देश का स्वास्थ्य-एक

स्वास्थ्यगणेश शंकर विद्यार्थी।
बड़ा ही अभागा है वह देश, जिसके युवक और युवतियों के चेहरों पर स्वास्थ्य की आनंद-दायिनी झलक देखने में न आवे. ह्रदय के क्लेश का ठिकाना नहीं रहता, जब हम देखते हैं कि ऐसे देशों में हमारा ही देश सबसे आगे बढ़ा हुआ है. देश के युवक और युवतियां नाम के युवक और युवतियां हैं. उनमें से 99 फ़ीसदी अपने अमूल्य स्वास्थ्य को हाथ से खो चुके हैं, और इस बात के पूरे और पक्के साक्षी उन्ही का दबता हुआ ह्रदय, उन्हीं के बैठे हुए गाल और उन्हीं के चुचके और सूखे हुए शरीर हैं.

कमजोर शरीरों से बलवान हृदयों की आशा नहीं की जा सकती और पीले चहरे वाले बलवानों की ठोकरों से अपनी रक्षा नहीं कर सकते. सच है कि जातियों का निवास-स्थान नगर ही नहीं होते और अधिकतर नगर निवासी ही प्रकृति के प्रारम्भिक और आवश्यक स्वत्वों के शत्रु बन जाया करते हैं. लेकिन ह्रदय की अशांति और भी बढ़ जाती है, जब हम दूर नजर फेंकते हैं और उन झोपड़ों को देखते हैं, जिनमें जनता का निवास है. हमारे देश के झोपड़ों में भी विकसित और हंसमुख चहरे, हृष्ट-पुष्ट शरीर और स्वस्थ मधुर कंठों का अभाव है. एक तरफ मलेरिया, हैजा और प्लेग घाट लगाये हुए बैठे हैं, दूसरी ओर अविद्या, अज्ञान, कुरीतियाँ, निर्धनता और तरह-तरह के अत्याचार लोगों को अपने कठोर पैरों तले रौंदकर पूर्व-कथित मूजियों के शिकार बनाने में सुविधाएँ पैदा करते हैं. लखनऊ में इस समय भारत वर्षीय सेनेटरी कांफ्रेंस हो रही है.

तीन दिन की कार्रवाई हम पढ़ चुके हैं. बड़े-बड़े डॉक्टर और स्वास्थ्य रक्षा के गूढ़ और सरल भेड़ों के जानकार जमा हैं. बहसें हो रही हैं. उन बहसों की सारी बातों पर टीका-टिपण्णी करने में हम असमर्थ हैं. कुछ खास बातों पर हम अपना मत प्रकट करना आवश्यक समझते हैं. संयुक्त प्रान्त के गांवों की स्वास्थ्य रक्षा पर बहुत कम धन खर्च किया जाता है. गाँव की आबोहवा अच्छी होने में किसी को संदेह नहीं, लेकिन देहातियों का जैसा रहन-सहन है, वह उनके स्वास्थ्य के लिए जहर का-सा काम करता है. उनके घर क्या हैं, खोहे हैं, जिनमें धूप और हवा की गुजर नहीं. जगह की कमी नहीं, लेकिन जगह की यह अनुचित और अज्ञान पर निर्भर किफ़ायत उनके स्वास्थ्य की इस तरह गला रेतती है कि उन्हें मालूम भी नहीं पड़ता.

घर के आस-पास, और गाँव के चारों ओर कूड़ा-करकट, खूब पड़ा रहता है और ताल-तलैयों में पानी सड़ा करता है. जिन जिलों में सन अधिक होता है, उनके गांवों की तो बड़ी ही बुरी हालत है. मनों सन ताल-तलैयों में सड़ाया जाता है, और इससे इतनी प्रबल दुर्गन्ध उठती है कि जो लोग दुर्गन्ध के अभ्यासी नहीं है, उनका तो वहाँ एक मिनट भी ठहरना असंभव है. और इसमें संदेह नहीं, कि जो लोग अज्ञानवश ऐसी प्रबल दुर्गन्ध के अभ्यासी बनाते हैं, वे अपने स्वास्थ्य को अवश्य कमजोर करते हैं. संयुक्त प्रान्त के गांवों के निवासियों को, सफाई की कसौटी से नापने पर, हम उन्हें बड़ी ही बुरी हालत में पाते हैं. और ऐसी अवस्था में यहाँ के डिस्ट्रिक्ट बोर्डों का चुप-चाप बैठा रहना बड़ा ही अनुचित और तिरस्करणीय है. इन पंक्तियों के लेखक को बहुत दिनों तक मध्य-भारत में रहने का अवसर प्राप्त हुआ है, और वह कह सकता है कि यद्यपि वहाँ के गांवों के रहने वाले अधिक निर्धन हैं, लेकिन वे यहाँ के गाँव वालों से अपने घरों और गांवों को ज्यादा साफ और अच्छा रखना जानते हैं.

दूसरा प्रश्न है विद्यार्थियों के स्वास्थ्य का ख्याल. सेनेटरी कांफ्रेंस में इस पर कुछ लेख पढ़े गए हैं. लेख उपयोगी हैं या नहीं, इस विषय में किसी बात के कहने की जरूरत नहीं, क्योंकि लेख आज से पाहिले भी पढ़े जाते रहे हैं और आज से पीछे भी पढ़े जाते रहेंगे. हम चाहते हैं कि बातों को काम का रूप दिया जाय. विद्यार्थियों का स्वास्थ्य हमारे जातीय प्रश्नों में खास स्थान रखता है. मूर्ख वे लोग हैं, जो यह चाहते हैं कि हमारा लड़का पढ़ता जाय, और बस-चाहे उसका पढ़ना स्वास्थ्य की कीमत पर मोल लिया जाता है. पढ़ने से स्वास्थ्य ख़राब होता है लेकिन इतनी जल्दी नहीं, और न इतनी ज्यादा हालातों में, जैसा आजकल खामखाह समझ लिया गया है. लड़कों के स्वास्थ्य का शिकार करने वाली दूसरी कितनी व्याधियां आज देश में अपना भयंकर खेल खेल रही हैं, और केवल यह चाहते ही नहीं हैं, किन्तु इसके लिए हम मानते तक हैं कि इन व्याधियों से घोर संग्राम करने और उन्हें खुले मैदान परस्त करने के लिए देश के समझदार लोग आगे बढ़ें. झूठी लज्जा बहुत ही बुरी, और इस झूठी लज्जा ने कितने ही अच्छे पिताओं से अपने नौनिहालों के पैरों में सदा के लिए कुल्हाड़ी चलवा दी. लेकिन अब यही बातें सदा होती रहेंगी? क्या भारतीय माता-पिता, अपने अबोध बालकों को अपना जीवन नष्ट करते हुए देखकर भी निर्दयता से अपनी आँखें मूंदे रहने का पाप करते रहेंगे. बुरी आदतों के बुरे प्रभाव को फल लाते देर नहीं लगती और ये बुरे प्रभाव सचेत माता-पिता और कर्तव्यशील शिक्षक की नजर से नहीं बच सकती.

नोट-प्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह लेख प्रताप के 25 जनवरी 1914 के अंक में प्रकाशित हुआ.

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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