चिराग तले अँधेरा

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राजधानीगणेश शंकर विद्यार्थी।

राजधानी को देश की सार्वजनिक स्फूर्ति का केंद्र होना चाहिए. देहात में पुलिस वाला लोगों को सता सकता है, पर शहर में उसकी नादिरशाही कम चलती है, और राजधानी में नादिरशाही के लिए स्थान ही नहीं रहता. न्याय का सबसे बड़ा घर राजधानी है. फरियाद की सबसे अधिक सुनवाई कहीं हो सकती है तो राजधानी में. सताए हुए आदमी की आवाज का राजधानी में दबाव कठिन, और महा कठिन है. पर, जब राजधानी में ही सताए हुए लोगों की गुहार नक्कारखाने में तूती की आवाज बन जाय, जब बड़े न्यायालय के स्थान में बड़ी से बड़ी निरंकुशता सहज में की जाय, और किसी का भी आसन न डोले, तो यह कहना अनुचित नहीं है कि ‘चिराग के तले अँधेरा’ है. यह अँधेरा या अंधेर आज हमारे देश की राजधानी पुण्य नगरी देहली में खूब देखने में आ रहा है.

राजधानी के परिवर्तन पर गोरों, गोरी प्रजा और बंगाल वालों ने अपने शोर से आकाश और पृथ्वी एक कर दिया है और वायसराय को खूब कोसा था. लोगों ने समझा था कि यह सब ढोंग संकीर्ण स्वार्थ के कारण है, पर आजकल की राजधानी की कीर्ति-चन्द्र के दर्शन करते हुए कहना पड़ता है कि गोरों और बंगालियों की चिल्लाहट कम से कम बिलकुल ही अपने ही मतलब के लिए न थी. अब प्रकट होता है कि कलकत्ता से राजधानी उठकर देहली जाना अच्छा नहीं हुआ. देहली में कलकत्ते की तरह लोकमत नहीं, देहली में कलकत्ते की भांति शिक्षा का प्रचार और लोगों में बल और साहस नहीं, उसमें कलकत्ते की भांति लोक-मत का कोई प्रभाव मनमाना करने वाले अधिकारियों पर नहीं पड़ता, और देहली की निर्बलता का फल देश और देशवासियों को इस निरंकुशता और धांधागर्दी के रूप में मिलता है, जो आज ‘हमदर्द’, ‘कामरेड’, ‘विजय’, ‘राजदूत’ आदि का गला घोंट चुकी या घोंट देने के लिए तैयार है.

परन्तु, जीवधारियों का यह स्वाभाविक काम नहीं है कि वह अपना गला चुपचाप घुट्वाते रहें. वे सभी लोग, जो जीवन की कदर अच्छी प्रकार समझते हैं, और जिन्हें हर्ष और सुख होता है, निर्जीवता के इस अखंड रात के अंधकार के नाश करने में हिचकिचाहट नहीं कर सकते. यदि उन्हें यह नहीं देखना है कि देश का केंद्र अन्याय और निरंकुशता का केंद्र न हो जाय, यदि वे अपनी शक्तियों को एक बड़े भारी कार्यक्षेत्र से बहार खदेड़ दी जाती हुई, उनको अकाल मृत्यु के पंजे मन फंसती हुई देखना पसंद नहीं करते, तो उन्हें शीघ्र ही अपने जीवन, अपने उद्योग, अपनी शक्तियों के चिन्ह प्रकट करना चाहिए. हाथ में कुछ नहीं है, पर आन्दोलन करना शक्ति से बाहर नहीं है. घोर संघर्षण बिना अग्नि की प्रज्ज्वलित शिखा देखी नहीं जा सकती. प्रेस एक्ट के बड़े और कड़े जाल को सुख निद्राएँ नहीं तोड़ सकतीं.

परन्तु, हिंदी समाचार पत्रों को-उनकी नहीं, जो समय को देखकर अत्यंत नीचता पर उतर आते हैं, जिन्हें अपने किसी सहयोगी की विपत्ति से हर्ष होता है और यथार्थ में जो इस पवित्र काम के कलंक मात्र हैं, असे भले आदमियों को नहीं, परन्तु उनको अवश्य ही, जिनमें कुछ सच्चा जीवन है, और अपने पवित्र कर्तव्य और पवित्र अधिकार को एक ही गाड़ी की जोड़ी समझते हैं, इस समय आगे बढ़ना चाहिए, और अपनी स्थिति की सफाई कर डालनी चाहिए. आज यदि ‘विजय’ की ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ राज विद्रोहात्मक समझी जा सकती है, और उसके लिए देहली का डिप्टी कमिश्नर ‘विजय’ के प्रिंटर को धमका सकता है, तो हिंदी पत्र खयाल रखें कि आज ‘विजय’ की बारी है, तो कल उनकी. उन्हें निर्णय करना है, उनकी संपादक समिति को-यदि इस नाम की कोई संस्था है तो- इस बात का निर्णय करना है कि ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ ऐसे साधारण कविता भी ‘सेडीशन’ के विष से भारी हो सकती है? यदि उसमें विष नहीं है, तो हिंदी पत्रों को साहस होना चाहिए कि वे अपने भविष्यत् के विचार से अपने दरवाजे पर आये हुए निरंकुशता के इस भेड़िये को दूर खदेड़ दें. करना हो सो आज कीजिये या फिर कभी नहीं-यही सन्देश है, जो देहली की घटनाएँ हिंदी पत्रों को दे रही हैं. इसका सुनना और न सुनना उनका काम है. वे गाफिल रहें, तो समय अपने निर्दयी हाथों से एक दिन उनके सिर पे नोकीली कील ठोंक देगा.

(नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी का यह लेख 29 नवम्बर 1914 को ‘प्रताप’ में प्रकाशित हुआ था.)

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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