जब गूंजे थे ये नारे तो पूरे देश की राजनीति में मची थी हलचल

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नई दिल्ली। भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां आये दिन कोई न कोई चुनाव होना लाजिमी है। और जब बात चुनाव की आती है तो लोगों के जेहन में कुछ ऐसे नारे याद होने लगते हैं जो लोगों के दिलोदिमाग में बसे होते हैं। ये एक ऐसी परंपरा है जो आज से नहीं बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय से नारों के जरिए जनता को रिझाने की कोशिश की जाती रही है।कुछ ऐसे ही नारे है जो आज भी लोगों के दिलो दिमाग में बसे हुए हैं। कुछ ऐसे ही नोरों के जरिए पार्टियों ने सत्ता हासिल करने में सफलता भी पाई।

नारों के जरिए

नारों के जरिए जनता को लुभाती पार्टियां

1967 की धुंधली तस्वीरों में एक, दो बैलों वाला चौपहिया उभरता है……बैलों के ऊपर रंगीन झूल डली हुई है। हारमोनियम और तबले वाले बैठे हुए हैं। लाउडस्पीकर पर एक व्यक्ति गा रहा होता है-

भूल ना जाना भारत वालो किसी की होड़ा होड़ी में

देखभाल कर मोहर लगाना दो बैलों की जोड़ी पै

और दूसरी जगह लाउडस्पीकर पर आवाज़ आ रही है

हर हाथ को काम, हर खेत को पानी,

हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी

एक दिन भिड़ंत होती है

इधर “इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं

उधर “जली झोंपडी़ भागे बैल,यह देखो दीपक का खेल

गली गली में शोर है, ( दीपक वाला , बरगद वाला , हाथी वाला, बैलों वाला हलधर वाला ) चोर है

गली गली में झंडी है , इंदिरा गांधी …… है

गली गली में झण्डा है अटल बिहारी …….. है

चुनावी नारों की इस परंपरा में 1971 में इंदिरा गांधी जी के तमाम रीफ़ोर्म्स की उपलब्धियों और संजीव रेड्डी जी वाले प्रकरण पर कॉंग्रेस विभाजन के बाद हुए “गरीबी ह‍टाओ” नारे के बीच नारे आए

खा गयी राशन पी गयी तेल , ये देखो इंदिरा का खेल

स्वर्ग से नेहरू रहे पुकार, अबकी बिटिया जइयो हार

1974 के यूपी चुनावों में नारों की फिर धूम रही

झूठ बोले हलधर वाला गईया बछड़ा से डरियो

दीपक पै मोहर लगाऊँगी तुम देखते रहियो

और जब प्रचारक टोली आमने सामने भिड़तीं तो

दीपक बुझ गयो वा भाई वा , हल टूट गयौ वा भाई वा,

गाय बिछड़ गयी वा भाई वा , बछड़ा खुल गयौ वा भाई वा

अरे बरगद टूटी वा भाई वा वो हाथी भागौ वा भाई वा…..

अटल बिहारी बोल गया इंदिरा शासन डोल गया

1977 में इमरजेंसी के बाद

“सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास तुम्हारा है”

और “इंदिरा भारत हैं और भारत  इंदिरा गांधी है.” ….. “इमरजेंसी अनुशासन पर्व” के नारों के बीच देश पुकार उठा

इमरजेंसी के तीन दलाल, विद्या संजय बंसीलाल

संजय की मम्मी बड़ी निकम्मी

बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है

जमीन गई चकबंदी में, मकान गयौ हदबंदी में,

द्वार खड़ी बइयर चिल्लाए, मेरौ मर्द गयौ नसबंदी में

और बहुत ही जल्दी इंदिरा गांधी जी लौटीं चिकमंगलूर उपचुनाव के साथ

एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर

1980 में बाबू जगजीवन राम को पीएम बनाने के संघ के इरादों वाले माहौल मैं

अपना हक लेके रहेंगे ….” वाले नारे की तीव्र प्रतिक्रिया के साथ नारे उठे

इंदिरा लाओ देश बचाओ

इंदिरा जी की बात पै मुहर लगेगी हाथ पर

जात पै ना पांत पै मौहर लगैगी हाथ पै

आधी रोटी खाएँगे इंदिरा को वापस लाएंगे

1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद तो दो नारों ने ही तूफान ला दिया

जब तक सूरज चाँद रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा

इंदिरा तेरा ये बलिदान नहीं भूलेगा हिन्दुस्तान

और “‘उठे करोड़ों हाथ हैं राजीव जी के साथ हैं

1989 में बोफार्स दलाली की छाया और रामजन्म भूमि आंदोलन के बीच

दो नारों ने एक बार पुनः गैर कॉंग्रेसी प्रधानमंत्री दिया तो भाजपा को भी एक नयी ताकत दी

राजा नहीं फकीर है भारत की तकदीर है

सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं वनाएंगे

1991 की राम लहर में तो पूरी फिजाँ मैं “जय श्री राम” का नारा एक मंत्र बन कर छा चुका था, अयोध्या आंदोलन के नारे भाजपा के लिए प्रयुक्त होने लगे

बच्चा बच्चा राम का बीजेपी के काम का

बीजेपी के काम ना आए वो बेकार जवानी है

जैसे नारों के साथ जब हाथ उठा कर “जय श्री राम” का नारा उठता तो मीलों दूर उसका बायब्रेशन पहुंचता था। लेकिन इसी चुनाव के बीच राजीव जी की हत्या के साथ ही स्थिति बदली और 84 वाले नारों में  इंदिरा गांधी जी के नाम की जगह राजीव गांधी का नाम आ गया और राम लहर वापस लौट गयी।

जब तक सूरज चाँद रहेगा राजीव तेरा नाम रहेगा

राजीव तेरा यह बलिदान याद करेगा हिंदुस्तान

इसी चुनाव मैं यूपी का एक नारा था

जिसने कभी न झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम है

1993 बाबरी ध्वंस के पश्चात भाजपा इस नारे के साथ बड़ी उम्मीद से उतरी

ये तो पहली झांकी है मथुरा काशी बाकी है” ………लेकिन

“मिले मुलायम कांसीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम” का नारा भाजपा और यूपी की राजनीति पर भारी पड़ा।

1996 लोकसभा चुनाव में

सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी अटल बिहारी.

लाल किले से उठी चिंगारी अबके देखो अटल बिहारी

आदि नारों के जरिए एक बार तो अटल जी को प्रधानमंत्री बना ही दिया । वहीं

1997 विधान सभा में BSP का नारा था

बाबा साहब का मिशन अधूरा माया बहन करेंगी पूरा

1998 में भाजपाइयों में जोश भरा

अटल आडवाणी कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान नारे ने

और इसी चुनाव का ये नारा याद आता है तो आज भी भाजपाइयों के रोमांच से रोंगटे खड़ा कर देता है

राजतिलक की करो तैयारी, आ रहे हैं अटल बिहारी

1999 लोकसभा चुनाव एक वोट की हार और कारगिल उपलब्धि के साथ नारा हावी रहा

कहो दिल से, अटल फिर से

2002 में यूपी मैं बीएसपी पूरी तैयारी से उतरी और कहा

बनिया हाफ ठाकुर साफ ब्राह्मण माफ और ब्राह्मणों ने भी कह दिया

पत्थर रख लो छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर

2004 का चुनाव नारों की दृष्टि से नीरस रहा , भाजपा ने बेतुका नारा लगाया “शाइनिंग इंडिया” ‘फील गुड’ तो कॉंग्रेस केवल आम आदमी को क्या मिला कह कर सत्ता पा गयी

2007 में मुलायम राज की अराजकता के मध्य हुये चुनाव में नारे उठे

चढ़ गुंडन की छाती पै मुहर लगेगी हाथी पै

ब्राह्मण शंख बजाएगा हाथी चलता जाएगा और बहनजी की पूर्ण बहुमत की सरकार बन गयी

और 2009 में कॉंग्रेस और भाजपा मैं “जय हो …..” “भय हो.……” का युद्ध चला, वहीं बीएसपी ने कहा

यूपी हुई हमारी है, अब दिल्ली की बारी है’’

और 2014 में कॉंग्रेस

हर हाथ शक्ति हर हाथ तरक्‍की

जनता कहेगी दिल से, कांग्रेस फिर से इस नारे के साथ उतरी

तो वहीं भाजपा के “ट्विंटल-ट्विंकल लिटिल स्टार, अबकी बार मोदी सरकार.” नारों के जरिए ना जाने कितनी चीजों के साथ

“अबकी बार मोदी सरकार” जोड़ दिया। इसी चुनाव में भाजपा की सामूहिक भावना और परिवारमय वातावरण वाली राजनीति को

हर हर मोदी घर घर मोदी नारे ने व्यक्तिवादी राजनीति में बदल दिया

और नारों की परंपरा के लिए जाने जानी वाली भाजपा पर बस एक नारा रह गया

मोदी मोदी मोदी मोदी मोदी ………..

वैसे इस नारे के उभरने की उम्मीद बन रही है जो की यदा कदा हंसी मजाक में चल रहा है

अब तौ बहना गुल्लक तोड़ी मोदी ने नोटबंदी में

Edited by- Shailendra verma

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