जिला जेल बना देवी माँ का मन्दिर, डकैत बन गई ‘पुजारिन’

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कानपुर। नवरात्र के अवसर पर जिला जेल देवी माँ का मन्दिर बन गया है। सुबह से ही कैदी भक्तों द्वारा लगाये जाने वाले नारों से जेल गूँजने लगती है। जहाँ अपराध के बजाय माँ दुर्गा की पूजा अर्चना की चर्चाएं चल रही हैं। यह सब क्रूरता के चोले को पूरी तरह से उतार चुकी दस्यु सुंदरी कुसमा नाइन के भक्ति भाव का नतीजा है। कुसमा ने नवरात्र व्रत रखा हुआ है। जेल के साढ़े तीन सौ से अधिक कैदी भी दस्यु सुंदरी से प्रभावित होकर पूरे नवरात्र व्रत का पालन कर रहे हैं। जबकि कई सैकड़ा कैदी दो-तीन दिन का व्रत रखकर सभी का साथ दे रहे हैं। कुसमा नाइन तो दिन में मात्र एक बार जल ग्रहण करती हैं। पूरे दिन व देवी माँ की पूजा में लीन रहती हैं। जेल अधीक्षक ने बताया कि उन्होंने भी इनका साथ देते हुए जेल में दुर्गा माँ की प्रतिमा रखवाकर भक्त बने कैदियों का साथ दिया है। जिससे उन्हें नवरात्र व्रत में किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े।

 दस्यु सुंदरी कुसमा

कुसमा बनी पुजारिन

कभी बीहड़ में अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात कुसमा नाइन अब पुजारिन बन गई हैं। अनपढ़ होने के कारण वह दूसरे बन्दियों से रामायण और गीता पढ़वाकर सुनती हैं। कोई भी व्रत नहीं छोड़ती हैं। कहती हैं कि शायद यह सब करने से भगवान पाप कम कर दें। उम्र बढ़ने के साथ इनकी दिनचर्या दूसरे कैदियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। उन्होंने कैदियों की मदद से राम लिखना सीख लिया है। जब खाली होती हैं तो कापी में राम-राम लिखने लगती हैं। फक्कड़ बाबा ने इन्हें गीता व रामायण भेंट की थी। जेल अधीक्षक विजय विक्रम सिंह बताते हैं कि कुसुमा का जादातर समय पूजा पाठ में ही गुजरता है।

बेहमई कांड का बदला लेने को बनी थी डकैत

बेहमई कांड में जहां फूलन देवी ने 22 ठाकुरों को मौत के घाट उतारा, वहीं कुसमा नाइन ने बेहमई कांड का बदला लेने के लिये 14 मल्लाहों को मौत के घाट उतार दिया था। बेहमई कांड कानुपर देहात के राजपुर के इलाके में हुआ था। बेहमई वारदात के समय कानपुर देहात अस्तित्व मे नहीं था। वहीं मईअस्ता कांड के समय औरैया जिला अस्तित्व मे नहीं था। तब इटावा जिले की औरैया तहसील हुआ करती थी। पुतली बाई के बाद कुसमा नाइन को चंबलकी खूंखार दस्यु सुंदरी के रूप मे जाना जाता है। कुसमा नाइन ने संतोष और राजबहादुर नाम के मल्लाह बिरादरी के दो युवको की आंखे निकाल कर कूरता का एक नमूना पेश किया था।

बहुत खूंखार थी कुसमा

कुसमा नाइन को कुख्यात एवं खूंखार दस्यु सुंदरियों के रूप में जाना जाता है। 90 के दशक में चंबल के बीहड़ों में फूलन और कुसमा ने अपने आतंक का डंका बजा रखा था। विक्रम मल्लाह के साथ फूलन और बीहड़ के गुरु कहे जाने वाले दस्यु सरगना रामआसरे तिवारी उर्फ फक्कड़ के साथ कुसमा थी। विक्रम मल्लाह का साथ फूलन ने और फक्कड़ का साथ कुसमा ने आखिर तक नहीं छोड़ा। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के टिकरी गांव की रहने वाली कुसमा को विक्रम मल्लाह गिरोह का माधो सिंह गाव से उठा कर अपने साथ बीहड़ में ले गया था। यह बात 1978 की है बाद में गिरोह बंटने पर कुसमा नाइन कुछ दिनों लालाराम गिरोह में भी रही किन्तु सीमा परिहार से लालाराम के निकटता के चलते वह राम आसरे उर्फ फक्कड़ के साथ जुड़ गई। करीब दस साल से ज्यादा फक्कड़ के साथ बीहड़ों में बिताने के बाद 8 जून, 2004 को भिंड में मध्य प्रदेश पुलिस के सामने उसने आत्म समर्पण कर दिया कुसमा फक्कड़ को इस कदर प्रेम करती थी कि जब 2003 में फक्कड़ बुरी तरह बीमार था और बंदूक उठाने में असमर्थ था, तब कुसमा न केवल उसकी सेवा करती थी, बल्कि साए की तरह हमेशा उसके साथ रहती थी।

इस दौरान कई मुठभेड़ में वह फक्कड़ को पुलिस से बचाकर भी कई बार सुरक्षित स्थान पर ले गई। कुसमा फक्कड़ को लेकर जितनी कोमल थी, दुश्मनों के लिए उतनी ही निर्दयी और बर्बर। दस्यु फूलन देवी के द्वारा 14 फरवरी 1981 को किये गये बेहमई कांड (जिसमे फूलन ने एक साथ करीब 22 ठाकुरों को लाइन में खड़ा कर मौत के घाट उतार दिया था) का बदला कुसमा ने 23 मई को उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के मईअस्ता गांव के 13 मल्लाहों को एक लाइन में खड़ा कर फूलन की तर्ज पर ही गोलियों से भून कर लिया था। इतना ही नहीं फक्कड गिरोह से गद्दारी करने वाले संतोष और राजबहादुर की चाकूं से आंखे निकाल कर कुसमा ने ‘प्रेम’ के साथ-साथ ‘बर्बरता’ की भी मिसाल पेश की । 1976 से 1983 तक चंबल में फूलन ने राज किया और चर्चित बेहमई कांड के बाद उसने 12 फरवरी, 1983 को मध्य प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।

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