नोटबंदी की समीक्षा

नोटबंदीडा.राधेश्याम द्विवेदी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को जब यह घोषणा की कि केवल चार घंटे बाद में 500 और 1000 के नोट बड़े नोट चलना बंद हो जाएंगे तो पूरा देश सन्न रह गया. यह सरकार का ऐतिहासिक निर्णय है जिससे पूरा देश प्रभावित है. संसद में कामकाज ठप है और आम लोगों का जीवन भी पूरी तरह प्रभावित है. सरकार के इस निर्णय से देश के का 86 प्रतिशत कैश बेकार हो गया, इस स्थिति ने देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है.

सबसे बड़ा कुप्रबंधन :-आजादी की लड़ाई के बाद संभवत नोटबंदी ही ऐसा कदम है, जिसमें समूचा भारत व्यापक स्तर पर प्रभावित हुआ है. हर एक व्यक्ति को नोट बंदी के फैसले ने प्रभावित किया है. अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस बारे में कदाचित सटीक टिप्पणियां की हैं. राज्यसभा में नोटबंदी पर बोलते हुए सत्तापक्ष को कई नसीहतें देने के साथ-साथ, उन्होंने अपने भाषण में नोटबंदी को देश के इतिहास का ‘सबसे बड़ा कुप्रबंधन’ करार दिया. पूर्व पीएम ने इस बाबत बेहद व्यवहारिक ढंग से कहा कि ‘नोटबंदी के उद्देश्यों को लेकर असहमत नहीं हूं, लेकिन इसके बाद बहुत बड़ा कुप्रबंधन देखने को मिला, जिसे लेकर पूरे देश में कोई दो राय नहीं. नियमों में हर दिन हो रहा बदलाव प्रधानमंत्री कार्यालय और भारतीय रिजर्व बैंक की खराब छवि दर्शाता है’.

अर्थव्यवस्था के प्रति जागरूकता : बैंकिंग की ओर मुड़े लोग :- निश्चित रूप से इस फैसले के फायदे भी हैं. फायदा, नुक्सान के सम्बन्ध में दोनों आंकलन, अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्वरुप में विद्यमान हैं. अगर कॉन्सेप्ट के तौर पर बात की जाए तो नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि हर व्यक्ति को अर्थव्यवस्था की कई बुनियादी बातों से दो-चार होना पड़ा है और कहीं ना कहीं उसकी समझ इससे बढ़ी ही है, वह जागरूक ही हुआ है. लोग बड़ी संख्या में बैंकिंग की ओर मुड़े हैं, तो देश की आधी आबादी यानी, महिलाएं भी बैंकिंग से सीधे तौर पर जुड़ी हैं.

अंडरवर्ल्ड की फंडिंग को बड़ा झटका:- इस नोटबंदी के अन्य लाभों में बड़ी संख्या में नकली नोटों की रोकथाम है तो काफी हद तक आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड की फंडिंग को भी एकबारगी बड़ा झटका लगा है. सबसे बड़े मुद्दे काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था पर जिस कंट्रोल की बात कही गई थी वह कितना सफल हुआ है इस बारे में बड़ा विवाद है, भ्रष्टाचार पर भी किस कदर अंकुश लगा या अंकुश लगेगा, इस बात की ठोस तस्वीर सामने नहीं आ पा रही है. बाजारों में गिरावट:- इन सबसे आगे बढ़कर जिन नुकसानों की चर्चा की जा रही है, वह है बाजारों में गिरावट और यह इतनी बड़ी या व्यापक कही जा सकती है कि बैंक ऑफ अमेरिका, मेरिल लिंच और मॉर्गन स्टैनली जैसे संस्थान भारत की रेटिंग गिरा चुके हैं. मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के बाद रेटिंग फर्म मॉर्गन स्टैनली और बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच ने 2016 में भारत के जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 7.7 पर्सेंट से घटाकर 7.4 पर्सेंट कर दिया है. गौरतलब है कि इस कटौती को नोटबंदी के बाद कारोबार में आई गिरावट और मंदी के माहौल का नतीजा माना जा रहा है. यही नहीं मॉर्गन स्टैनली ने 2018 में देश की ग्रोथ रेट के अनुमान को भी 7.8 पर्सेंट से कम कर 7.6 प्रतिशत कर दिया है. इन तथ्यों पर विचार करते हैं तो नज़र आता है कि भारत की अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और इतने बड़े झटके, जिसका असर कम से कम 6 महीने से साल भर तक रहने वाला है, उससे भारतीय अर्थ- व्यवस्था कैसे उबर पाएगी ?

निपटने की रणनीति कारगर नहीं :-राजनीतिक फायदे नुकसान की बात अपनी जगह है, किंतु अलग-अलग इंडस्ट्रीज में जिस तरह गिरावट दर्ज की गई है, आखिर उससे निपटने की क्या रणनीति बनाई गई है या फिर उसके लिए कोई रणनीति बनी ही नहीं है? रणनीति की बात सामने आई तो यह बताना भी जरूरी है कि नोटबंदी के फैसले में आला दर्जे का घटिया प्रबंधन सरकार और रिजर्व बैंक ने दिखलाया है. आखिर बिना आंकलन किए और बिना प्रभाव का अध्ययन किए इतना बड़ा फैसला लिया जाना कहां तक लाजिमी है?

बैंकों में एटीएम पर लंबी-लंबी लाइने:- इस नोट बंदी के चक्कर में तो कई लोगों और संस्थानों को काफी कुछ झेलना पड़ा है, वह भी लंबे समय तक, अगर सरकार की तैयारियां पूरी रहती, उसके आंकलन सटीक रहते, तब शायद इनसे बचा जा सकता था. बेहद आश्चर्य की बात है कि 2000 का नोट लांच हो जाने के कई दिनों के बाद तक एटीएम के सॉफ्टवेयर उसके कंपेटिबल नहीं हो सके थे, नतीजा सौ-सौ के नोट से भरे एटीएम जल्दी खाली हो जाते थे और बैंकों में एटीएम पर लाइने लंबी की लंबी बनी रहती थी. कुछ और व्यावहारिक कठिनाइयों की बात करें तो नोट बंदी के शुरुआती दिनों में ट्रेन इत्यादि के टिकट्स के लिए पुरानी नोट वैलिड की गई थी, जबकि ट्रेनों की पैंट्री कार में ही वह नोट स्वीकार नहीं किए जा रहे थे. शादी-विवाह के सीजन को लेकर सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी है, किंतु तमाम उठापटक के बाद भी कई आदेशों और एडवाइजरी के बाद भी कुछ खास रास्ता नहीं निकाला जा सका. अब अब एटीएम में कैश उपलब्ध नहीं हो पा रहा :-एटीएम को नए नोट के हिसाब से बना लिया है, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं. कई एटीएम में कैश उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आठ नवंबर, 2016 से पहले रिज़र्व बैंक एटीएम नेटवर्क के लिए जो पैसा उपलब्ध कराती थी, वह पैसा आज नहीं मिल रहा है.अब बहुत सारा पैसा बैंक एकाउंट को दिया जा रहा है.मौजूदा समय में मोटा अनुमान ये है कि आठ नवंबर से पहले जो पैसा एटीएम नेटवर्क को मिल रहा था, वह अब 50 फ़ीसदी ही रह गया है.

आयकर अधिनियम में संशोधन:- सरकार की जो सबसे बड़ी आलोचना हो रही है वह है आयकर अधिनियम में संशोधन पेश करने की. एक तरफ प्रधानमंत्री ने कालाधन रखने वालों को 30 सितंबर तक मोहलत दी थी कि अगर उन्होंने स्वेच्छा से अपने कालेधन की घोषणा नहीं की तो दो सौ पर्सेंट का जुर्माना लगा दिया जाएगा, जो उनके कुल धन का टैक्स सहित पचासी पर्सेंट तक हो सकता है. मतलब काले धन वाले सौ रुपए में से मात्र ₹15 सफेद कर सकेंगे, जबकि उनका ₹85 सरकारी खातों में जमा हो जाएगा. बाद में नवंबर के आखिरी दिनों में संसद में बिल पेश कर दिया गया है, जिसमें यह प्रावधान शामिल किया गया कि काले धन वालों को एक और मौका दिया जा सकता है, जिसमें 49.99 परसेंट का टैक्स देकर 25 परसेंट तुरंत वाइट मनी में कंवर्ट किया जा सकता है, जबकि 25 परसेंट शेष धनराशि 4 साल के लिए ब्याज रहित रहेगी किंतु 4 साल बाद उसे भी निकाला जा सकता है.

काला धन वालों को रियायत देना जनता के साथ धोखा:- सवा सौ करोड़ आबादी इसी काले धन को नष्ट किये जाने के लिए इतना कष्ट उठा रही है और प्रधानमंत्री की तारीफ भी कर रही है, तो क्या काला धन वालों को लगातार रियायत देकर जनता के साथ एक तरह का धोखा नहीं किया जा रहा है? हालांकि सरकार पर दबाव की बात भी कही जा रही है, किंतु सरकार को यह सारी स्थितियां पहले ही संज्ञान में लेना चाहिए था. मनी लांड्रिंग देश में एक बड़ी समस्या है और नोटबंदी ने इस पर लगाम लगाने की दिशा में एक अच्छी राह सुझाई थी, पर एक बार और छूट देकर कहीं न कहीं समस्या को जानबूझकर अनसुलझी छोड़ने की बात सामने आई है. इससे बचा जा सकता था और यह आर्थिक रूप से भी और तब नैतिक रुप से भी काफी हद तक सही हो सकता था.

राजनीतिक लाभ-हानि:- जहां तक इस कदम के राजनीतिक लाभ हानि का प्रश्न है तो बीजेपी का समर्थक वर्ग यानी व्यापारी वर्ग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है, किंतु उनके सामने कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है, इसलिए भाजपा के साथ यह वर्ग आगे भी जुड़ा रह सकता है. छोटे तबके में जरूर इस बात को लेकर थोड़ी खुशी थी कि अमीर और काले धन वालों का धन सरकार की जेब में जा रहा है जो घूम फिर कर जनता के कल्याणकारी कार्यों में लगेगा, किंतु एक संशोधन अधिनियम प्रस्तुत कर केंद्र सरकार ने अपने इस राजनीतिक फायदे को ही कम करने की कोशिश की है. देश के मध्य वर्ग को भी आयकर अधिनियम में संधोधन से कुछ राहत मिल सकती है, पर इतने होहल्ले मचने के बाद इस कदम से गलत सन्देश ही गया है. चूंकि, विपक्ष देश में उतना सशक्त नहीं है और यह बात उस तरीके से जनता में में कम्युनिकेट नहीं हो रही है, जितना एक सशक्त विपक्ष कर सकता था, इसलिए सरकार को यहां भी जनता संदेह का लाभ दे सकती है.

जीएसटी जैसे प्रावधान मददगार:- जीएसटी जैसे कुछ प्रावधान इस मामले में जरूर मददगार साबित हो सकते हैं, किंतु आयकर अधिकारियों के ऊपर डिपेंडेंसी बढ़ाकर और टैक्स प्रावधानों के कई सारे उलझाव वाले पहलू सामने लाकर ‘इंस्पेक्टर राज’ को बढ़ावा देने की बड़ी गुंजाइश छोड़ दी गयी है. इसी तरह से जो बड़ी कमी जनधन खातों को लेकर सामने आई है. सरकार यह महसूस कर चुकी है कि जन धन खातों में बड़ी संख्या में काला धन का हिस्सा जमा कराया गया है. ऐसे में, यह सरकार दोतरफा फंसी हुई नजर आती है. अगर सरकार उसकी जांच नहीं करती है तो काला धन का एक बड़ा हिस्सा यूं ही सफेद हो जाएगा और अगर सरकार उसकी जांच करती है, तो एक बड़े जनसमूह के विरोध का उसे सामना करना पड़ सकता है.

कैशलेस अर्थव्यवस्था की दिशा में एक कदम :-नोटबंदी भारत को कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. प्रधानमंत्री ने अपनी ‘मन की बात’ में भी अपनी इस इच्छा को जताया है. नोटबंदी के समर्थकों और आलोचकों दोनों के मन में यह सवाल है कि क्या भारत कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिए तैयार है? एक बहुत बड़ी आबादी इस देश में रहती है जिसके लिए ग्रामीण, अशिक्षित और बैंक अकाउंट्स व स्मार्टफोन के बगैर इस नई व्यवस्था से जूझना काफी मुश्किल है. कैशलेस अर्थव्यवस्था के प्रस्ताव की प्रतिक्रिया में कई तरह की राय सामने आई है, जिसमें कुछ सकारात्मक और तसल्ली देने वाली हैं, कुछ बिल्कुल धुंधले भविष्य का दृश्य खींचती हुई नकारात्मक हैं.

नोटबंदी की नाकामी :-रिजर्व बैंक ने यह कह दिया है कि नोटबंदी का एक महीना पूरा होने तक ही, एक हजार और पांच सौ रुपए के खारिजशुदा नोटों में पूरे 11.55 लाख करोड़ रुपए बैंकिंग व्यवस्था में वापस आ चुके थे। रिजर्व बैंक के अनुसार, यह इन नोटों में देश में चलन में मौजूद कुल नकदी का पूरे 81 फीसद हिस्सा होता है। 2016 के मार्च के आखिर में, कुल 14.17 लाख करोड़ रुपए पांच सौ और हजार रुपए के नोटों में चलन में थे।यह समझने के लिए किसी भारी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होगी कि बाकी तीन हफ्तों में चलन में मौजूद इन नोटों का बाकी हिस्सा भी बैंकिंग व्यवस्था में लौट चुका होगा। नोटबंदी का पहला महीना पूरा होने की पूर्व-संध्या में सरकार के वित्त सचिव ने एक संवाददाता सम्मेलन में इस सच्चाई को स्वीकार भी कर लिया था, इसी सच्चाई को पहचान कर खुद सरकार नोटबंदी के बीच में ही, आयकर कानून में संशोधन की आड़ में, कालेधन की घोषणा और वास्तव में फिफ्टी-फिफ्टी के आधार पर कालेधन को सफेद करने की एक और योजना भी ले आई है। नोटबंदी के प्रहार से कालेधन की भारी मात्रा के नष्ट हो जाने के इन्हीं अनुमानों की रेत पर नोटबंदी से अंतत: जनता को पहुंचने वाले लाभों के अनेक महल खड़े किए गए थे। कहा जा रहा था कि इस तरह लाखों करोड़ रुपए का कालाधन नष्ट होने से, किसी प्रकार सरकार के हाथों में इतनी ही राशि आ जाएगी। और इस तरह अचानक आई संपन्नता के बल पर सरकार, दिल खोलकर गरीबों के कल्याण पर और ढांचागत क्षेत्र में निवेशों आदि पर खर्चा करेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी, नोटबंदी के लक्ष्यों को ही बदलने की कवायद शुरू कर दी है। कालाधन-मुक्त की जगह, अब देश और अर्थव्यस्था को कैश-मुक्त बनाने का शोर है। नोटबंदी का एक महीना पूरा होने पर जहां संसद में विपक्ष ने एकजुट होकर ‘काला दिवस’ मनाया, वित्त मंत्री ने इसके जवाब में कैश-लेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए पूरी ग्यारह रियायतों का ऐलान किया। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर ट्विटर के माध्यम देश को यह याद दिलाना खासतौर पर जरूरी समझा कि नोटबंदी, ‘हमारे लिए इसका भी मौका है कि नकदीरहित भुगतानों को अपनाएं और नवीनतम प्रौद्योगिकी को आर्थिक लेन-देन का हिस्सा बनाएं। मनमोहन सिंह के नोटबंदी से जीडीपी में 2 फीसद की कमी के अनुमान के बाद, अब रिजर्व बैंक ने भी चालू वित्त वर्ष के वृद्घि दर के अनुमान में 0.5 फीसद की कमी कर दी है। जो वृद्घि दर पहले 7.6 फीसद रहने का अनुमान था, अब 7.1 फीसद ही रह जाने वाली है। इस गिरावट अलग-अलग एजेंसियों के अनुमानों में तो अंतर हो सकता है, लेकिन यह स्वतरू स्पष्ट है कि इसकी सबसे बुरी मार अनौपचारिक क्षेत्र यानी खेती व दस्ताकारी आदि समेत छोटे व्यापार तथा छोटे उद्यमों और उनमें काम करने वालों पर ही पड़ रही है।

चेन्नई में मनी एक्सचेंज के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश :-आठ जगहों पर छापेमारी करके आयकर विभाग ने मनी एक्सचेंज के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया है. यहां से 90 करोड़ रुपये कैश और 100 किलोग्राम सोना बरामद हुआ है. 90 करोड़ में 10 करोड़ के नोट नए करेंसी में है. आयकर विभाग श्रीनिवासा रेड्डी, शेखर रेड्डी और प्रेम नामक शख्स को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है. गुप्त सूचना मिलने के बाद आयकर विभाग ने अन्ना नगर और टी नगर सहित आठ जगहों पर स्थित ज्वैलरी शॉप पर एक साथ छापेमारी की. यहां से 90 करोड़ रुपये कैश और 100 किलोग्राम सोना बरामद हुआ है. सोने की कीमत करीब 30 करोड़ रुपये बताई जा रही है. बरामद किए गए कैश में 80 करोड़ प्रतिबंधित 500-1000 के नोट हैं. श्रीनिवासा रेड्डी, उसका सहयोगी शेखर रेड्डी और उनका एजेंट प्रेम इस मामले में मुख्य संदिग्ध हैं. आयकर विभाग ने 70 किग्रा सोना होटल के एक रूम से बरामद किया है. तीनों से पूछताछ की जा रही है.
पुणे में बीजेपी के एक नेता की एक कार से दस लाख 50 हजार कीमत के 500 और 1000 के नोट बरामद:- पुणे नगर निगम के पूर्व पार्षद केसकर इस कार में तीन अन्य बीजेपी नेताओं के साथ सफर कर रहे थे.गौरतलब है कि 14 दिसंबर को पुणे के पास सासवाड़, जुन्नार और उसके आसपास के इलाकों में नगरपालिका के चुनाव होने हैं बीजेपी के ये नेता पुणे से सासवाड़ गांव की ओर जा रहे थे. पुणे ग्रामीण पुलिस के एएसआइ भागवत चुनाव आयोग के दल के साथ उस इलाके में गश्त कर रहे थे, तभी उन्होंने कोंडवा सासवाड़ रोड पर यह गाड़ी जाते हुए देखी. पुलिस दल ने गाड़ी रोकी और उसकी जांच की. भागवत ने बताया कि गाड़ी की जांच करने पर जब पुलिस दल को उसमें बड़ी मात्रा में नकदी मिली तो केसकर ने बताया कि यह नकदी कृषि कार्य के लिए ले जाई जा रही है.

एटीएम बंद करके खास लोगों की जेबें भर रहे बैंक:- एक तरफ तमाम लोग एक एक नोट के लिए तरस रहे हैं वहीं, दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी जेबें बैंक में नोटों से भर रही हैं। ऐसे लोगों को नोट उन्हीं बैंक से मिल रहे हैं जिन पर आम लोगों को कैश नहीं होने का हवाला देकर टरकाया जा रहा है। बेहद जरूरतमंद लोग अगले दिन की सुबह और जल्दी बैंक पर आकर लाइन में लग रहे हैं, मगर तब भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है। बैंकों में कैश का इतना भीषण संकट वास्तव में है या फिर इसे कुछ ज्यादा करके प्रचारित किया जा रहा है? अगर वास्तव में कैश नहीं है तो फिर कुछ लोगों को भरपूर कैश कैसे मिल पा रहा है? कैश की किल्लत तो है और यह काफी ज्यादा गंभीर है, लेकिन बैंकों की मनमानी से इसका दायरा और ज्यादा बढ़ गया है। एक असलियत ये भी है कि अधिकतर बैंकों में गिनती के चंद लोगों को भरपूर कैश मिल रहा है। ऐसे लोग जो बैंक की लाइन में खड़े होने का तकल्लुफ भी नहीं कर रहे हैं। कैश निकासी के लिए कुछ के तो एजेंट ही बैंक में पहुंच रहे हैं। एक दिन में कैश निकासी की लिमिट चौबीस हजार है। आम लोगों को पांच हजार भी नहीं मिल पा रहे हैं। किसी किसी बैंक में दो हजार तो किसी में एक हजार ही देकर लोगों को लौटाया जा रहा है। इतने रुपए भी तब मिल पा रहे हैं जब वह बैंक के अंदर घुस जाने की सफलता हासिल कर रहे हैं। जबकिख् ऐसे खासमखास लोगों को चौबीस हजार बड़े आराम से दिए जा रहे हैं। ऐसे खासमखास लोगों की सहूलियत के लिए ही ज्यादातर एटीएम परमानेंट बंद कर दिए गए हैं।

सैलरी व आम निकासी तथा कैश सप्लाई नियमों में एकरुपता नहीं:-किसी बैंक की शाखा पर सैलरी के 4,000 रुपये, किसी बैंक पर 6,000 रुपये किसी बैंक पर 6 से 8 हजार रुपये, किसी बैंक पर 10,000 कैश दिए जा रहे हैं अपने अपने जान पहचानवालों को बैंक 24,000 रुपये तक भी दे देता है। इस प्रकार के हर बैंक के अलग अलग नियम और कायदे चल रहे हैं । आरबीआई

इस प्रकार का कोई ना तो आंकड़ा जुटा पा रहा है कि किस क्षेत्र में कितनी डिमाण्ड है कितनी आपूर्ति हो पा रही और कितनी और चाहिए। वे जरुरत के मुताबिक आपूर्ति ना करके मनमानी या लाट से जैसे-तैसे कर रहे हैं हर प्रदेश , हर जिले और हर बैंक में कैश निकासी की एक रुपता नहीं ला पा रही है। इनमें कोई एकरुपता देखने को नहीं मिलती हैं। जिसकी किस्मत अच्छी होती है उसे भुगतान मिल जाता है और जो देर से पहुंचता है, वह खाली हाथ वापस आता हैं। रिजर्व बैंक से कैश कम आने और जनता में कैश की बढ़ती मांग के मद्देनजर ही ज्यादातर बैंकों में सैलरी के दिए जाने वाले कैश में अपने लेवल पर कटौती की है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कैश पहुंच सके।

जिम्मेदार लोगों ने सरकार को धोखा दिया:- 50 दिन के इस प्रारम्भिक अभियान को जहां आम जनता वड़े धौर्य और संयम से कष्ट झेलते हुए सरकार के कदमों का समर्थन किया है, दो – दो हजार रुपये के लिए कई बार लाइनों में लगा, कम पैसे से अपना जरुरी से जरुरी काम चलाया, वहीं कुछ राजनीतिक प्रभावशाली व्यक्ति व बैंक के बड़े अधिकारी अपने निजी स्वार्थवस काले धन को सफेद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखे हैं।देश के हर क्षेत्रों से एसे छापे तथा गिरफ्तारियों की खबरे दिन प्रतिदिन अखबारों में आ रही हैं। एसे लोगो के प्रति कठोर से कठोर कार्यवाही करते हुए राष्ट्रदोह में निरुद्ध करते हुए मुकदमा चलाया जाना चाहिए तथा उन्हें ना तो राजकीय सेवा में रहने दिया जाना चाहिए ओर ना ही संसद विधान सभाओं को चुनाव लड़ने दिया जाना चाहिए।

ठोस परिणामों की इन्तजारी और जवाबदेही भी :- लोगों की दिलचस्पी इस बात में भी है कि इतने बड़े डिसीजन का ठोस परिणाम किन रूपों में सामने आता है और सरकार को राजनीतिक रूप से जनता की इस दृष्टि पर खरा उतरने का प्रयत्न करना चाहिए. न केवल भारतीय नागरिक, बल्कि चीन जैसे देश भी इस निर्णय के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले प्रभावों पर नज़र बनाये हुए हैं, जैसाकि पिछले दिनों सरकारी चीनी अख़बार में छप था कि ‘वेस्टर्न डेमोक्रेटिक सिस्टम होने के बावजूद भारत किस प्रकार इन बोल्ड स्टेप्स को झेल सकता है’? उनका अभिप्राय नेता की लोकप्रियता से था संभवतः लोकप्रियता के पैमाने पर शायद नरेंद्र मोदी को आज भी कोई चुनौती नहीं दे सके, किन्तु अर्थव्यवस्था को लग रहे झटकों के लिए साल दो साल बाद उनसे अवश्य ही जवाबदेही मांगी जाएगी और 2019 भी साल दो साल बाद ही आने वाला है.

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