ग्लोबल वॉर्मिंग : आधी जनवरी बीती, बदरीनाथ बर्फविहीन

देहरादून। ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे की जद में इन दिनों पूरा विश्व है, लेकिन उस खतरे की जद में उत्तराखंड के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल आ चुके हैं। जी हां, बदरीनाथ धाम ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में है। शीतकाल में बर्फ की चादर से ढ़का रहने वाला धाम इस बार आधी जनवरी गुजरने के बाद भी बर्फ से दूर है। यहां ऊंची चोटियों पर तो हल्की बर्फ जमी है, पर मंदिर के आसपास नाममात्र की बर्फ है। पिछले कुछ सालों से धाम में यही स्थिति देखी जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक ये पूरा बदलाव ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हो रहा है।

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ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते नहीं हुई बर्फबारी

बदरीनाथ धाम के कपाट नवंबर माह में शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं। क्योंकि इस दौरान पूरे क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है और धाम भी बर्फ से ढक जाता है। यहां मध्य दिसंबर से शुरू होने वाली बर्फबारी का सिलसिला अप्रैल तक चलता है और यही कारण है कि गर्मियों में लोग धाम के दर्शन करने बड़ी संख्या में आते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। कपाट बंद होने के बाद से केवल 18 दिसंबर, 24 दिसंबर और आठ जनवरी को ही बदरीनाथ धाम में बर्फबारी हुई है। और वो भी इतनी हल्की हुई कि चटख धूप खिलने पर पूरी बर्फ पिघल गई।

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इस बार धाम तक हो रही आवाजाही

बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह के मुताबिक जनवरी महीने तक बदरीनाथ धाम, हनुमान चट्टी से आगे बदरीनाथ हाईवे पूरी तरह बर्फ से ढक जाता था। बर्फ जमने से स्थानीय लोगों को रोजमर्रा के कामों में भी दिक्कतें आती थीं, लेकिन इस बार बर्फ नहीं होने से धाम तक सड़क खुली हुई है और लोगों की आवाजाही भी हो रही है।

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हेमकुंड साहिब में भी बर्फबारी कम

हैरत ये भी है कि इस बार हेमकुंड साहिब में भी बर्फबारी और सालों के मुकाबले काफी कम हुई है। हालांकि यहां अत्यधिक ठंड से सरोवर जरूर जम गया है। लेकिन सरोवर के आस-पास एक फीट बर्फ ही जमी है, जो पिछले सालों के मुकाबले काफी कम है। दिल्ली स्थित मौसम विज्ञान और शोध केंद्र के निदेशक डॉ. एल एस राठौर का कहना है कि बीता साल अबतक के सबसे गर्म सालों में एक है। उत्तराखंड के लिहाज से साल 2015 के अक्टूबर, नवबंर और दिसंबर महीने सबसे ज्यादा गर्म रहे। पश्चिमी विक्षोभ जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश तक ही सीमित है, उससे आगे नहीं बढ़ रहा। आने वाले दिनों में भी पश्चिमी विक्षोभ के आगे बढ़ने या कुछ प्रभाव दिखाने के आसार नहीं हैं। और ये सब ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हो रहा है।

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