जातीय होली

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होलीगणेश शंकर विद्यार्थी.

जी खोलकर हँसना, बोलना और ख़ुशी मनाना उन्हीं लोगों का काम है जिनके शरीर भले और मन चंगे हों. लेकिन जिनके ऊपर विपत्ति और पतन की घनघोर घटा छाई हो, जिनका घर और बाहर सभी कहीं अपमान हो रहा हो, और जिनकी दुर्दशा उनके सारे पौरुषेय गुणों की जड़ पर कुठार चला रही हो, उनका हँसना-बोलना और ख़ुशी मनाना या तो नीचातिनीत प्रकार की मूर्खता है, या फिर पूरा पागलपन. हमारे सामने होली उपस्थित है. वह रूढि और समाज के नाम पर हमसे अपील करती है कि जी भर हंसो और जी भर ख़ुशी मनाओ. लेकिन उसी के मुकाबले में हमारे सामने नहीं, उन सबके सामने भी जिनके सामने होली अपना मनोहर सन्देश रख रही है, देश और जाति की भयंकर दुर्दशा, उनका हर जगह अपमान, उनकी उन्नति की जड़ पर कुठार चलने वाली शक्तियां, उनको अंधकार में जबरदस्ती घसीट लिए जाने वाली रूढ़ियाँ, नींच-ऊँच का विचार, झूठी बातों पर गर्व, स्वार्थ, फूट, निर्वलता, कापुरुषता आदि-आदि की भयंकर मूर्तियाँ नाच-नाच कर अपने विकट हास्य से हमारे सारे हौसलों को पस्त कर रही हैं.

हमें देश के बड़े भविष्य में पूरा विश्वास है. हमें अपने देश वालों की उज्जवल उन्नति का दृढ़ निश्चय है. संसार में उच्च से उच्च मानसिक, नैतिक, आत्मिक, शारीरिक और आर्थिक जो उन्नति हो सकती है, हमें विश्वास और पूरा विश्वास है कि हम और हमारा देश उसे एक न एक दिन उसे अवश्य पावेंगे. संसार अभी चाहे जितना टेढ़ा रहे और आगे भी वह हमारे रास्ते में चाहे कितने कांटे बोवे, लेकिन हमारे जातीय जीवन में एक दिन ऐसा अवश्य होगा कि उसे हमारे रास्ते में अपनी आँख तक बिछानी पड़ेगी. भविष्य में इतना प्रबल विश्वास है, लेकिन उसके कारण हम अपनी वर्तमान दुर्दशा को नहीं भूल सकते. हंसाने का नहीं, रोने का स्थान है, जब हम देखते हैं कि हर तरह की पराधीनता की बेड़ियों में बंधे होने पर भी, पेट भर भोजन के लिए तरसते और शरीर को रोगों का घर बनाये हुए भी, लोग ऐसे अवसर पर कहकहे मारने से बाज नहीं आते. बाहरी संसार उनके अक्खडपन पर आश्चर्य कर सकता है, लेकिन जिन्हें इस फक्कडपन की तह के भीतर का हाल मालूम है, वे इस सूखे कहकहे का का मूल्य उस गीत से अधिक नहीं रखेंगे, जो रोते हुए भूखे मनुष्य के गले से भिक्षा में कुछ दानों के पा जाने के लोभ से निकलता है.

होली की हंसी-ठिठोली जातीय जीवन के चिन्ह उस समय तक कदापि नहीं कहे जा सकते, जब तक कि उनके वेग में बहने वाले प्राणी मनुष्य के औसत भावों के अधिकारी नहीं बन जाते, जब तक वे अपनी स्थिति को नहीं समझते और उसके समझने पर ह्रदय में जल उठाने वाली अग्नि की शांति का उपाय नहीं करते. हमारी वर्तमान होली रूढ़ि की होली है. उसमें स्वयं जीवन नहीं. काल-चक्र उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए आगे बढ़ रहा है. वह मिट जावेगी और फिर जन्मेगी. फिर जन्म लेगी-लोगों के सर फेरने के लिए नहीं, गलियों के बकवाने के लिए नहीं, फाके-मस्ती में घर-मस्ती का तमाशा दिखाने के लिए नहीं. किन्तु लोगों में जीवन का सन्देश पहुँचाने के लिए, मद और भ्रम से आकाश में उठे हुए सिरों को चरणों के पास ला डालने के लिए, सच्चे प्रेम से करोड़ों बिछुड़े हुए प्राणियों को मानव अधिकारों का अधिकारी बनाने के लिए, कायरों में पौरुषेय गुणों के पैदा करने के लिए जातीयता, मनुष्यता, सेवा-भाव और प्रेम का सन्देश देश के प्राणी-प्राणी को सुनाने के लिए, संसार में देश और देश और देश वालों के लिए उचित स्थान लेने के लिए, और देश की असमानता, भ्रम, स्वार्थ और दंभ को अपनी चिंता में जलने के लिए आर इस पवित्र शुभ होली का नाम होगा जातीय होली.
नोट-प्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का यह लेख प्रताप में 18 मार्च 1914 को प्रकाशित हुआ था.

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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