घोर संग्राम

गांधी जी
पत्रकार शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी

गणेश शंकर विद्यार्थी।

दक्षिण अफ्रीका में हमारे जातीय महा-संग्राम की उग्रता दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है. विपत्ति की घनघोर घटा से अब निर्दयता-पूर्ण बूँदें भी गिरना आरम्भ हो गई हैं. मि. गाँधी पकड़े गए, जमानत पर छोड़े गए, फिर पकड़े गए, और अंत में नौ मास के लिए जेल भेज दिए गए. मि. गांधी की धर्मपत्नी और उनके लड़के इसके पहिले जेल में पहुँच चुके हैं. और भी 2000 वीर पुरुष पुलिस की हिरासत में हैं. अफ्रीका में डेढ़ लाख हिन्दुस्तानी हैं, और इस संग्राम में उनमें से अधिकांश के काम ढीले पड़ रहे हैं. पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ और बच्चे तक इस महा-संग्राम में हिस्सा लेने के लिए, मात्रि -भूमि की लाज के लिए कठिन परीक्षा देने को उत्साह से, प्रसन्न ह्रदय से, आगे बढ़ रहे हैं. मि. गांधी उनसे छिन गए. उनका वीर नेता, उनकी आत्माओं में दृढ़ता, वीरता और शांति का महामंत्र फूंकने वाला और हमारी भूमि के पुरुषत्व, साहस और सज्जनता का सर्वश्रेष्ठ फल मि. गांधी-उनसे छीन लिया गया है. और जानबूझ कर, इसलिए कि नेता-विहीन दल अंत में टूट कर तितर-बितर हो जाय. हजारों भारतीय स्त्री, पुरुष और बच्चे निः सहाय और नेता-विहीन होने पर भी केवल सत्य के लिए, शक्तिमान स्वेच्छाचारी तूफ़ान के सामने सर झुकाने को तैयार नहीं. यह बात भारत के बीसवीं शताब्दी के इतिहास में प्रकाशमान मोटे अक्षरों में लिखी जाएगी.

निरंकुशता

अफ्रीका में भारतवासी जाकर बसे लेकिन इसके ये अर्थ नहीं कि वे धक्के खाते फिरते थे और उन्हें दक्षिण अफ्रीका के गोरों ने बड़ी ही दया और कृपा से अपने यहाँ तेर कर लेने की आज्ञा दी. अपना काम किसी भांति चलता हुआ न देखकर 1859 में अफ्रीका के गोरों ने इम्पीरियल गवर्नमेंट से प्रार्थना की कि भारत से कुली नेटाल भेजे जाएँ. इम्पीरियल सरकार ने बहुत लिखा-पढ़ी करके भारत सरकार को नेटाल आदि कुली भेजने को राजी किया. कुली जाने लगे और नियमित समय के पूरे होने पर वे वहाँ रह जाने और कोई व्यवसाय करने के लिए आजाद हो जाते थे. इस समय दक्षिण अफ्रीका में डेढ़ लाख हिन्दुस्तानी हैं. इनमें से पांचवा हिस्सा ऐसे हिन्दुस्तानियों का है, जो कुली बनकर नहीं, बल्कि वैसे ही वहाँ जा बसे. हमारे देश-भाइयों ने खूब परिश्रम किया और उससे वे फले-फूले. गोरों की आँखों में उनकी उन्नति बे-तरह खटकी. गत शताब्दी के पिछले हिस्से में वे इस बात की सिर तोड़ कोशिश करने लगे कि किसी तरह भी हो, न्याय से, अन्याय से, इन “कालों” को इस भूमि से निकाल बाहर करना चाहिए. सख्त पर सख्त कानून बन चले और अंत में इन उग्र कानूनों की कठोरता सहन-शील भारतीय हृदयों को भी असहनीय हो गई. नेटाल में जो हिन्दुस्तानी कुली नहीं हैं, उन पर हर 13 वर्ष से अधिक उम्र की लड़की और हर 16 वर्ष से अधिक उम्र के लड़के पर 45 रुपये साल का कठोर टैक्स है. हिन्दुस्तानी विवाह जायज नहीं माने जाते. नेटाल और ट्रांसवाल के हिन्दुस्तानी केप प्रान्त में प्रवेश नहीं कर सकते. एक बार अपने प्रान्त से कुछ समय तक बाहर रहने पर फिर उसमें घुसना असंभव है. दक्षिण अफ्रीका की सरकार की इस निरंकुशता का अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों ने अच्छी तरह विरोध किया. मि. गाँधी आज से पहले, इसी विरोध के कारण अपने हजारों साथियों सहित तीन बार जेल हो आये. वादे किये गए कि कानून नरम कर दिया जाएगा, मि. गाँधी से और पिछले साल मि. गोखले से भी. लेकिन निरंकुशता वादों के करने और उन्हें तोड़ने में पूरी और पक्की निरंकुश निकली. दक्षिण अफ्रीका के गोरे अधिकारियों ने चट से आँख बदल ली, और संसार को विश्वास दिला दिया कि वादे कभी किये ही नहीं गए. झूठ और इतनी बढ़ी कि अब उसके ऐसे अनन्य सेवकों से सत्य के लिए दुहाइयां देना ही बेकार.

विचित्र लाचारी

इंगलैंड की छत्र-छाया हमारे ऊपर है, और दक्षिण अफ्रीका के ऊपर भी. हम सम्राट जार्ज की प्रजा हैं, और दक्षिण अफ्रीका के गोरे भी. हम काले भले ही हों, लेकिन महारानी विक्टोरिया, सम्राट एडवर्ड और सम्राट जार्ज के पवित्र शब्द हमें उनकी सारी प्रजाओं के बराबर स्थान दे रहे हैं. ये पुनीत शब्द हमारे लिए संसार की जातियों की पंक्ति में बढ़ने के लिए सांकेतिक शब्द है. इनके महत्व और इनके गौरव को हम एक पल के लिए भी छोटा या हल्का न होने देंगे. हमें ये पुनीत शब्द मिले हैं और अब हमें इम्पीरियल सरकार बतलावे कि वे कहाँ तक पूरे किये जाते हैं? क्या उसी की प्रजा का एक भाग हमारे हकों-नहीं हमी-को पैरों से कुचल कर धूल में मिला देने की कोशिश नहीं कर रहा है? क्या इम्पीरियल सरकार का इस तरह से चुपचाप अपने बिगड़े हुए दुलारे छोकडों का उस दृढ़ भाव की दृढ़ता को जिसके आधार पर आज संसार की गोरी और भूरी, काली और पीली सभी तरह और सभी जातियों के आदमियों पर ब्रिटिश शासन का झंडा फहरा रहा है, हिला देने का खेल देखना पसंद करती है? इतना ही क्यों, उसी ने तो हिन्दुस्तानियों को 1859 में दक्षिण अफ्रीका का जबरदस्ती रास्ता बतलाया था और अब, क्या ऐसी विपत्ति के समय, वह अपना मुंह छिपाना उचित समझती है? इम्पीरियल सरकार इस विषय में अपनी लाचारी प्रकट किया करती है, लेकिन उसकी यह लाचारी बड़ी ही विचित्र है. उसकी यह लाचारी संसार में उसे झूठा बना रही है. उसने हिन्दुस्तानियों को अफ्रीका भेजा और अब वह उनकी रक्षा नहीं कर सकती. सम्राटों ने भारतीय प्रजा को समता का सन्देश सुनाया और इम्पीरियल सरकार अपनी कमजोरी और अदूरदर्शिता से उन पवित्र शब्दों का निर्वाह नहीं कर सकती. उसकी ये गलतियाँ समझदारी की नजर में बड़ी ही भद्दी हैं, और इनका नतीजा उसके लिए अच्छा नहीं हो सकता.

लेकिन भारतीय सरकार?

वह अभी तक चुप ही बैठी है. संतोष की बात इतनी ही है कि उसके कर्ता-धर्ता इस समय लार्ड हार्डिज ऐसे उदार आदमी हैं जिनके ह्रदय में हमारे देश-भाइयों को तकलीफ का ख्याल भी है. लेकिन इतने ही से काम न चलेगा. सरकार को चुप न रहना चाहिए. हमारे देश-भाई तो अफ्रीका में रहते, सहते और टैक्स देते हुए भी वहाँ वोट देने तक का अधिकार न पावें और वहां के निवासी आकर हमारी सिविल सर्विस में ऊँचे-ऊँचे पद पावें. इस उदारता का भी कहीं ठिकाना है? हमारे यहाँ कोयले की अच्छी मांग है और साथ ही उसकी अच्छी उपज भी है. लेकिन हमारी रेलों के लिए कोयला आवे तो अफ्रीका ही से. इस तरह हमारे लाखों रुपये उन गोरों की जेब में चले जाते हैं जो अफ्रीका में हमारे भाइयों की छाती पर मूंग दलते हैं. हमारा करोडो रूपया लन्दन के रिजर्व फंड में भारत-सचिव के पास है और हमारे भारत सचिव ऐसे खुले-दिल के कि आप इन्हीं अफ्रीकन सज्जनों को जो हमारे भाइयों को अफ्रीका से निकाल बाहर करने पर तुले बैठे हैं, उधार देते फिरें. बस, यह उदारता अब बंद होनी चाहिए. अफ्रीका वाले हमारे यहाँ पद न पावें. देश में कोयला बहुत होता है, रेलें यहीं से कोयला खरीदें या अफ्रीका के कोयले पर कर बढ़ा दिया जाये और भारत सचिव अपनी महाजनता की इतिश्री कर दें. जब कम से कम इतना होगा, तब हम समझेंगे कि सरकार अब कुछ चेती.

कमजोरों का कहीं भी ठिकाना नहीं

संसार में जिसमें अपना अस्तित्व कायम रखने की शक्ति नहीं, उसे कालचक्र अधिक समय तक दूसरों का स्थान छेंके रहने की आज्ञा नहीं दे सकता. प्रकृति सदा फजूल चीजों को काट-छांट में लगी रहती है. कठिन समय, विपत्ति और घोर संग्राम, और कुछ नहीं, केवल प्रकृति की काट-छांट हैं. तपस्या में जो पूरे उतरते हैं उन्हीं को आगे बढ़ने का रास्ता मिलता है और दूसरों को अपना मुंह गुमनामी के परदे में छिपा लेना पड़ता है. अफ्रीका में हमारे भाइयों के लिए आज यही तपस्या पेश है. केवल उन्ही के नहीं, बल्कि देश में रहने वाले 31 करोड़ प्राणियों के सामने भी और उसी उग्रता के साथ. हमारे मुठ्ठीभर भाई, जो तपस्या की दोधारी तलवार पर चल रहे हैं, केवल अपने ही लिए ऐसा नहीं कर रहे हैं. उन्होंने ऐसा किया है-और सारे देश और देशवासियों के लिए. वे अपने प्राण बचा सकते थे. किन्हीं शर्तों पर वे अफ्रीका में अपना जीवन तेर कर सकते थे. बहुत होता तो उनका भारत से नाता टूट जाता. वे आप को न पहचानते और आप उनको न पहचानते. वे आपके धर्म, रक्त और भावों से अलग हो जाते और आप उनके. लेकिन आप यह भी जानते हैं इस इतने का मतलब आपके लिए क्या होता है? वीर भाइयों ही का जिनकी वीरता, धीरता और उच्च भावों के लिए किसी कसौटी की जरूरत नहीं, विछोहन, बल्कि संसार आपको घृणा की दृष्टि से देखेगा, संसार की जातियां आपको दुरदुरावेंगी और मान, मर्यादा खोकर आप की इज्जत मुठ्ठी भर बेजान, ठोकर खाने वाली, खाक से बढ़कर न होगी. पोर्तगीज अफ्रीका और वह हिन्दुस्तानियों के ऊपर टैक्स लगाने की तैयारी कर रहा है. जर्मनी की पार्लियामेंट हिन्दुस्तानियों को हेय समझती है, अब जर्मन अफ्रीका में भी स्थान नहीं. ईस्ट अफ्रीका भी अपने दक्षिणी भाइयों से शिक्षा ले रहा है और वहां भी हिन्दुस्तानियों को कानूनों से जकड डालने की तैयारी हो रही है. आस्ट्रेलिया, कनाडा और संसार के अन्य भागों के दरवाजे आपके लिए बंद हैं. हाँ! निर्बल जीवों! कहीं भी ठिकाना नहीं! शोक मनाने से काम न चलेगा. जीवन के लिए शक्ति की जरूरत है. आपके भाइयों ने परीक्षा दे दी और वे पूरे उतरे. अब उनकी और साथ ही संसार की नजर आपके ऊपर है. बोलिए, मौत या जिंदगी, क्या कहते हैं? यदि जातीय जीवन के भाव आपके हृदय में हैं, तो उठ बैठिये और परीक्षा के लिए तैयार हो जाइए. तपस्या के लिए प्राणों की आहुति की आवश्यकता नहीं, धन की जरूरत है. आगे बढिए और सिद्ध कीजिये कि आप का ह्रदय भाइयों के दुःख से दुखित है. सिद्ध कीजिये कि उनके और आपके बीच में बड़ा भारी समुद्र अवश्य है, तो भी आप का और उनका ह्रदय एक है. सिद्ध कीजिये कि दूर होते हुए भी वे आपके ही रक्त-मांस से बने हुए हैं और आप उनके. आपने हिम्मत हारी, कर्तव्य से जी चुराया, पीछे हटे और गए. और साथ ही बहुत कुछ ले गए. हजारों आशाएं, जो आपकी ओर रही हैं, मिटटी में मिल जाएँगी. वीर ह्रदय अयोग्य हृदयों की भीरुता से नष्ट हो जाएंगे. संसार में आपके भीरुता की कहावतें कही जाएंगी और बीसवीं शताब्दी के इतिहास में लिखा जाएगा कि संसार में एक भारतीय जाति थी, जो अपनी मूर्खता, भीरुता और कापुरुषता में अपने ढंग की एक ही थी, जिसने अपनी लाज के निबाहने वाले मुठ्ठी भर आदमियों की अपनी कमजोरी से हत्या की और इस तरह की बेअक्ली से, अंत में वह अपने पैरों में कुल्हाड़ी मरकर संसार का बोझ सदा के लिए हल्का कर गई.

नोट-लेख महान पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी की कलम से लिखे और उनके प्रिय अख़बार प्रताप में 16 नवम्बर 1913 को प्रकाशित

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