‘गर्ल्स ऐंड सेक्स’ ने खोला बेटियों के दिल का राज

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'गर्ल्स ऐंड सेक्स'न्यूयॉर्क। अमेरिका कि जर्नलिस्ट पेगी ऑरेंस्टाइन की किताब ‘गर्ल्स ऐंड सेक्स’ की दुनिया भर में तारीफ हो रही है।  इस किताब को लेकर नेविगेटिंग द कॉम्पलिकेटेड न्यू लैन्डस्केप’ को काफी सराहना मिल रही है। साथ ही दुनिया भर में इस किताब का रिव्यू पब्लिश किया गया है।

‘गर्ल्स ऐंड सेक्स’ बुक में सेक्स शिक्षा का उठाया मुद्दा

यह किताब ‘गर्ल्स ऐंड सेक्स’ न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्ट सेलर में शामिल हो गई है। ऐमजॉन की कई कैटिगरी में इस किताब की मांग नंबर वन पर चल रही है। ऑरेंस्टाइन खुद को फेमनिस्ट और एक मां के रूप में अपनी पहचान बताती हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी अपनी बेटियों को सेक्स के बारे में शिक्षा दें। इनका मानना है कि बेटियों को इस मामले में जो शिक्षा मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पा रही है।

ऑरेंस्टाइन ने अपने किताब ‘गर्ल्स ऐंड सेक्स’ में लिखा है कि जब बच्चे छोटे होते हैं। तो हम स्वेच्छा से अपने बेटों के प्राइवेट पार्ट को अलग-अलग नाम दे देते हैं। लेकिन बेटियों को इग्नोर किया जाता है। मानो वजाइना का होना शर्मिंदगी उठाना हो। लड़कियों के प्राइवेट पार्ट को शर्म से जोड़ा जाता है। वजाइना को पूरी तरह से ऐसा अंग बना दिया जाता है जिस पर कुछ भी बोलना मानों अपराध हो।

उनहोने कहा कि ‘हमें बेटियों को सेक्स की प्रक्रिया, प्रेग्नेंसी और सेक्शुअली ट्रांसमिटेड बीमारियों के बारे में बताना चाहिए। लेकिन हम यह बताने पर वक्त खर्च नहीं करते कि हमारी बेटियां कैसे खुद ही सेक्शुअली इंजॉय हासिल करें। इसका नतीजा यह होता है कि लड़कियां ‘साइकॉलजिकल क्लिटोडेक्समी’ से पीड़ित हो जाती हैं। समस्या यह नहीं है कि लड़कियां सेक्शुअली जल्दी सक्रिय हो जाती हैं।

ऐसा सोसायटी के द्वारा बाध्य किया जाता है। उन्हें लड़कों के सामने पेश किया जाता है। उन्हें बदले में हासिल कुछ भी नहीं होता है। उदाहरण के लिए लड़कियां खुशी से ओरल सेक्स के लिए तैयार हो जाती हैं। लेकिन उन्हें यह हक नहीं मिला है कि वह भी लड़कों से ऐसा करने के लिए कह सकें। एक उम्र में उन्हें हर मामले में समानता मिलनी चाहिए।’

ऑरेंस्टाइन ने कई लड़कियों पर किया रिसर्च

ऑरेंस्टाइन ने किताब में लिखा कि वह कई लड्कियीं से बातचीत की जिसके बाद उन्होंने कहा कि मैं जानती हूं कि मेरी बेटी और उनके लिए क्या उम्मीद है। मैं ज्ञान के स्रोत और रचनात्मकता के साथ कम्युनिकेशन के लिए सेक्शुअलिटी चाहती हूं लेकिन इसमें कोई संभावित जोखिम नहीं होना चाहिए।

मैं चाहती हूं वे अपनी जवानी का उत्सव मनाएं। वे अपनी कामुकता को बिना दबाए इंजॉय करें। मैं उससे पूछने में इतना सक्षम रहूं कि वे बिस्तर पर चाहती क्या हैं।

ऑरेंस्टाइन ने कहा, ‘हमें अपनी बेटियों से उनके पीड़ित होने पर पूछना चाहिए। उनसे बात करनी चाहिए। सभी तरह के फेमनिजम में उत्पीड़न एक अहम समस्या है। बिल्कुल मैं इस बात से सहमत हूं कि लड़कियां पीड़ित होती हैं।’ ये फेमनिजम के उत्पीड़न से भी पीड़ित हैं।

महिलाओं से नहीं पूछी जाती उनकी इच्छा

दशकों से फेमनिजम में मर्दों की चाहत को प्रमुखता दी गई। वे जैसे सेक्स चाहते हैं वैसे महिलाओं से करते हैं। लेकिन लड़कियां क्या चाहती हैं इसे हमेशा दबाकर रखा गया। आखिर लड़कियां प्यार में क्या चाहती हैं? खास कर टीनेज में वे क्या चाहती हैं? एक पैरंट्स के रूप में हमें उन्हें मदद करनी चाहिए।’

लड़कियां प्यार का करती हैं पालन

ऑरेंस्टाइन ने कहा, ‘लड़कियों ने कहा कि वह पहली बार सेक्स में लड़कों से अलग नहीं होती हैं। उन्हें लगता है कि वे प्यार का पालन करेंगी। यह मेसेज अपने आप में जहरीला है। महिलाओं का शरीर ऑक्सिटोसीन से साराबोर होता है। इन्हें खुद को लव और सेक्स से छुड़ाना असंभव होता है। महिलाओं को हमेशा सेक्स से पहले प्यार होता है। उन्हें प्रकृति ने इस मामले में खास बनाया है। इसीलिए एक महिला पुरुष नहीं होती है।

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