कर्तव्य या प्रायश्चित?

दक्षिण अफ्रीकागणेश शंकर विद्यार्थी।

“इस घोर संग्राम में उनके साथ सारे भारत की गहरी, और हार्दिक सहानुभूति है. केवल भारत ही की नहीं, उन सबकी भी, जो मेरी तरह भारत के निवासी न होते हुए भी, भारतवासियों से सहानुभूति रखते हैं.” ये शब्द उस उदार व्यक्ति के हैं जिसके हाथ में, सौभाग्य से, आज हमारे देश की शासन-डोर है. आगे चलकर, उस अत्याचार का जिक्र करते हुए, जो दक्षिणी अफ्रीका के ‘सुसभ्य’ और ‘दयालु’ शासक हमारे भाइयों पर कर रहे हैं, उदार लार्ड हार्डिंज ने कहा, “यदि दक्षिण अफ्रीका की सरकार अपने को भारत और संसार की नजर में निर्दोष सिद्ध करना चाहती है, तो उसके लिए केवल एक ही रास्ता है, और वह यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य की ओर से एक कमेटी बनाई जाय, और वह क्रूरता की सत्यता और असत्यता की जाँच करे. ….मुझे विश्वास है कि अफ्रीकी सरकार इस बात की आवश्यकता अनुभव करेगी, कि वह उन लोगों के साथ, जो उसी की तरह अंग्रेजी झंडे की प्रजा हैं, बराबरी का बर्ताव करें, और उनके हकों का, जो उन्हें अंग्रेजी राज्य के नागरिक होने की हैसियत से प्राप्त है, पूरा ख्याल रखे.” लार्ड हार्डिंज ने ये बातें मद्रास में, कांग्रेस कमेटी और महाजन सभा के वाइसराय ने भारत सचिव के पास तार भी भेजे हैं कि उस अत्याचार की पूरी जाँच होना चाहिए, जो दक्षिण अफ्रीका के निरंकुश शासक भारतीयों पर कर रहे हैं.
नतीजा कुछ भी हो, लेकिन लार्ड हार्डिंज के इस समय आगे बढ़ने से, देशवासियों के ह्रदय में यह भाव पैदा हुए बिना नहीं रह सकता, कि वे बिल्कुल ही अनाथ नहीं. लार्ड हार्डिंज ने अपनी उदारता, न्याय-परता और राजनीतिज्ञता से भारतवासियों के ह्रदय में घर कर लिया है. लेकिन उनके इस काम से, यद्यपि वह एक साधारण कर्तव्य ही है, कृतज्ञ भारतीय हृदयों में उनका मान कहीं अधिक बढ़ जाएगा. लेकिन हमें दूसरी ओर भी देखना है. हमारे वीर भाई अपनी वीरता, धीरता और दृढ़ता की परीक्षा में पूरे उतरे हैं. उनकी इस तपस्या ने ऐसे आसन हिला दिए, जो हिलने का नाम तक न जानते थे. वीर माताओं और बहिनों के उत्साह और अच्छे प्रभाव ने मुर्दे हृदयों में जान डाली. दक्षिण अफ्रीका रुपी अग्निकुंड में हमारी बिखरी हुई कच्ची जाति तपाई गई, ठोंकी गई और संसार अब आश्चर्य से देख रहा है, कि उसका कच्चा-पने दूर हो गया. अब वह बिखरी हुई नहीं, वह पक्की है-और ऐसी पक्की, जैसी संसार की कोई भी जाति. हमारा देश भी परीक्षा दे रहा है. देशवासियों ने बतला दिया कि उनके पास अपने भाइयों के दुःख में दुखी होने वाला ह्रदय है. साथ ही लार्ड हार्डिंज की कृपा से, हम देखते हैं, कि देश की सरकार भी इस मामले में हिली-डुली है. लेकिन “मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक.” हमारी गवर्नमेंट एक स्वतंत्र गवर्नमेंट नहीं. वह इतनी भी स्वतंत्र नहीं, जितने कि अंग्रेजी राज्य के अन्य कितने ही देश. यदि कनाडा, आस्ट्रेलिया या दक्षिण अफ्रीका वाले किसी देश में इस तरह सताए जाते, जैसे आज हमारे भाई सताए जा रहे हैं, तो फल यह होता, कि ये देश उस देश को सजा देने को तैयार करते. लेकिन भारत सरकार इस हालत में ज्यादा से ज्यादा यही कर सकती कि वह इंगलैंड से पाना दुखड़ा रोती और इस मामले में भी यही किया गया.
लेकिन इस विषय पर इंगलैंड में क्या हो रहा है? वहाँ के पत्रं ने हिन्दुस्तानियों के साथ सहानुभूति प्रकट की है. लार्ड एम्प्थल, सर विलियम वेडरबर्न आदि कितने ही न्यायप्रिय अंग्रेज दक्षिण अफ्रीका की ज्यादती से बड़े ही दुखित हुए हैं. उदार व्यक्तियों की उदारता के लिए हम हिन्दुस्तानियों के ह्रदय में कृतज्ञता की काफी मात्रा है लेकिन जब हम आँखें खोलकर इंगलैंड के कर्तव्य पर विचार करते हैं, तब हम सोचते हैं, कि इंगलैंड का भारत के प्रभु होने की हैसियत से, साथ ही उन पवित्र वचनों के कारण जो हमें महारानी विक्टोरिया, महराज एडवर्ड और महाराजा जार्ज से मिले हैं, उससे वह बहुत पीछे हैं, तो हमें उसकी इस अवस्था पर बड़ा ही दुःख होता है. कर्तव्य नहीं, कर्तव्य बहुत ही पवित्र शब्द है, हम इंगलैंड से कर्तव्य-पालन नहीं चाहते. हम नहीं चाहते कि वह इस ख्याल से इस मामले को अपने हाथ में ले, कि भारत के प्रभु होने के कारण उसे कुछ न कुछ करना ही चाहिए. हम नहीं चाहते कि वह सम्राट के शब्दों की पवित्रता की रक्षा करने ही के विचार से आगे बढ़े. बल्कि हम चाहते हैं-हमीं नहीं संसार चाहता है, और चाहेगा-कि वह अपने उस पाप का प्रायश्चित करे, जिसके कारण आज हिन्दुस्तानियों को उसकी दीन-हीन अशक्त प्रजा को इस तरह ही से देश से बाहर, लेकिन उसी के झंडे तले, भयंकर अत्याचारों और अपमान का शिकार बनना पड़ता है. उसी ने 1859 में हिन्दुस्तानियों को जबरदस्ती दक्षिण अफ्रीका का रास्ता बतलाया था. दक्षिण अफ्रीका आदि के गोरों को, यदि कुलियों की जरूरत थी, और यदि हिंदुस्तान की आबादी बहुत बढ़ रही थी, तो क्या ये कुली इंगलैंड, स्काटलैंड आदि से नहीं भरती किये जा सकते थे, और क्या वहाँ की भी आबादी नहीं बढ़ रही थी?
इंगलैंड का इतना ही कसूर नहीं. उसने अपनी कमजोरी से, दक्षिण अफ्रीका की सरकार को एक ऐसा कानून, अपनी ही रजामंदी, से पास कर लेने दिया, जिससे दक्षिण अफ्रीका में बसने वाले गैर यूरोपियन लोगों को वोट देने का कोई अधिकार नहीं रह गया. ट्रांसवाल से लड़ाई छेड़ दी गई, और संसार में प्रकट किया गया कि प्राणियों और धन के इस महायज्ञ का एक कारण भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों का समूल नष्ट करना भी है. और अब अंतिम गलत, और कमजोरी का नमूना लीजिये. लन्दन में कहा जा रहा है, इस मामले में इंगलैंड के बीच में पड़ने की जरूरत नहीं. हम इंगलैंड के इस भाव को कमजोरी के नाम से इसलिए पुकारते हैं कि एक तरफ, दक्षिण अफ्रीका के बोथा और फिशर नीली-पीली आँखें करके कह रहे हैं कि इंगलैंड का आगे बढ़ना दक्षिण अफ्रीका के भीतरी कामों में हस्तक्षेप करना होगा, और दक्षिण अफ्रीका इसे सहन न कर सकेगा, और दूसरी ओर, इंगलैंड है, जो अपने आप ही दबा जाता है.
इंगलैंड की ऊपर कही गई कमजोरियों का प्रायश्चित यही है, कि वह भारतवासियों की-उन 33 करोड़ आदमियों की-जिन्हें संसार के विकास की ओर बढ़ने वाली शक्तियों ने बिना कारण ही उसके अधीन किया है, स्वत्व-रक्षा के लिए आगे बढे. यदि वह आगे बढ़ने से हिचकता है, तो हमें बड़े ही दुःख से कहना पड़ेगा, कि इंगलैंड की, जिसने स्वतंत्रता, और स्वत्व-रक्षा के लिए विश्व-प्रसिद्ध सपूत पैदा किया थे, जो स्वाधीनता के विकास की भूमि समझा जाता है, जो सदा निर्बलों का पक्ष लेने और अत्याचार के मेटने के लिए विख्यात है, जिसने संसार से गुलामी की प्रथा उठा दी थी, और जिसने पीड़ितों के लिए खून बहाया था, उस इंगलैंड की-नैतिक साहस की उस शक्ति-मयी मूर्ती की-नैतिक मृत्यु हो गई. और इंगलैंड की इस नपुंसकता पर, हमें अपनी क्षीण शक्ति से अपने दीन-हीन कर्मवीर भाइयों को, कर्म-वीर गाँधी के शब्दों में, यही कहना पड़ेगा-‘किसी भी नागरिक का यह कर्तव्य नहीं, कि वह उन कानूनों की आँख मूंदकर उपासना करने लगे, जो उसके ऊपर लगाये जायं. यदि मेरे देश-वासियों को ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास है, तो उन्हें मानना चाहिए, कि राष्ट्र उनके शरीर को कैद कर सकता है, लेकिन उनके ह्रदय, उनकी इच्छा, उनकी आत्मा सदा ऐसी स्वतंत्र रहेंगी, जैसी आकाश की चिड़िया तेज से तेज तीर की पहुँच से भी बाहर है’.
नोट-श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह सम्पादकीय लेख प्रताप के 30 नवम्बर 1913 के अंक में प्रकाशित हुआ था. (साभार)

साभार- 

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