निमंत्रण पत्र का जंजाल

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निमंत्रण पत्रराजीव गुप्ता।

विवाह भारतीय सभ्यता में एक तपस्या व संस्कृति है। ये मात्र स्त्री व पुरुष का मिलन ही नहीं बल्कि दो परिवारों के जोड़ने का उत्सव है। ये दो परिवारों के वंश को बढ़ाने की संस्कृति है। आदिकाल में इस पारिवारिक उत्सव को मनाने के लिए समाज के लोगों को एकत्रित किया जाता था। ढोल तमाशे व स्वादिष्ट पकवान खाकर उसके साझी बनते थे। परन्तु आज वैश्वीकरण में उन परम्पराओं और संस्कृतियों  ने अपने रूप बदल लिया है और कई चीजें जो पहले इसलिए शुरू की गयी थीं जिससे समाज में पारिवारिक प्यार बढ़े परन्तु अब समाज में पढ़ने लिखने के साथ साथ आर्थिक संपन्नता बढ़ने से उनके रूप बदलते जा रहे हैं जिससे ये विवाह का जो उत्सव है अब रूप बदल गया है।

निमंत्रण पत्रनिमंत्रण पत्र बने दिखावे का प्रतीक

वही बदलाव व नई व्यवस्थाएँ परेशानी के साथ बुराई व विलासिता का सबब भी बनती जा रही हैं – जैसे निमंत्रण पत्र। आज जिस तरह से गाँव शहर बनते जा रहे है और शहर महानगर बनते जा रहे है उनमे महंगे निमंत्रण पत्र इसे बाँटना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गयी है। निमंत्रण पत्रों पर इतने पैसे खर्च हो रहे हैं कि एक गरीब बेटी का कन्यादान हो सकता है।

आज के हाईटेक समय में इस वयवस्था को व्यक्तिगत निमंत्रण के  रूप में मान्यता होनी चाहिए। जैसे- व्हाट्सप्प, ईमेल, एसएमएस व डाक व्यवस्था से भेजने का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए समाज के लोगों को सहर्ष स्वीकार करके धन व समय बचाना चाहिए। उस धन व समय को परिवारीजन के साथ व्यतीत करके पारिवारिक व सामाजिक प्यार व उल्लास से उत्सव मनाना चाहिए। सम्पूर्ण समाज को इसके लिए पहल करने के साथ जागरूकता के कार्यक्रम अपने-अपने समाज व समितियों व क्लब और व्हाट्सप्प, फेसबुक और ट्विटर पर चलाने चाहिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मुझे अगर कोई निमंत्रण फ़ोन पर देगा तो में उससे सहर्ष  स्वीकार करूँगा।

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