्बर होने शर्त धन-धरती का स्वामी होना देश के सच्चे प्रतिनिधियों को आगे बढ़ने से रोकना है. खैर, जो कुछ है, उसी को देखते हुए भी हमें कौंसिलों की वर्तमान दशा पर संतुष्ट हो जाने का कोई कारण नहीं दीख पड़ता. हमारे जो प्रतिनिधि कौंसिलों में हैं, उनकी संख्या सरकारी मेम्बरों से लगभग सभी जगह कम है. दूसरी दिल्लगी यह है कि आजतक केवल एक वक्फ बिल को छोड़कर शायद ही कोई कानून या कोई बात प्रजा के प्रतिनिधियों के प्रस्ताव के अनुसार हुई हो. कौंसिलों में ऐसी हवा बह रही है जिसने कसम खाई है, कि यदि मैं चलूंगी, तो एक ही तरफ चलूंगी और दूसरी ओर वालों की हजारों और लाखों मिन्नतों, पृथ्वी पर माथा और नाक रगड़ने पर भी मैं, उस तरफ भूल कर भी रुख न करूंगी. यदि कभी ऐसा हो भी गया, जैसा कि बहुत ही कम हुआ है कि प्रजा के प्रतिनिधियों की बात जोर पर आती दीख पड़ी, तो वहाँ उसको पैरों तले रौंद देने की तैयारी कर दी गई. बंगाल की कौंसिल में प्रजा के मेम्बरों के स्वास्थ्य-सम्बन्धी प्रस्ताव ने जोर पकड़ा, लेकिन वह आगे बढ़े सो कैसे? चट से श्रीमान लार्ड कारमाइकेल ऐसे उदार शासक ने उसे आगे बढ़कर रद कर दिया.

हमारे प्रान्त में कार्यकारिणी कौंसिल के प्रस्ताव की भी कुछ वैसी ही गति हुई. वायसराय की कौंसिल में तो यह तमाशा सदा ही देखने को मिलता है. दिल्ली या शिमले का कौंसिल-हाल सजता है. माननीय मेम्बर सजधज के बड़ी ही शान से धीरे-धीरे चलकर अपने-अपने स्थानों पर विराजमान होते हैं. वायसराय या यदि वे न हुए तो उपसभापति सभापति का आसन ग्रहण करते हैं. भारत-साम्राज्य के भाग्य का निपटारा करने वाली इस महासभा की गंभीर गति को निरखने के लिए बड़े-बड़े दर्शक बड़ी-बड़ी दूर से आते हैं. काम आरम्भ होता है और सारी नजरें माननीय मेम्बरों पर पड़ती हैं. प्रस्ताव पेश हुए और लम्बे-लम्बे व्याख्यान दिए गए. क्या ही अच्छा भाषण और कैसी भारी विद्वता! और अब पासा फेंका गया और वही सदा के काने तीन.

धैर्य का भी ठिकाना होता है और अंत में बड़े-बड़े धैर्यवानों को धैर्य से नमस्कार करना पड़ता है. कौंसिल के इन स्वांगो को देखकर अंत में ख्वामख्वाह अपने को धोखे में डाल रखने वाले लोगों को चेत हुआ है और इस चेत की पहिली किस्त हमें दिल्ली की इम्पीरियल कौंसिल में तारीख 3 को बा. सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा पेश की जाती दीख पड़ती है. कासिम-बाजार के महराज ने प्रस्ताव पेश किया कि म्युनिसिपलटियों के अधिकार बढ़ाये जाने के विषय में 1909 के कार्य-विभाजन कमीशन के विचार पर जो लिखा-पढ़ी हुई हो, उसे सरकार प्रकाशित कर दे.

लगभग सभी गैर-सरकारी मेम्बरों ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया, लेकिन सरकार की ओर से, हारकोर्ट बटलर ने इस जरा सी प्रार्थना का भी सूखा जवाब दे दिया. सरकार के इस इनकार का विरोध न करते हुए अंत में सुरेन्द्र बाबू ने अपने ह्रदय के भरे हुए बहुत दिन के गुबारों को जी शब्दों में निकाल डाला, वे अन्यत्र दिए गए हैं. लेकिन अंत में बात हुई, कि “तुम लाख कही, हम एक न मानी”. सर हारकोर्ट बटलर ने पहले से भी अधिक सूखा उत्तर दिया, कि सरकार अपने विश्वासी सलाहकार को भी वे कागज-पत्र नहीं दिखा सकती, जिनका सम्बन्ध शासन के कार्यों से है. हम बीसवीं शताब्दी के इस विचित्र विश्वास पर दोनों पक्षों को बधाई देते हैं, लेकिन हम नहीं जानते कि सर हारकोर्ट ने इस बात को कहने का साहस कैसे किया, कि और देशों की गवर्नमेंट भी ऐसे अवसरों पर ऐसा ही करती है. क्योंकि इंगलैंड की पार्लियामेंट ही के मेम्बर को इससे अधिक सूखा उत्तर देने का, ऐसा अविश्वास करने का-हम इसे अविश्वास कहे बिना किसी तरह से नहीं रुक सकते-पात्र समझने का ब्रिटिश द्वीपों की गवर्नमेंट का कोई भी सदस्य साहस न करेगा. हमें इस धोखे की टट्टी पर अपने विचार और भी प्रकट करने है लेकिन वे फिर कभी.
(नोट-प्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह सम्पादकीय लेख प्रताप में 8 फरवरी 1914 को प्रकाशित हुआ था.)

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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