बंदरों की नसबंदी के लिये हिमाचल पर निर्भर

हरिद्वार। जिले में बंदरों की संख्या कम करने के लिए वन विभाग की ओर से शुरू किया गया अभियान बेमानी साबित हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि, बंदरों की नसबंदी के लिए प्रशिक्षित पशु चिकित्सक ही मौजूद नहीं है। ऐसे में बंदरों की नसबंदी के लिए हिमाचल प्रदेश से पशु चिकित्सकों को बुलाना पड़ रहा है।

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बंदरों की नसबंदी के लिये बना केंद्र हो रहा बेकार

शहरों में बंदरों की संख्या पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उनकी नसबंदी के लिए वन विभाग ने अप्रैल 2015 में एक प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा था। इस पर छह अक्टूबर को चिड़ियापुर में वन्य जीव रेस्क्यू सेंटर में बंदरों की नसबंदी के लिए केंद्र की स्थापना भी की गई। लेकिन जिले में प्रशिक्षित पशु चिकित्सक उपलब्ध न होने के कारण इसका लाभ नहीं मिल पा रहा था और बंदरों को बिना नसबंदी किए ही जंगलों में छोड़ना पड़ रहा है।

बंदर रेस्क्यू केंद्र के प्रभारी राजेंद्र कुमार ने बताया कि बंदरों की नसबंदी हिमाचल प्रदेश के पशु चिकित्सकों की सेवाएं ली जा रही हैं। प्रदेश के विभिन्न पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित भी कराया जा रहा है। अभी तक हिमाचल प्रदेश के पशु चिकित्सकों की मदद से पौड़ी, नैनीताल व हरिद्वार के एक-एक पशु चिकित्सक को प्रशिक्षित किया जा चुका है। हिमाचल के पशु चिकित्सक को जब बुलाया जाता है तो वह तीन से चार दिन रुककर बंदरों की नसबंदी करते हैं।

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रोज का चार्ज एक हजार रुपये

हिमाचल प्रदेश से पशु चिकित्सक बुलाने पर उसे एक हजार रुपये रोज के हिसाब से चार्ज देना पड़ता है। उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी विभाग को ही करनी होती है।

ऑपरेशन की मौजूदा स्थिति

वन विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक 332 बंदरों को विभिन्न अभियानों के द्वारा पकड़ा गया। लेकिन स्थायी तौर पर पशु चिकित्सकों की उपलब्धता न होने से इसमें से मात्र 188 बंदरों की ही नसबंदी हो सकी। इस मामले में सह प्रभागीय वन अधिकारी एच के सिंह का कहना है कि विभाग द्वारा शासन से पशु चिकित्सकों की मांग के संबंध में जानकारी और पत्र भेजा जा चुका है, जिसपर कार्रवाई होने का इंतजार है।

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