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एक तिहाई से ज्यादा दिल्लीवासियों के फेफड़े खराब

नई दिल्‍ली दिल्ली में प्रदूषण का हाल तो जग जाहिर है। ऑड-ईवन योजना के साथ-साथ दिल्ली में डॉक्टरों ने एक और अभियान शुरू किया था। इसमें दिल्‍ली में प्रदूषण से दिल्लीवासियों के फेफड़ों पर प्रदूषण के असर की जांच की गई थी। इस टेस्ट के नतीजे चौंकाने वाले हैं। दिल्ली के 34 फीसद लोग फेफड़े की इस जांच में फेल पाए गए हैं। इन लोगों को इलाज की जरुरत है।

दिल्‍ली में प्रदूषण

दिल्‍ली में प्रदूषण का असर

एक जनवरी से शुरू हुए इस अभियान में अब तक 3,019 लोगों ने अपनी जांच कराई। इनमें से 1,037 के फेफड़े फेल पाए गए हैं। इस आंकड़े से यह भी साफ हो रहा है कि दिल्ली में प्रदूषण का असर किस हद तक लोगों के फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है, मगर अनजान लोग कुछ तो जानकारी के अभाव में और कुछ मजबूरी में, इसी प्रदूषित हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

55 में से 16 लोगों के फेफड़ें खराब

दिल्‍ली में प्रदूषण के कारण यह अभियान एक जनवरी को सचिवालय से शुरू किया गया था। दो जनवरी को दिल्ली के 10 इलाकों में मोबाइल वाहन के जरिए मौके पर ही लोगों के फेफड़ों की जांच शुरू कर दी गई। शुरू में लोगों ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन धीरे-धीरे लोग अपना टेस्ट कराने लगे। दो जनवरी को अपने फेफड़े की जांच के लिए केवल 55 लोग आए थे, जिसमें दिल्ली में प्रदूषण से 16 के फेफड़े खराब पाए गए। तीन जनवरी को 88 लोगों ने जांच कराई, जिसमें से 25 लोगों के फेफड़े खराब पाए गए। इसी तरह 4 जनवरी को अभियान में 188 लोगों ने अपने फेफड़े का टेस्ट कराया, इनमें से 64 लोगों के फेफड़े खराब पाए गए थे। इस तरह 15 जनवरी तक अभियान में तीन हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया।

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज ने चलाया अभियान

इस अभियान की अगुवाई कर रही मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर सुनीला गर्ग ने कहा कि अभियान सफल रहा और तीन हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। जांच में पाया गया कि 34 फीसद लोगों के फेफड़ों में कमी है और इस कमी की वजह दिल्ली का प्रदूषण स्तर भी हो सकता है। पहली बार दिल्ली में फेफड़े की जांच के लिए इतने बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया और लोगों ने इसमें खुलकर हिस्सा लिया।

स्पाइरोमीटर मशीन की मदद से किया गया अभियान

यह जांच स्पाइरोमीटर मशीन की मदद से की गई। अगर जांच में लंग्स फंक्शन का अनुपात 70 फीसद से कम आया तो आगे की जांच की सलाह दी गई। 70 फीसद से कम होने की स्थिति में आगे की जांच जरूरी है, ताकि यह साफ हो सके कि फेफड़े कितना खराब है और व्यक्ति की स्थिति कितनी गंभीर है।

 

(नवभारत टाइम्‍स से साभार)

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