गुहा ने कहा, धोनी A ग्रेड के लायक नहीं तो क्यों मिल रहे दो करोड़ रुपए

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नई दिल्ली| बीसीसीआई को चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित प्रशासक समिति (सीओए) से इस्तीफा देने वाले मशहूर हिस्टोरियन रामचंद्र गुहा ने बीसीसीआई द्वारा भारतीय क्रिकेट टीम के कोच अनिल कुंबले के अनुबंध को संभाले जाने के तरीके पर सवाल खड़े किए हैं। गुहा कहा कि जब धोनी के टेस्ट टीम में नहीं हैं तब भी उन्हें सैलरी संबंधित कॉन्ट्रैक्ट में ए ग्रेड पर रखा गया है। इस बात पर गुहा ने आपत्ति जताई है।

सुनील गावसकर

सुनील गावसकर को भी निशाने पर लिया

इसके साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रशासक समिति की ‘चुप्पी’ से लग रहा है कि वह भी इस मामले में ‘शामिल’ है। इसके अलावा, पूर्व क्रिकेटर सुनील गावसकर को भी निशाने पर लिया है। प्रशासक समिति के चेयरमैन विनोद राय को लिखे एक पत्र में गुहा ने कहा कि पिछले सीजन में राष्ट्रीय टीम का रिकॉर्ड शानदार रहा है और इसका अधिकतर श्रेय खिलाड़ियों को जाता है, लेकिन कुछ श्रेय के हकदार टीम के मुख्य कोच और उनका स्टॉफ भी है।

राय को लिखे पत्र में गुहा ने कहा, “न्याय और योग्यता के आधार पर देखा जाए, तो मुख्य कोच (कुंबले) के अनुबंध की अवधि को बढ़ाना चाहिए था। इसके बजाए कुंबले को अधर में लटका दिया गया और फिर कहा गया कि इस पद के लिए फिर से आवेदन मांगे गए हैं।”

गुहा ने साफ तौर पर कहा कि इस मुद्दे को बीसीसीआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और बीसीसीआई के पदाधिकारियों द्वारा बेहद ‘असंवेदनशील और गैरपेशेवाराना तरीके’ से संभाला गया है और ‘दुर्भाग्य से इसमें अपनी चुप्पी और कोई कदम न उठाने के कारण प्रशासक समिति भी भागीदार बन गई है।’

गुहा ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 30 जनवरी को दिए गए आदेश को दोहराया जिसमें कहा गया है कि सीओए बीसीसीआई के प्रबंधन को संभालेगी। उन्होंने कहा कि अगर कुंबले के कोच पद की अवधि समाप्त होने में एक साल रह गया था, तो ‘नए कोच की नियुक्ति के लिए आवेदन प्रक्रिया को अप्रैल या मई में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के दौरान क्यों शुरू नहीं किया गया?’

गुहा ने कह, “अगर सच में कप्तान और मुख्य कोच की नहीं बन रही थी तो फिर इस प्रक्रिया को आस्ट्रेलिया सीरीज के समापन के बाद ही क्यों शुरू नहीं किया गया? इसे अंतिम मिनट के लिए क्यों छोड़ दिया गया, जबकि एक महत्वपूर्ण टूर्नामेंट की शुरुआत होने वाली है और अनिश्चितता कोच, कप्तान और टीम के मनोबल और फोकस को प्रभावित कर सकती है?” उन्होंने कहा कि इस सबमें यह साफ नजर आ रहा है कि टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों को कोच के ऊपर वीटो पॉवर होने का संकेत दे दिया गया है जोकि सुपरस्टर संस्कृति के बेलगाम हो जाने का एक और उदाहरण है।

गुहा ने कहा, “इस प्रकार का वीटो पॉवर किसी भी देश के किसी भी खेल में किसी भी उच्चस्तर की पेशेवर टीम को नहीं दिया जाता। इसी पॉवर के कारण अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों से अलग आज के भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को यह तक चुनने का हक मिल गया है कि कमेंट्री टीम का सदस्य कौन होगा।” गुहा ने कहा, “अगर यही हाल रहा तो आज बात कोच की है, कल को यह (खिलाड़ियों का यही वीटो पावर) चयनकर्ताओं और बोर्ड पदाधिकारियों पर भी क्या लागू नहीं हो जाएगा?”

गुहा ने कहा- खत्म होना चाहिए सुपरस्टार कल्चर

हाल ही में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की प्रशासक समिति से इस्तीफा देने वाले जाने-माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कई दिग्गज क्रिकेट खिलाड़ियों के खिलाफ हितों के टकराव के मुद्दे को उठाया है। उन्होंने हितों के टकराव के इस मामले में महेंद्र सिंह धौनी, सुनील गावस्कर और राहुल द्रविड़ जैसे खिलाड़ियों को हर मामले में प्राथमिकता दिए जाने की आलोचना भी की है।

प्रशासक समिति के चेयरमैन विनोद राय को भेजे अपने इस्तीफे में गुहा ने भारतीय टीम के पूर्व कप्तान और कमेंटेटर गावस्कर के हितों के टकराव के मुद्दे पर सवाल खड़े किए हैं। साथ ही इंडिया-ए और अंडर-19 टीम के कोच द्रविड़ के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) फ्रेंचाइजी दिल्ली डेयरडेविल्स के साथ संबंध पर भी उंगली उठाई है। गुहा ने कहा, “भारतीय टीम या राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी से करार से जुड़े किसी भी व्यक्ति को आईपीएल टीम के साथ जुड़ने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।”

उन्होंने कहा, “बीसीसीआई ने हो सकता है कि अपनी लापरवाही (या किसी अन्य कारण से) में कोचिंग/सपोर्ट स्टाफ को यह दोहरी प्रतिबद्धता का व्यवसाय करने की अनुमति दे दी हो। हो सकता है कि मौजूदा स्थिति में यह किसी तरह वैध साबित हो जाए, लेकिन यह अनैतिक है और इससे कोचिंग स्टॉफ और अन्य सदस्यों में आपसी मतभेद और ईष्र्या की स्थिति खड़ी हो सकती है। यह चलन बिल्कुल गलत है और भारतीय क्रिकेट के हितों के खिलाफ है।”

गुहा ने कहा, “बीसीसीआई प्रबंधन इन सुपरस्टार लोगों के रोब में इस हद तक दबा रहता है कि नियमों और प्रक्रियाओं के उल्लंघन पर सवाल नहीं उठाता। देखा जाए, तो बीसीसीआई पदाधिकारी अपनी विवेकाधीन शक्तियों का आनंद लेना चाहते हैं, ताकि जिन कोच और कमेंटेटर का वे पक्ष ले रहे हैं, वे इन पदाधिकारियों के ऋणी रहें और उनकी गलतियों और अनियमितताओं पर सवाल न उठाएं।”

भारतीय क्रिकेट के ‘सुपरस्टारों’ के हितों के टकराव के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए गुहा ने कहा, “जब से प्रशासन समिति का कार्य शुरू हुआ है, तब से इस मुद्दे को संबोधित नहीं किया गया और मैंने अपनी नियुक्ति के बाद से ही इस मुद्दे को बार-बार उठाया था।”

गुहा ने कहा, “उदाहरण के लिए, बीसीसीआई कुछ राष्ट्रीय प्रशिक्षकों को प्राथमिकता दे रही है। उन्हें राष्ट्रीय सेवा के लिए 10 माह का कार्यकाल सौंपा गया और इस वजह से वे बाकी बचे दो माह में आईपीएल में कोच और मेंटर के तौर पर काम कर रहे हैं।” गुहा ने कहा कि ये सब मनमाने ढंग से किया गया है। जितना अधिक कोई लोकप्रिय पूर्व खिलाड़ी कोच बनता है, उतना ही बीसीसीआई उसे खुद अपना अनुबंध बनाने की अनुमति देती है जिसमें ऐसे छेद छोड़ दिए जाते हैं जो हितों के टकराव के मुद्दे की अनदेखी में काम आते हैं।

उन्होंने कहा, “मैंने बार-बार इस बात को उठाया है कि ये सब कोच या राष्ट्रीय वरिष्ठ, जूनियर टीम के सपोर्ट स्टॉफ या राष्ट्रीय क्रिकेट समिति के स्टॉफ के लिए लोढ़ा समिति की भावना के विपरीत है। कोई भी व्यक्ति एक समय पर दोनों चीजें नहीं संभाल सकता और न ही दोनों कार्यो की जिम्मेदारी के प्रति न्याय कर सकता है। क्लबों से पहले राष्ट्रीय कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”

टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के बावजूद धौनी को ग्रेड-ए अनुबंध में शामिल किए जाने पर सवाल उठाते हुए गुहा ने कहा, “दुर्भाग्य से इस सुपरस्टार सिंड्रोम ने भारतीय टीम अनुबंधों की प्रणाली को विकृत कर दिया है। अगर आपको याद हो, तो मैंने धौनी को टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के बावजूद ग्रेड-ए अनुबंध में शामिल किए जाने को क्रिकेट के आधार पर समर्थन न करने योग्य करार दिया था और यह भी कहा था कि यह फैसला गलत संदेश देता है।”

इसके अलावा, गुहा ने गावस्कर के दोहरे व्यवसाय पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “गावस्कर खिलाड़ी प्रबंधन वाली कंपनी के प्रमुख हैं और साथ ही बीसीसीआई के अनुबंध पर बतौर कमेंटेटर भी काम कर रहे हैं।” गुहा ने कहा कि यह साफ तौर पर हितों के टकराव का मामला है। या तो गावस्कर को कंपनी से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर बीसीसीआई कमेंटेटर के पद से हट जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मामले पर तुरंत प्रभाव से कार्रवाई की जानी चाहिए। प्रशासक समिति की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता इस प्रकार के मामलों पर कड़े और सही फैसले लेने पर निर्भर है।

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