जेएनयू या फिर दिल्ली के दिल में ‘पाक-प्रेमी’

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जेएनयू का मर्म समझने से पहले कुछ बातें जरूर जान लीजिए। नेहरू ने 1947 में कहा था कि “विश्वविद्यालय का उद्‍देश्य मानवता, सहनशीलता, तर्कशीलता, चिन्तन प्रक्रिया और सत्य की खोज की भावना को स्थापित करना होता है।” शायद उनकी इसी सोच को ध्यान में रखकर 1966 में जेएनयू (जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय) बनाने का सपना देखा गया और 1969 खत्म होते-होते इस विश्वविद्यालय को शुरू कर दिया गया।

जेएनयू का उद्देश्य भी जानिए

जेएनयू का उद्देश्य था राष्‍ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, जीवन की लोकतांत्रिक पद्धति,  अन्तरराष्‍ट्रीय समझ और सामाजिक समस्याओं के प्रति यहां के छात्रों के वैज्ञानिक दॄष्‍टिकोण को विकसित करना। 2016 में इस यूनिवर्सिटी ने सारी मर्यादाओं का तार-तार कर दिया। बुद्धिजीवियों और प्रगतिशील लोगों की खान मानी जाने वाली जेएनयू ने 9 फरवरी की शाम जो किया उसने नेहरु के सपने में आग लगा दी।

जेएनयू

इस दिन यहां के छात्रों ने मानवता नहीं दानवता दिखाई, सहनशीलता की जगह असहनशीलता दिखाई, तर्कों की जगह कुतर्क दिए, सत्य की जगह असत्य का दामन थामा, राष्ट्रीय एकता की जगह देशद्रोह दिखाया, धर्मनिरपेक्षता की जगह सेकुलरिज्म का भद्दा मजाक उड़ाया और समाज के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जगह आतंकी जैसा दृष्टिकोण अपनाया।

कहानी की शुरुआत आतंकी अफजल की बरसी मनाने से हुई। हाथों में पोस्टर लेकर वो नारे लगाए जो राष्ट्रगान गाने वाले किसी भी शख्स की जुबान पर नहीं आ सकते। दरअसल ये विश्वविद्यालय अपनी अलग सोच को लेकर प्रख्यात से ज्यादा कुख्यात होता जा रहा है। इस विश्वविद्यालय के स्वयंभू छात्रनेता जिन विचारों को लेकर अपनी राजनीति की शुरुआत करते हैं उसका फन दुनिया लातों से कुचलती जा रही है। यही वजह है कि यहां के छात्र हमेशा तिलमिलाए और झल्लाए रहते हैं। देश में चाहे कोई व्यवस्था हो उसके खिलाफ रहना और जहर उगलना इनकी दिनचर्या है।

खुद को ये प्रशिक्षु बुद्धिजीवी और प्रगतिशील विचारक से कम नहीं मानते। यहां पढ़ने वाले तमाम छात्रों का अहंकार ही है कि ये अपने विचारों को इस दर्जे का मान बैठे हैं कि देश का हर नागरिक इन्हें विचारहीन नज़र आता है। यहां पढ़ने वाली लड़कियों को फंसाकर उनके साथ सेक्स करना, खुलेआम ड्रग्स लेना, रात-रातभर कैंपस के बाहर ढाबों पर ठहाके लगाना, शराब पीना और बौद्धिकता के नाम पर अपना ज्ञान बांटना इस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले तकरीबन हर छात्र का कॉमन शौक है।

चूंकि जेएनयू में पढ़ने वालों के नाम पर ऐसा ठप्पा लग चुका है कि इन्हें छात्रों की एक अलग ब्रीड के रूप में देखा जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी और होनी भी चाहिए कि ये देश का पहला विश्वविद्यालय था जहां कॉन्डम वेंडिंग मशीन 2009 में इंन्सटॉल की गई थी। अब आप खुद ही फैसला करिए जिस विश्वविद्यालय के छात्र इतने नशीले और रंगीन मिजाज हों उन पर आपके द्वारा अदा किए गए टैक्स का पैसा फूंकना सरकार के लिए कितना जायज है।

अभी तो जेएनयू परिसर में केवल आतंकवादी अफजल की शान में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे हैं। खुदा ना खास्ता अगर कभी पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने की नौबत आ गई तो पाकिस्तान को एक बनी बनाई फौज हिन्दुस्तान के अंदर ही हथियारों से लैस मिल जाएगी।

 

नोट-इस ब्लॉग का जेएनयू के उन छात्रों से कोई लेना-देना नहीं है जो दिल लगाकर पढ़ते हैं।

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