दूसरा कृपाण

कानूनगणेश शंकर विद्यार्थी।

देश के समाचार पत्रों के सिरों पर लटकाने के लिए एक और कृपाण की धार तेज की जा रही है. प्रेस एक्ट की जकड़न थोड़ी न थी, और शांति के परम सौभाग्य से, ‘अशांति के फ़ैलाने वाले’ समाचार पत्रों का गला घोंटने के लिए अन्य कानूनों की कमी नहीं, लेकिन, सरकार ने अपने इन शस्त्रों में एक की और वृद्धि करना आवश्यक समझा है. प्रेस एक्ट द्वारा धन की मार पड़ती है. इस जबरदस्त मार के सामने अन्य कानूनों की सख्तियाँ मंद पड़ गई. धन की हानि होने लगी, लेकिन आदमियों की इतनी पूछ न रही. पर अब देश के समाचार पत्रों के भाग्य से वह दिन भी शीघ्र ही आने वाला है, जब उन पर दोनों तरह की-धन और आदमियों की मार पड़ने लगेगी.

इस नए कानून का नाम है (Contempt of Courts) अदालत का अपमान करने वाले समाचार-पत्र लेखक (Journalist) को छह मास के लिए बड़े घर की हवा खाना पड़ेगा और यह ‘अपमान’ इन तीन बातों में से किसी एक के करने से भी हो जाएगा. (1) बोले लिखे हुए शब्दों द्वारा या चिन्ह या संकेत, या और किसी तरह किसी अदालत का अपमान करना, या अपमान करने की चेष्टा करना (2) जो मुकदमा चल रहा हो, उस पर उसके वकील हाकिम, ज्यूरी या किसी भी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में कुछ सम्मति प्रकट करना, जिससे इनमें से किसी के मन में भी पक्षपात पैदा हो जाने का भय हो, (3) चलते हुए मुक़दमे की गलत रिपोर्ट छापना. मुकदमों का फैसला हो जाने पर समाचार-पत्रों में जो तीव्र आलोचना हुआ करती थी, और जिनसे, यह कोई नहीं कह सकता कि कोई लाभ ही नहीं होता था, वह अब इस कठोर कानून की पहिली धरा से दब जाएगी. निःसंदेह सरकार उन आलोचनाओं का बचाव रख रही है, जो नेक इच्छा से की जाएंगी, लेकिन इस नेक इच्छा की परख ही क्या? जिस आलोचना में समाचार-पत्र लेखक का पाना व्यक्तिगत स्वार्थ न हो, और जिससे वह सत्य पर प्रकाश डालने की चेष्टा करता हो, वह तीव्र होने पर भी हम उसे नेक नियति ही से लिखी हुई कहेंगे, लेकिन हम जो चाहें समझें, जिनके हाथों में कानून होगा, वे शायद ही ऐसा समझें. क्योंकि यदि उनको इतना ही समझाने की आवश्यकता समझी जाती, तो इस कानून में कम से कम इस बात के होने की आवश्यकता ही न थी.

दूसरी बात चलते हुए मुकदमों पर विचार प्रकट करने की है. जितने अच्छे पत्र हैं, वे मुकदमों पर उस समय तक सम्मति नहीं प्रकट करते जब तक उनका फैसला नहीं हो जाता. इसका कारण यही है, कि किसी के पक्ष में बात कह देने से कहीं ठीक-ठीक न्याय होने में बाधा न पड़े. इसमें भी संदेह नहीं, कि बहुत से अदूरदर्शी पत्र इस नियत को नहीं निवाहते, (जैसा कि कानपुर मस्जिद के मामले में कितने ही मुस्लमान पत्रों का हाल था, या कभी-कभी किसी एंग्लो इण्डियन पत्र की हालत होती है ). लेकिन हमें कहना पड़ता है कि समाचार पत्रों की अपेक्षा इस नियम को सरकार ने ही अधिक तोड़ा है. कलकत्ते में इस समय एक पुलिस इन्स्पेक्टर की हत्या का मुकदमा चल रहा है. उसके एक अंग का फैसला हो चूका है, जिससे अभियुक्त, जो हत्यारा समझा गया था, हत्या के दोष से मुक्त हो गया, लेकिन पुलिस ने तो उसे पहिले ही पूरा हत्यारा, समझ लिया था और पुलिस कमिश्नर ने इस सफलता पर पुलिस को इनाम भी दे डाला था. क्या मुकदमा का फैसला हो जाने के पहिले इनाम बांटना और अभियुक्त को हत्यारा समझ बैठना ठीक-ठीक न्याय होने में बाधक होना नहीं है? एक बात और भी याद आई-कानपुर के प्रसिद्ध मस्जिद केस में भी ऐसा ही हुआ था और मुकदमें को किसी ओर भी समाप्त होने के पाहिले पुलिस वालों की जेबों में इनाम पहुँच चुका था.

तीसरी बात मुकदमों की गलत रिपोर्ट छापने की है. लेकिन, हमें दुःख है कि समाचार पत्र वाले (इस देश के नहीं, किसी भी देश के) न ब्रह्मा हैं और न महेश ही, जो त्रिकालज्ञ होने के कारण सब बातों को अच्छी तरह जानते-बूझते हों, और जिससे उनके गलती करने का कोई डर ही न हो. दैनिक पत्रों की रिपोर्टों में बहुधा गलतियाँ हो जाया करती हैं, लेकिन जान-बूझ कर वे नहीं घुसेड़ी जातीं. केवल सुधार ही सुधार की चिंता में एक दैनिक पत्र के 24 घंटे हाथ से निकल जाते हैं, और इसी से कहना पड़ता है कि इन भूलों का बिलकुल सुधार असम्भव है. लेकिन संभव हो चाहे असंभव, कानून समाचार-पत्र-लेखक को इसके लिए छह मास की कैद की भेंट उसके आगे रखता है. यह सब कुछ देशी पत्रों के लिए ही है, एंग्लो इण्डियन पत्र तो कानून से बाहर ही हैं. कानून पर सम्मतियाँ प्रकट करने के लिए सबको मौका दिया गया है, लेकिन जब उसकी पूरी तैयारी हो चुकी है, तब शायद ही उसका विरोध उसका कुछ बिगाड़ सके.
नोट-गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख प्रताप के 29 मार्च 1914 के अंक में प्रकशित हुआ था.

साभार– dineshpathak2016.blogspot.in

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