नेत्र दिव्यांगों के लिए वर्चुअल चश्मा और हैप्टिक ग्लब्स, आइआइटी का आविष्कार

कानपुर: नेत्र दिव्यांग भी सामान्य व्यक्तियों की तरह अपने सामने आने वाले व्यक्ति या वस्तु के बारे में जान सकेंगे। इनके दस फिट दूर रहने पर उन्हें इसकी आहट होने लगेगी। दिव्यांगों के लिए यह उपकरण आइआइटी के नेशनल सेंटर फॉर फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स के हेड प्रोफेसर सिद्धार्थ पंडा व एमटेक के छात्र विश्वराज श्रीवास्तव ने एक साल के शोध के बाद बनाया है। चश्मे में प्रोसेसर व कैमरा लगा हुआ है। किसी भी व्यक्ति के आने पर कैमरा चश्मे की स्क्रीन पर आभासी प्रतिबिंब बनाता है। फिर हैप्टिक ग्लब्स कंपन करने लगता है।

 

व्यक्ति जैसे-जैसे पास आता है, कंपन की तीव्रता बढ़ती है। यह इस बात का संकेत है कि कोई या कुछ आपके समीप है। फेस डिटेक्शन टेक्नोलॉजी व्यक्ति या वस्तु में अंतर करती है और चश्मे का स्पीकर इसे बोलकर बताता है। आइआइटी प्रशासन के अनुसार इसकी कीमत एक अच्छे गुणवत्ता वाले मोबाइल के बराबर होगी। प्रयोगशाला के बाद नेत्र दिव्यांगों पर भी इसका सफल परीक्षण हो चुका है।

हैप्टिक ग्लब्स में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस प्रोग्रामिंग की गई है। दस्ताने के वाइब्रेटिंग मोटर और चश्मे के प्रोसेसर को जोड़कर तैयार किया गया यह उपकरण मोबाइल में लगे कैमरे की तरह काम करता है। जैसे हम कैमरे से मोबाइल की सभी पिक्चरों को देख सकते हैं, ठीक उसी तरह चीजों को फेस डिटेक्शन टेक्नोलॉजी के जरिए देखा जा सकता है। यह उपकरण एक ट्रैकिंग डिवाइस के रूप में काम करता है।

आपको बता दें की आइआइटी कानपुर के नेशनल सेंटर फॉर फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स ने नेत्र दिव्यांगों के लिए हैप्टिक ग्लोव तकनीक पर आधारित वर्चुअल चश्मा और हैप्टिक ग्लब्स बनाया है। इन्हें पहनने के बाद व्यक्ति या वस्तु के सामने आने पर दस्ताने कांपने लगेंगे और चश्मा बोलकर बता देगा। चश्मे में डेटा भी अपलोड किया जा सकता है, जिससे स्पीकर वस्तु या व्यक्ति का नाम बोल सकता है।

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