देश का इतिहास : इन 10 बातों को ज्यादातर लोग सच मानते हैं, लेकिन हैं Fake

देश का इतिहास खुद में अच्छी-बुरी, दोनों तरह की यादें समेटे हुए हैं। इनमें कुछ तस्वीरें हैं जिन्हें गुज़रे वक्त का गवाह बताया जाता है, तो कई बातें भी हैं जिनकी सच्चाई कम ही लोगों को पता है। इस वजह से ज्यादातर देश का इतिहास उन Fake बातों को भी सच मान बैठे हैं, जो या तो कुछ लोगों ने जानबूझकर फैलाई है या फिर उसकी सच्चाई लोगों को पता ही नहीं हैं।

देश का इतिहास

देश का इतिहास नहीं गांधीजी की ये तस्‍वीर

Dancing Gandhi कही जाने वाली इस तस्वीर में महात्मा गांधी को विदेशी महिला संग डांस करते हुए दिखाया गया है।

असलियत: यह गांधीजी नहीं, उनकी तरह ड्रेसअप ऑस्ट्रेलियन आर्टिस्ट था, जो एक पार्टी में ब्रिटिश महिला के साथ डांस कर रहा है। 1946 का यह फोटो भी सिडनी में आयोजित एक चैरिटी इवेंट का है। इतना ही नहीं, फोटो ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि जिस तरह एक्टर ने धोती बांधी है, वैसे गांधीजी ने कभी नहीं पहनी और न ही वे ऐसी सैंडल कभी पहनते थे। चश्मा भी गांधीजी का नहीं है।

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गांधी ने ऐसा कभी नहीं कहा

‘नज़र के ऊपर नज़र रखना कुछ नहीं, विश्व को अंधा कर देगा’, एक-दूसरे की जासूसी पर निशाना साधता यह कमेंट गांधी जी का बताया जाता है, लेकिन उनका है नहीं।

असलियत- गांधी जी की पूरी लाइफ-हिस्ट्री में इसका कोई सबूत मौजूद नहीं कि यह गांधी जी ने कहा था। असल में यह डायलॉग है जो फिल्म गांधी में उनका किरदार निभाने वाले बेन किंग्सले ने कहा था।

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इंडिया फीफा वर्ल्डकप 1950 से बाहर हुआ क्योंकि…

देश का इतिहास में 1950 फीफा वर्ल्डकप में इंडिया तब शामिल हुआ था, जब 4 टीमों ने अपने नाम वापस ले लिए थे। बताया गया कि इंडिया को इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि हमारे खिलाड़ी नंगे पैर खेलना चाहते थे।

असलियतः ब्राज़ील में हुए इस इवेंट में हिस्सा लेना काफी महंगा पड़ रहा था और AIFF (ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन) को लगता था कि इंडिया के जीतने की संभावनाएं काफी कम हैं, इसलिए बेइज्जती से बचने के लिए (ऐसा कहा जाता है) यह प्रचारित किया गया।

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मिल्खा ने पीछे देखा और हार गए

देश का इतिहास की बात हो और फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की बात न हो ऐसा मुमकिन नहीं। मिल्‍खा सिंह से हमेशा एक सवाल पूछा जाता रहा है कि आखिर 1960 के रोम ओलंपिक के फाइनल में 400 मीटर की दौड़ में सबसे आगे होने के बाद भी उन्होंने पीछे मुड़कर क्यों देखा? कहा जाता है कि मिल्खा ने पीछे देखा और हार गए, जबकि ये सच नहीं है।

असलियतः मिल्खा रेस में शुरू से चौथे नंबर पर थे और अंत में भी चौथे स्थान पर ही आए। पीछे मुड़कर देखने से हार-जीत का तर्क सच नहीं है। यू-ट्यूब पर रोम ओलंपिक में मिल्खा के ढेरों वीडियो मौजूद हैं जिसमें देखा जा सकता है कि सच क्या था।

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हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है?

हॉकी को हमेशा स्कूल की किताबों में भारत का राष्ट्रीय खेल बताया गया, जबकि ये सच नहीं है।

असलियतः दरअसल, देश का कोई राष्ट्रीय खेल घोषित ही नहीं किया गया है। एक आरटीआई के जवाब में खेल मंत्रालय यह साफ कर चुका है।

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रेलवे नहीं है दुनिया का सबसे बड़ा इम्प्लाई बेस

तकरीबन 16 लाख कर्मचारियों वाली इंडियन रेलवे को दुनिया में सबसे ज्यादा नौकरी देने वाला संगठन माना जाता है, जबकि ऐसा है नहीं।

असलियतः फोर्ब्स की the employers with the largest workforces worldwide in 2015 लिस्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग दुनिया का सबसे बड़ा इम्प्लॉई बेस है, क्योंकि उसके 32 लाख कर्मचारी है। दूसरे नंबर पर चीन सेना (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) है, जबकि भारतीय रेलवे और भारतीय सेना इस फेहरिस्त में 8वें और 9वें स्थान पर रखा गया है। रेलवे से ज्यादा कर्मचारी तो वॉलमार्ट के हैं, जिसमें 21 लाख लोग काम करते हैं।

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काशी नहीं है दुनिया का सबसे पुराना शहर

काशी या बनारस या वाराणसी, जो चाहें कह लें, को दुनिया का सबसे पुराना शहर बताया जाता है, जबकि ऐसा है नहीं।

असलियतः दुनिया के सबसे पुराने शहरों में एक दो नहीं, बल्कि कई नाम हैं, जो बनारस से पहले बसे। इनमें सीरिया का दमिश्क, जेरिको, अलेप्पो (सीरिया), एथेंस (ग्रीस) और येरुशलम जैसे कई शहर हैं।

इंडिया 1947 में हुआ धर्मनिरपेक्ष

हमेशा माना जाता है कि 1947 में भारतीय संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को अपनाया गया।

असलियतः सच ये है कि 1976 में एक संविधान संशोधन के ज़रिए ‘सेक्युलर’ शब्द प्रस्तावना में जोड़ा गया।

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हिंदी नहीं है इंडिया की ऑफिशियल लैंग्वेज

असलियतः गुजरात हाईकोर्ट ने 2010 में साफ कर दिया था कि हिंदी को देश की ऑफिशियल लैंग्वेज मानने के लिए कोई रिकार्ड या डिक्लेरेशन मौजूद नहीं है और न ही ऐसा कोई पुराना ऑर्डर है।

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जन-गण-मन नहीं है सबसे बेस्ट

2014 में एक फर्जी ईमेल के जरिए यह झूठ फैल गया कि यूनेस्को ने जन-गण-मन को दुनिया का सबसे बेस्ट नेशनल एंथम माना है।

असलियतः जब ये झूठ फैला तो यूनेस्को ने सफाई भी दी- ‘यूनेस्को दुनियाभर के देशों का प्रतिनिधित्व करता है और इस तरह से किसी को कमतर या बेहतर आंकना उसका काम नहीं है। यूनेस्को के लिए सभी देश बराबर हैं और उनके एंथम भी।’

 

(दैनिक भास्‍कर से साभार)

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