सरकारी अस्पतालों में दवा संकट गहराया, नीति में होगा बदलाव!

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देहरादून। उत्तराखंड के सभी सरकारी अस्पतालों में दवा संकट गहरा गया है। सामान्य दवाओं के साथ ही कई जीवन रक्षक दवाएं भी खत्म हो चुकी हैं। दवाएं उपलब्ध नहीं होने से सबसे ज्यादा संकट पर्वतीय क्षेत्रों में दिखेगा, जहां मरीज पूरी तरह से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर ही निर्भर हैं। शासन स्तर से महानिदेशालय को 23 करोड़ रुपये जारी हो चुके हैं, लेकिन दवा खरीद नीति की पेचीदगी के चलते फिलहाल अगले दो सप्ताह तक दवा आने की उम्मीद नहीं है जिससे दवा संकट बढ़ने की आशंका है। स्वास्थ्य महानिदेशालय से सरकारी अस्पतालों को कुछ दवाएं तो भेजी गई हैं, लेकिन मरीजों की संख्या के लिहाज से यह नाकाफी साबित हो रही हैं। सरकारी अस्पतालों से सामान्य रोगों के साथ ही गंभीर रोगों की दवाओं की मांग भी भेजी गयी है। लेकिन जब निदेशालय में ही दवाओं का स्टॉक नहीं है तो अस्पतालों को कहां से मिले।

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दवा संकट पर शासन में मंथन 

दून अस्पताल समेत कई सरकारी अस्पतालों में गंभीर रोगों की भी दवाएं खत्म हो गई है। दून अस्पताल से उपलब्ध कराई जाने वाली 100 में से 18 दवाएं पूरी तरह खत्म हो गयी हैं, जबकि अन्य दवाओं का स्टॉक खात्मे की कगार पर है। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. कुसुम नरियाल ने इस संबंध में स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी से मुलाकात कर उन्हें भी पूरी जानकारी दी। मंत्री ने जरूरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के निर्देश तो दिए हैं, लेकिन नई खरीद प्रक्रिया के लिए कम से कम दो सप्ताह का समय और लगेगा।

जेनेरिक दवाओं का भी टोटा

दून अस्पताल में दवा खत्म होने के साथ ही जेनेरिक स्टोर में भी दवाओं का टोटा है। जन औषधि केंद्र में कुछ समय पहले ही दवाओं की आपूर्ति तो की गई, लेकिन यहां कई जरूरी दवाओं की अभी भी कमी है। कई ऐसी दवाएं भी हैं, जिनका जेनेरिक विकल्प मौजूद नहीं है।

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नई खरीद नीति में होगा बदलाव

नई औषधि क्रय नीति की विसंगतियों के चलते दवाओं की खरीद ठप हो गयी है। प्रदेश में दवा संकट खत्म करने को औषधि क्रय नीति में बदलाव हो सकता है।  विभागीय मंत्री, शासन और स्वास्थ्य महानिदेशालय के स्तर पर अब तक हुई वार्ता में इसी मुद्दे पर सहमति बनी है। नई औषधि क्रय नीति की तमाम जटिल शर्तों के चलते किसी भी मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से दवाओं और अन्य सामान की खरीद नहीं हो सकी है। टेंडर में शामिल होने के लिए राज्य की फर्मों का 20 करोड़ और राज्य से बाहर की फर्मों का 70 करोड़ से ज्यादा का टर्नओवर अनिवार्य है।

दवा कंपनियां नहीं दिखा रहीं दिलचस्पी

इसके अलावा निर्माता फर्म को दवा 23 फीसदी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की शर्त का भी पालन करना होगा। इसके चलते सीएमओ कार्यालय से हो रही खरीद में किसी भी दवा निर्माता फर्म ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है। दवा संकट की सबसे बड़ी वजह भी यही बनी है। पहले अस्पताल और जिला स्तर पर लोकल परचेज (एलपी), ईएसआई, कोटेशन बेस, इमरजेंसी और रेट कांट्रेक्ट (आरसी) के जरिये दवा खरीदने का विकल्प था, लेकिन केंद्रीयकृत व्यवस्था लागू होने के बाद केवल महानिदेशालय और सीएमओ के स्तर से ही दवाओं की खरीद हो सकती है।

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हेल्पलाइन होगी जारी

दवा संकट पर शासन ने एक हेल्पलाइन शुरू करने का फैसला किया है। दो दिनों में महानिदेशालय हेल्पलाइन नंबर जारी कर देगा, जो सभी अस्पतालों में होगा। अगर मरीज को अस्पताल से दवा नहीं मिलती है तो वह उस नंबर पर अपनी शिकायत दर्ज करवा सकेगा। उसका मिलान स्टॉक से होगा और शिकायत सही पाई गई तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी होगी।

103 दवाएं खरीद सकते हैं बिना टेंडर

103 दवाएं ऐसी हैं, जिनकी खरीद टेंडर के बिना की जा सकती है। केंद्र सरकार की चिह्नित पांच दवा निर्माता पीएसयू से इन्हें कभी भी खरीदा जा सकता है। इनकी खरीद की दरें भी तय हैं।

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