आपराधिक मामलों में अभियुक्तों के मीडिया ट्रायल पर सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की चिंता

नई दिल्ली। चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने किसी भी मामले में संदिग्धों के मीडिया ट्रायल को लेकर खासी चिंता जाहिर की है। आपराधिक मामलों में मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर दिशा-निर्देश जारी करने पर भी शीर्ष अदालत ने विचार करने का फैसला किया है। केंद्र सरकार की अडवाइजरी की तर्ज पर प्रस्तावित गाइडलाइंस में यह तय किया जाएगा कि क्या पुलिसकर्मी अभियुक्तों को कैमरे के सामने पेश कर सकते हैं या उनकी पहचान जाहिर की जा सकती है या नहीं।

जस्टिस जेएस खेहर

जस्टिस जेएस खेहर ने कहा जारी होगी गाइडलाइंस

जस्टिस खेहर और जस्टिस एन वीर मण की बेंच ने इस मामले में मध्यस्थ वकील गोपाल शंकरनारायण के उस सुझाव पर सहमति जताई कि मीडिया के लिए पुलिस ब्रीफिंग पर कुछ गाइडलाइंस होनी चाहिए। खेहर ने अपनी टिप्पणी में कहा, ‘किसी शख्स की छवि बेहद अहम है। अगर किसी गिरफ्तार व्यक्ति को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिखाया जाता है, तो उसकी छवि हमेशा के लिए खराब हो सकती है, भले ही उसे बाद में बरी ही क्यों न कर दिया जाए। यह बेहद गंभीर मसला है।’

अदालत ऐसी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें किसी मुकदमे के मामले में पुलिस या जांच एजेंसियों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर गाइडलाइंस जारी करने की मांग की गई है। ये याचिकाएं 1999 से पेंडिंग हैं। एक और मामले में एक संविधान बेंच पहले ही आदेश दे चुकी है कि अगर कोई अभियुक्त ट्रायल के दौरान छवि खराब करने वाले अभियान का सामना करता है, तो वह अपने मामले की रिपोर्टिंग को टालने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र होगा। जानेमाने वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि कुछ मामलों में एफआईआर दर्ज होने से भी पहले संदिग्धों का नाम जारी करने के कारण केस में पहले से विचार तय हो जाने का मामला बन जाता है।

उन्होंने कहा कि मीडिया अक्सर इसे प्रचारित करता है और पूरी तरह से निर्दोष लोगों की छवि ऐसी खराब हो जाती है, जिसे दुरुस्त करना मुमकिन नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘इससे न सिर्फ किसी शख्स की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचता है, बल्कि ट्रायल पर भी असर होता है।’

Edited by- Jitendra Nishad

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