चालीस साल बाद मैं, वो और हमारा परिवार

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दिनेश पाठक।

सभी बहनें इठलाती-बलखाती सरे-बाजार मेरे सामने घूम रही थी और मैं ललचाई नज़रों से बस उन्हें निहारे जा रहा था. बड़ी दूर तक मैं पीछा करता रहा लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं टोक दूं. रोक लूं. हालचाल पूछ लूँ. मेरे मन में पाप था. मैं ही दोषी हूँ. किस मुंह से बोलता. डर भी था, कहीं डपट न लें सब के सब एक साथ. देखते ही देखते अमीनाबाद की गलियों में सब कहीं गुम हो गई. मैं सिर पीटता रहा. अफ़सोस करता रहा.

कोई 40 साल पहले इनमें एक से मेरी मुलाकात हुई थी. मैंने उसे पूरे शिद्दत से चाहा. तब मैं एक पल के लिए भी उसे अपनी नज़रों से बिछुड़ने नहीं देता था. सभी छोटी बहनों के आने पर भी वह मेरे दिल के करीब ही होती. धीरे-धीरे समय आगे बढ़ा. मैं गाँव से शहर आ गया. पढाई-लिखाई चलती रही. तब तक तो कोई दिक्कत नहीं हुई हम दोनों के रिश्ते में. समय बीता. मुझे नौकरी मिल गई. खाता खोलवाने बैंक गया. सारी कार्रवाई होने के बाद मेरी मुलाकात एक तरोताजा, कड़क, देखने में बला की खूबसूरत से हो गई. मैं लट्टू हो गया.

मैं

कुछ दिन तो मिलने-मिलाने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा. वह कब मेरे दिल के करीब आ गई, पता ही नहीं चला. जिस दिन मुलाकात नहीं होती, मन भारी रहता. फिर हम छिपकर घर में मिलने लगे. बाजार में तो हम खुल्लम-खुल्ला अपने प्यार का इजहार करते. सिनेमा टिकट काउंटर हो या आइसक्रीम पार्लर, हर जगह हम साथ ही जाते-आते. मेरे इस नए प्यार की वजह से वे लोग भी हमें प्यार करते, जो कभी ठीक से बात भी करना नहीं पसंद करते थे. समय आगे बढ़ा. मेरी भी तरक्की होने लगी. नित नए चेहरों से मुलाकातों का सिलसिला बन गया. मेरा मन एक बार फिर फिसला. गुलाबी रंग के लिबास में लिपटी फिर एक से मुलाकात हो गई. दफ्तर में ही. मेरे एकाउंट के साथी ने मुलाकात कराई. पहली ही नजर में मैं फिर पागल हो गया. ख़ुशी के मारे मेरे मन में फिर लड्डू फूटने लगे. न जाने कब हमारे बीच प्यार हो गया.

अब मेरी कलई खुलने लगी थी. कभी पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी और भी न जाने कौन-कौन सी के चक्कर में मैं भागता रहा. इसी आठ नवम्बर की रात मेरी मुलाकात कई दिन बाद पहली वाली से हो गई. आज वह ज्यादा ही अकड़ी हुई दिखाई पड़ रही थी. बोली-क्या हाल हैं आप के ? कैसी हैं हमारी बहनें ? सब ठीक हैं, कहते हुए मैं आगे बढ़ने का प्रयास करने लगा. तभी आवाज आई, मैं तुमसे आज भी उतना ही प्यार करती हूँ. तुम मेरे पास जब चाहो, लौट आओ. शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा. पर, उसकी बातों में मुझे पागलपन दिख रहा था. मैंने जैसे-तैसे जान छुड़ाया और घर पहुंचा तो पता चला कि नौकरी के बाद मिली दोनों को उनके भाई ने एक साथ ख़त्म कर दिया.

मैं

अब मैं लगा दहाड़ मारने. पर कोई सुनवाई नहीं. क्या करूँ. कोई सभालने वाला नहीं था मेरे जीवन में. लगा कि अब सब ख़त्म हो गया. अगली सुबह शमसान ले गया अंतिम क्रिया के लिए. वहां जबरदस्त भीड़ थी. सब एक-दूसरे के ऊपर ही अंत्येष्टि करने की फ़िराक में थे. चीख-पुकार, कोहराम के बीच शाम तक मेरा भी नंबर आ गया. किसी तरह अंत्येष्टि की. भूख-प्यास के मारे बुरा हाल था. लौट के घर आया तो शोक जताने पास-पड़ोस के लोग तो थे, पर वह नहीं, जिसकी तलाश मुझे थी. जैसे तैसे रात बीती, सुबह फिर तलाश में निकल पड़ा. बाजार में जब देखा तो मन को बड़ा सुकून मिला. क्षण भर को जब वह गायब हुई गलियों में, तो मन बेचैन हुआ लेकिन खुद पर भरोसा था, कि अपने पहले प्यार को आज तलाश कर ही दम लेंगे. हुआ ठीक वैसा ही. तीन घंटे के अथक प्रयास के बाद मेरी मुलाकात एक बार फिर से हो गई और हम दोनों ख़ुशी-ख़ुशी वापस आ गए. अब हमने कसम खाई है कि एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे. चाहे कोई भी मिल जाए. कैसी भी सूरत हमारे सामने आये. 40 साल बाद हुई मुलाकात में ताजगी एकदम से वैसी ही थी. मैंने भी महसूस किया और सामने वाले ने भी.

मैंने उस कसाई भाई को धन्यवाद दिया, जिसने बाद में मिली दोनों को एक साथ मौत के घाट उतार दिया. हमने कसम खाई है कि अब जो है, उसी से संतोष करेंगे. ज्यादा उछल-कूद वैसे भी सेहत के लिए ठीक नहीं. अब हमारा घर फिर से सभी बहनों ने मिलकर सजा दिया है. मंदिर से लेकर आलमारी तक में छोटियों का भी जलवा है. मुझे भी कोई एतराज नहीं. अब हम सब ख़ुशी-ख़ुशी एक ही घर में रहेंगे.

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