रितेश ने लिखी बुलंदियों की इबारत, बने देश के सबसे यंग CEO

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युवा सोच और युवा जोश जब एक साथ मिल जाते हैं तो कुछ ऐसा होता है जिसकी आप और हम कल्पना भी नहीं कर सकते। कहते हैं अगर मन में दृढ़ इच्छाशक्ति और खुद पर विश्वाश हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं हैं। इसी विश्वास और इच्छाशाक्ति के दम पर अपनी बुलंदियों की इबारत लिखने वाले शख्स हैं रितेश अग्रवाल। रितेश ने 20 साल से भी कम उम्र में Oyo Rooms  नाम की कंपनी की शुरुआत कर देश के बड़े से बड़े बिजनेसमैन को सोचने पर मजबूर कर दिया।

बिजनेसमैन

बिजनेसमैन बनना कोई रितेश से पूछे

रितेश के जज्बे और जूनून ने ही रितेश को बुलंदियों के शिखर पर लाकर खड़ा कर दिया है वो भी महज कुछ सालों में, आज रितेश की गिनती देश के सबसे यंग सीईओ में की जाती है। रितेश ने देश के करीब 500 होटलों से टाईअप करने के बाद उन्होंने विदेशों में भी उपना कारोबार फैलाने लगे और मलेशिया के होटलो से भी टाईअप कर लिया। रितेश की कंपनी Oyo Rooms ट्रैवलर्स को सस्ते दामों पर सभी सुविधाओं के साथ देश के बड़े शहरो के होटलों में कमरे उपलब्ध कराती है।

दिखने में पतले, लंबे और बिखरे बालों वाले किसी कॉलेज स्टूडेंट की तरह दिखने वाले रितेश को देखकर कोई नहीं कह सकता कि वो एक नामी बिजनेसमैन है। लेकिन कभी-कभी सामान्य से दिखने वाले लोग भी ऐसा काम कर जाते हैं, जिसकी आपको उम्मीद नहीं होती। रितेश के पेरेंट्स चाहते थे कि वे इंजीनियर बने। लेकिन रितेश का मन खुद का काम करने में लगा था। जब वे कोटा आईआईटी की तैयारी करने पहुंचे तो हर वीकएंड दिल्ली अपने उन दोस्तों से मिलने पहुंच जाते जो खुद का काम करते थे। दिल्ली आने-जाने और बाकी चीजों के लिए पैसों की जरूरत पड़ती। फैमिली को इन चीजों और प्रयोगों के बारे में पता न चले, इसलिए वे सिम कार्ड बेचकर पैसों का जुगाड़ करते थे।

इंटरप्रेन्योर बनने के जुनून में रितेश ने इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस एंड फाइनेंस में दाखिला लिया, लेकिन बीच में उन्होंने पढ़ाई से हमेशा के लिए मुंह मोड़ लिया और ओरेवल स्टेज प्राइवेट नाम की स्टार्टअप शुरू की। यही कंपनी साल 2013 में ओयो रूम्स में बदल गई। कई बार वे कोटा से ट्रेन पकड़ दिल्ली आ जाया करते और मुंबई की ही तरह सस्ते होटलों में रुकते थे, ताकि दिल्ली में होने वाले युवा उद्यमियों के सम्मेलनों में शामिल होकर उनसे मिल सके। इन इवेंट्स में शामिल होने के लिए रजिस्ट्रेशन फीस इतनी ज्यादा होती थी कि वे दे नहीं पाते थे।

कभी-कभी वे इन आयोजनों में चोरी-चुपके जाकर बैठ जाते थे। यही वो वक्त था, जब उन्होंने ट्रैवलिंग के दौरान ठहरने के लिए सस्ते होटलों के बुरे अनुभवों को अपने बिजनेस का रूप देने की सोचा। रितेश के मन में विचार आया कि क्यों न एक ऐसा मॉडल बनाया जाए, ताकि लोगों को रहने के लिए सस्ते में अच्छा होटल मिल जाए। इसी आइडिया के साथ महज 18 साल की उम्र में रितेश ने ‘ओरावल स्टेज’ नाम की एक कंपनी खोली, जिसका उद्देश्य कम दामों पर कमरा उपलब्ध करवाना था।

सबसे खास बात यह थी कि रूम कोई भी आसानी से ऑनलाइन बुक कर सकता था। छोटी उम्र से ही रितेश के दिमाग में कुछ बड़ा करने का जुनून था। जिस उम्र में बच्चे कम्प्यूटर पर गेम खेलते हैं, उस उम्र में रितेश को कम्प्यूटर एक्सपर्ट कहना गलत नहीं होगा। वे आठ साल की उम्र में कोडिंग आदि कर लेते थे। 16 की उम्र में उनका चयन उन 240 बच्चों में हुआ था, जिन्हें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में आयोजित एशियन साइंस कैम्प के लिए चुना गया था।

छोटी उम्र से ही रितेश के दिमाग में कुछ बड़ा करने का जुनून था। जिस उम्र में बच्चे कम्प्यूटर पर गेम खेलते हैं, उस उम्र में रितेश को कम्प्यूटर एक्सपर्ट कहना गलत नहीं होगा। वे आठ साल की उम्र में कोडिंग आदि कर लेते थे। 16 की उम्र में उनका चयन उन 240 बच्चों में हुआ था, जिन्हें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में आयोजित एशियन साइंस कैम्प के लिए चुना गया था।

उन्होंने वर्थ ग्रोथ पार्टनर्स नाम की कंपनी शुरू की, जिससे वे सबसे कम उम्र के सीईओ बने। लेकिन शुरू में कुछ भी ठीक नहीं था। उन दिनों में वे दिल्ली में रहते थे और समय पर रेंट न देने के कारण उन्हें कई-कई दिनों तक घर की सीढ़ियों पर सोना पड़ा था। रितेश का नाम बेहतरीन ओरेटर (जो लोग अच्छा बोलते हैं) की सूची में भी शामिल है। 2014 में आयोजित थिंक ईडीयू पैनल में रितेश सबसे का उम्र के स्पीकर थे। इसके अलावा, रितेश वीसीसर्कक इवेंट्स से लगातार जुड़े रहते हैं।

Edited by- Shailendra verma

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