इजरायली राष्ट्रपति के भारत आगमन पर जश्न से पड़ोसी देश नेपाल के मुसलमानों ने चिन्तासगीर ए खाकसार।

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काठमांडू। भारत की गिनती एशिया के महान देशों में होती है जहाँ  दूसरी सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी मुसलमानों की है’ जहां लोकतंत्र का बोलबाला है ‘न्याय व इंसाफ़ को सभी मामलों में वरीयता दी  जाती है अब ऐसे में अगर मानवता के दुश्मन और इस्लाम विरोधी ज़ालिम  व जाबर इजरायल के राष्ट्रपति के स्वागत का जश्न मनाया जाए जिसके हाथ उत्पीड़ित फिलिस्तीनियों के खून से लाल हैं जिसका विशेष रूप से गाजा पर ढाया गया ज़ुल्मो  सितम इतिहास का एक काला अध्याय है ‘और जिस का यह सिलसिला अब भी लगातार जारी है’ तो बेहद दुखद मामला है ‘इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। उपरयुक्त  विचार नेपाल की केंद्रीय संस्था जामिया सिराजुल उलूम अलसल्फ़या के प्रशासक और राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल  के संरक्षक मौलाना शमीम अहमद नदवी ने व्यक्त किया।

पड़ोसी देश नेपाल

भारत की गिनती एशिया के महान देशों में होती है

राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अब्दुल ग़नी अलकूफ़ी ने इस संबंध में अपनी बातचीत में कहा कि महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से महान गणराज्य भारत की विदेश नीति उत्पीड़ित फिलीस्तीनियों के पक्ष में आवाज उठाने और अंतर राष्ट्रीय मंचों पर उनकी हिमायत रही है। और अरब देशों में भी इस बात पर खुशी है कि अरब दुनिया और इस्लामी देशों से बाहर भारत पहला देश है जिसने उत्पीड़ित फिलिस्तीनी लोगों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई और उनके समर्थन में खड़ा हुआ।
उन्होंने कहा कि चूंकि भारत ने अपनी स्वतंत्रता के बाद से ही अपनी एक नीति बना ली थी कि वह हर साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ रहेगा और मज़लूम व उत्पीड़ित लोगों की रक्षा करता रहेगा ‘इस की गिनती संयुक्तराष्ट्र मंचों पर हमेशा गुटनिरपेक्ष देशों में होती रही है। यहां तक कि 1992 से इजरायल के साथ रक्षा क्षेत्र में संबंधों को बढ़ावा देने के बाद भी फिलिस्तीनी विवाद पर भारतीय रुख में परिवर्तन नहीं हुआ और उसने फिलीस्तीनियों का समर्थन व हमायत जारी रखी।

बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट रूप से इस बात का आश्वासन दिया

भारत में भाजपा के सत्तारूढ़ आने के बाद भारत इजराइल संबंधों में क्रांतिकारी प्रगति हुई ‘जिससे मुस्लिम अल्पसंख्यक में चिन्ता स्थिति पैदा होना शुरू हुई लेकिन बधाई की पात्र हैं भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जिन्होंने 20 नवंबर 2014 दिन गुरुवार फिलिस्तीनी प्राधिकरण के नबील शित के साथ हुई बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट रूप से इस बात का आश्वासन दिया कि भारत उतपीड़ित फिलीस्तीनी लोगों के  समर्थन और मदद की अपनी पुरानी पालिसी पर कायम है ‘ वह उनकी हर संभव मदद’ उनकी स्वतंत्रता और स्वायत्तता के आंदोलन और जिद्दो जुहद का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन करता रहेगा।
एक तरफ यह पृष्ठभूमि और दूसरी ओर अन्यायपूर्ण इस्राएल के अध्यक्ष का भव्य स्वागत निश्चित रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यक के लिए चिंता का विषय है।राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना मशहूद खान नेपाली ने कहा कि कम से कम भारत सरकार इस मौके पर भारत में रहने बसने वाली दूसरी बड़ी अल्पसंख्यक की भावनाओं और इंसाफ को ध्यान में रखते हुए फिलिस्तीनी विवाद का मुद्दा खुलकर उठाए और देश के मुसलमानों को यह संदेश दे कि हमारी जो नीति उतपीड़ितों की फ़रियादरसी और साम्राज्यवादी शक्तियों का  विरोध रही है वह अपनी जगह बरकरार है। इस मामले में नेपाल के मुसलमानों की गहरी नजर है।
केंद्रीय हज समिति के सदस्य केफयातुल्लाह ख़ान ‘मौलाना ज़हीर अहमद बरेलवी’ अल्हाज मोहम्मद आरिफ पप्पू और मोहम्मद शाहिद खान आदि ने भारत सरकार से फिलिस्तीनी पीड़ितों का समर्थन करने की अपील की है।

 

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1 टिप्पणी

  1. वो माद्र्सेका मुल्ला चिल्लाता है इसराए के नाम से तो तुम्हारे मदरसें मे क्या चल रहा है पूरे टेररिस्ट पैदा कर रहे हो जब कश्मीरमे मुसलमानोने ४०००० लड़की के उप्पर बलात्कार किया ६०००० पंडित और सीखोकी हत्या करदी ४००००० के उप्पर कश्मिरके हिंदू अभिभि निर्वासित है आजतक मुसलमोनोने १० लाख के उप्पर हिंदुऊकी हत्या करदी १९४७ से पाकिस्तान भारतके उप्पर हमला कर रहा है हमारे कितने सैनिक शाहिद हुए आप उसके उप्पर ए क लबभी (SENTENCE) नही बोलते दोगला पन छोड़िए और इंडिया को चुप चाप सपोर्ट कीजिए