देश का स्वास्थ्य – 2

स्वास्थ्यगणेश शंकर विद्यार्थी 

वसंत के आगमन से नव-कुसुमों के विकास की आशा ह्रदय को प्रफुल्लित करती है, लेकिन हर्ष के स्थान पर ह्रदय में वेदना होती है, जब हम देखते हैं कि हमारे पुष्प विकास के पूर्व ही तुषार के शिकार बन जाते हैं और हमारे उद्यान के हरे-भरे वृक्षों की जड़ों में, रूमते-झूमते नव-पल्लवों में कीड़े लग गए हैं. देश के स्वास्थ्य पर चारों ओर से आक्रमण है. ऐसे जातीय दुःख के अवसर पर किसकी आँखों में सरसों फूली है, जो वसंत के वसंती रंग का स्वप्न देखे ? स्वस्थ मन ही वसंत की किल्लोलों का साथ दे सकता है. अस्वस्थ शरीरों का भण्डार बनने वाले देश के लिए तो वसंत का अंत है.
हमारे देहातियों का वह हाल और हमारे नौनिहालों का वह. अब कुछ अपनी देवियों, अपनी घर की लक्ष्मी और अपनी कुलवधुओं, अपनी कन्या और बहिनों का हाल सुनिए. चहार-दीवारी की कभी न टूटने वाली कैद ने शरीर को स्वाभाविक स्वतंत्र वायु के मौके से लाभ उठाने का अवसर तो आज से शताब्दियों पहले से छीन लिया है, लेकिन अब तो कुछ वर्षों से उनकी रही-सही तंदुरुस्ती भी छिनी सी जा रही है. यदि देश के पुरुषों का स्वास्थ्य ख़राब हो रहा है, तो हम कह सकते हैं कि देश की स्त्रियां रोगों का घर बन रही हैं. हमारी आदतें तो बिगड़ रही हैं. जिनको जन्म लेकर मरण तक सिखाया जाता हो कि स्त्रियाँ उन जीवों का नाम है, जो पक्षी से बड़ी होती है, इसीलिए वे लोहे के पिजड़े में बंद नहीं हो सकती, उनके लिए मिट्टी और ईंटों के बड़े-बड़े पिजड़े चाहिए, वे लोग स्त्रियों के स्वास्थ्य की अवनति का अंदाजा ही क्या लगा सकते हैं? या वे लोग स्त्रियों के सुख-दुःख की बात का अनुभव ही क्या कर सकते हैं, जिन्हें अपने स्वास्थ्य की भलाई और बुराई तक का तो रत्ती भर ख्याल नहीं? उस देश के किसी आदमी से पूछ देखिये, जिसने अपनी स्त्री जाति और और अपने स्वास्थ्य का आदर करना अपने बच्चों को सिखाया हो. आपको मालूम होगा कि वह आप और आप की स्त्रियों की दीन-दशा और मूर्खता पर कितना आश्चर्य-और यदि वह सहृदय है तो दुःख-प्रकट करता है?
हमारी स्त्रियाँ लडकपन में तिरस्कार, भाग्य कोसने और खरीद-फरोख्त का कारण बनती हैं. युवावस्था में बच्चे जनने की मशीन और बुढ़ापे में सेविका के पद पर आरूढ़ होती हैं. यह तो साधारण रीति है. सामाजिक अत्याचार, सामाजिक कुरीतियाँ आदि उन्हें कितने ही विशेष रोगों का शिकार बना डालती हैं और जहाँ वे 60 वर्ष तक जीती रहती, वहाँ 30 वर्ष की ही उम्र में उन्हें बुढ़ापा आ घेरता है और 40-50 की उम्र में-यदि वे प्रसव आदि की कठिन परीक्षाओं से बच गईं तो-मृत्यु उनके पास अपना सन्देश भेज देती है. देश के कल्याण के लिए हमें अपनी स्त्रियों की शीघ्र ही सुधि लेना बड़ा ही आवश्यक है. समाज में उनका आदर बढ़ना चाहिए. कन्याओं की शिक्षा में वृद्धि होनी चाहिए.
चीन के प्रत्येक बालिका विद्यालय में धात्री-विद्या और स्वास्थ्य-रक्षा के उपाय पढाये जाते हैं. भारत के कन्या विद्यालयों में सीने, पिरोने, भोजन बनाने आदि के साथ इस विषय की शिक्षा जरूर होनी चाहिए. लड़कियों के विवाह की उम्र भी बढ़नी चाहिए. अब कष्ट से सकुशल बचाने का सुप्रबंध होना चाहिए. दाइयां हैं और पहले भी थीं. लेकिन इनका होना न होना बराबर है. साधारण दाइयां तो बहुधा स्वास्थ को मिट्टी में मिला देने का कारण होती हैं. शिक्षित दाइयां हों और वे भी केवल टकही ही नहीं. म्यूनिसिपलटियों का इस विषय में अच्छी तरह देख-रेख रखना परम-कर्तव्य है. बम्बई और मद्रास की म्यूनिसिपलटियों में कुछ दाइयां इस काम के लिए नियत हैं कि वे लोगों के घरों पर जा-जा कर स्त्रियों को स्वास्थ्य रक्षा की शिक्षा दें. केवल म्यूनिसिपलटी ही क्यों, पढ़े-लिखे और धनवान लोग भी इस विषय में अपनी विद्या और धन से काम लें. शिक्षित स्त्रियों को अपनी बहिनों की दशा सुधारने के लिए दाईगीरी और डाक्टरी की शिक्षा की ओर झुकना चाहिए. धनवानों के लिए यही कहना काफी होगा कि अब देश में धर्मशाले और मंदिरों को बनवाने की जरूरत नहीं, स्त्रियों की स्वास्थ्य रक्षा और उनमें विद्या प्रचार के लिए धन खर्च करना, धर्मशाला इत्यादि के बनवाने से अधिक पुण्य का काम है.
देश में बच्चे बे-तरह मर रहे हैं. कमजोर माता-पिता की संतानें खूब मरना ही चाहें! सेनेट्री कांफ्रेंस में डॉ. कैलाश चन्द्र बोश ने कहा कि बच्चों की अधिक मृत्यु के ये कारण हैं-छोटी उम्र में विवाह, लोगों की गरीबी, दूध का मंहगापन और दाइयों की मूर्खता. बच्चों की अधिक मृत्यु उसी समय बंद होगी, जब हम अपनी कुरीतियों पर विजय पावेंगे. छोटी उम्र के विवाह बंद होने पर हमें निर्धनता इस विषय में अधिक दुःख न देगी. क्या आवश्यकता है विवाह की उस आदमी के लिए जो अपना पेट भी मुश्किल से पाल सकता है? हमारा देश तो लकीर का फ़कीर हो रहा है. जिस तरह से हर आदमी के लिए पैदा होना और मरना आवश्यक है, उसी तरह से विवाह भी हर आदमी के लिए आवश्यक हो रहा है. क्या ही ह्रदय विदारक दृश्य यह है कि घर में खाने के लिए तो दाने नहीं लेकिन मुर्ख माता-पिता इस बात को अपने जीवन का परम पवित्र और आवश्यक कर्म मान बैठे हैं कि दुधमुंहे बच्चे का विवाह शीघ्र करेंगे और बड़ी ही धूम-धाम से! साथ ही तरस आता है उस आदमी पर, जो थोड़ी ही उम्र में आधे दर्जन बच्चों का बाप बन जाता है. प्रकृति की अवहेलना करने और चिंता के कारण शीघ्र ही बूढ़ा हो जाता है और साथ ही सारी जिंदगी दुःख, चिंता और निरंतर परिश्रम में काटकर थोड़े ही काल में मौत का शिकार हो जाता है.
दूध की शुद्धता और मंहगेपन और दाइयों की मूर्खता का तो इलाज करना पड़ेगा. युवकों में-विशेष कर विद्यार्थियों और क्लर्कों में-क्षय का रोग बेतरह बढ़ रहा है. सेनेट्री कांफ्रेंस में डॉ. नेवेल और डॉ. लंके-स्टर, दोनों ने देश में क्षय की भयंकर वृद्धि की बात कही. देश के लिए यह और दुर्भाग्य की बात है. प्लेग, मलेरिया, बेरी-बेरी, काला-आजार आदि सैकड़ों रोग तो देश में अपना डंका पीट ही रहे हैं, उनका जिक्र भी कांफ्रेंस में हुआ था. स्वास्थ्य रक्षा के कितने ही प्रस्ताव भी कांफ्रेंस ने पास किए. मालूम नहीं कि उसके प्रस्तावों के अनुसार कुछ काम भी होगा, या नहीं? इस लेख को हम समाप्त करते हैं, लेकिन अंत में हम देश के गृहस्थो की सेवा में कुछ निवेदन करना चाहते हैं. यदि वे चाहें, तो अपने लड़के और लड़कियों के स्वास्थ्य को अधिकांश हालत में बचा सकते हैं. इसके लिए उन्हें अपनी झूठी लज्जा और स्वास्थ्य रक्षा के उपाय की अज्ञानता की कुर्बानी करनी पड़ेगी. पिता अपने युवक पुत्रों को स्वास्थ्य सम्बन्धी उन सारे खतरों से साफ-साफ आगाह करे, जो उन्हें युवावस्था में पड़ सकते हैं और उनके खतरनाक नतीजे भी उन्हें बतला दें. माताएं अपनी समझदार लड़कियों को उन सारी व्याधियों और उनके उपायों को साफ-साफ बतला दें, जिनका स्त्रियों को अपने जीवन में सामना करना पड़ता है. लड़के और लड़कियों की बड़ी उम्र में विवाह हों और जिनमें शारीरिक दोष हों, वे जहाँ तक बने, विवाह न करें. यदि माता-पिता इसी तरह भटकते रहे, जैसे वे आज भटक रहे हैं, तो दुःख से कहना पड़ेगा, कि देश के स्वास्थ्य को और भी बुरे दिन देखना है.
नोट-श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी का यह सम्पादकीय लेख प्रताप में 1 फरवरी 1914 को प्रकाशित हुआ.

साभार- dineshpathak2016.blogspot.in

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