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बुंदेलखंड में जनसहभागिता से एक साल में हल होगा पानी का संकट

लखनऊ। पेयजल संकट, सूखा, कर्ज, किसानों की आत्‍महत्‍या और अपनी बदहाली पर आंसू बहाने वाले बुंदेलखंड की यह कड़वी सच्‍चाई सत्‍ता के सामने रखने के लिए महिलाओं ने मोर्चा संभाला है। इन महिलाओं को कोशिश है कि जनसहभागिता के जरिए बुंदेलखंड की सभी समस्‍याओं का समाधान कराया जाए। अपनी यही आवाज बुलंद करने के लिए बुंदेलखंड के 7 जिलों से लगभग 300 महिलाएं राजधानी में इकट्ठा हुईं। इन बुंदेली महिलाओं ने वहां के भीषण सूखे के हालात का दर्द पुरजोर आवाज के साथ एक जनसुनवाई के दौरान बयान किया।

बुंदेलखंडबुंदेलखंड के जमीनी हालात पर खुलकर हुई चर्चा

राजधानी के गन्ना संस्थान प्रेक्षागृह में जल पुरुष राजेंद्र सिंह की मौजूदगी में इन महिलाओं ने अपने गाँव की जमीनी हालत पर खुल कर चर्चा की।  जनसुनवाई के लिए बने पैनल में पूर्व न्यायाधीश जस्टिस हैदर अब्बास रजा, राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री जरीना उस्मानी, सिचाई विभाग के चीफ इंजीनियर एनसी वर्मा, वरिष्‍ठ पत्रकार दिनेश पाठक, सामाजिक कार्यकर्त्ता मेजर (डा) हिमांशु और जगदीश यादव के साथ महिला आंदोलन से जुड़ी सुनीला भी शामिल थीं। इस जनसुनवाई का आयोजन जल बिरादरी और परमार्थ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था ।  इस पूरे आयोजन के पीछे बुंदेलखंड के भागीरथ के नाम से प्रसिद्द समाजकर्मी संजय सिंह की भूमिका थी।

संजय सिंह ने बताया कि बुंदेलखंड में सूखा और आवर्षण से उत्पन्न हालात दिन प्रतिदिन कठिन होते जा रहे हैं। कई क्षेत्र में सूखा अब अकाल में तब्दील होता जा रहा है। कई वर्षों के सूखे और अवर्षण के कारण यह हालात उत्पन्न हुए हैं। जिसका सबसे बड़ा कारण जल संकट है। बुंदेलखंड का इतिहास यह बताता है कि यह इलाका सदियों पहले भी जल संकट का क्षेत्र रहा है। जल संकट के प्रभावों से निपटने के लिए तत्कालीन शासकों ने जल प्रबंधन के बेहतरीन कार्य कराये थे। बुंदेलखंड में किसानी आजीविका का प्रमुख स्रोत है। आज अस्सी फीसदी से अधिक लोगों की आजीविका का स्रोत कृषि है। कृषि में सबसे महत्वपूर्ण घटक पानी है। बुंदलेखंड का किसान हमेशा कहता आया है कि यदि उसे उसकी आवश्यकता के अनुसार सिंचाई के साधन उपलब्ध हो जाएं तो उसे और किसी मदद की ज़रुरत नहीं है किन्तु पानी के साधन लगातार घट रहे हैं। भू गर्भीय जल का दोहन लगातार बढ़ रहा है। जिसके कारण पेयजल संकट उत्पन्न हो गया है। पेयजल का सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ रहा है क्योंकि पानी लाने की ज़िम्मेदारी अधिकांश घरों में महिलाओं के ऊपर है। कुओं के सूख जाने और हैंडपम्मों के कम पानी देने कारण कई गांव या तो महिलाओं को दूर से पानी लाना पड़ता है या फिर पेयजल स्रोत पर खड़े रह कर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। जिससे महिलाओं का श्रम और समय अधिक लग रहा है। जिससे कई प्रतिकूल प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। बुंदलेखंड में हमेशा

बुंदेलखंड में बन रही है पानी पंचायत, जुट गयी हैं जल सहेलियाँ

पानी का महत्व सर्वाधिक रहा है। यहां मांगलिक कार्यों में भी जल संरचनाओं के पूजन का महत्व रहा है। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर जल पुरुष राजेंद्र सिंह की प्रेरणा से संजय सिंह के नेतृत्व में गांव-गांव में पानी पंचायत का गठन किया गया है और जल सहेलियों का कैडर तैयार किया गया है। यह जल सहेलियां अपने गांव को पानीदार बनाने में लगी हुई हैं। ललितपुर के उद्गवां गांव की ललिता, चंदापुर की पुष्पा, हमीरपुर के धरऊपुर गांव की कमलेश, ग्राम गहोली की सावित्री देवी, जालौन के धमना गांव की सीमा, मल्लहानपुरा की लोंगश्री और कुरौती की अनुजा देवी सहित कई उदहारण हैं। जिन्होंने अपने गांव को पानीदार बनाया है। बुंदेलखंड का सूखा सरकारों के अकेले प्रयासों से ठीक नहीं हो सकता। इस सूखे के समाधान के लिए समाज को भी खड़ा करने की आवश्यकता है। जल सहेली और पानी पंचायत द्वारों किए गये प्रयासों से सरकार को सीखने की आवश्यकता है कि जिन प्रयासों के द्वारा कम लागत और आपसी सूझबूझ से जो जल संरक्षण के कार्य किए गये हैं। उनसे सीख लेने की आवश्यता है।

पारंपरिक तरीकों से ही हो जल संरक्षण

जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि बुंदेलखंड वर्तमान में सूखे का केंद्र है। विदर्भ के सूखे और बुंदेलखंड के सूखे में बहुत अंतर है। विदर्भ में सूखे के समय भी क्रय शक्ति प्रभावित नहीं हुई थी। जबकि बुंदेलखंड में किसानों की सर्वाधिक क्रय शक्ति प्रभावित हुई है। क्रय शक्ति को बढ़ाने के लिए काम के बदले अनाज एवं काम चाहने वालों को रोज़गार के अवसर दिलाने के लिए प्रयास करना होगा। बुंदेलखंड को अगर सूखे से निजात मिल सकती है तो वह है यहां की परंपरागत गत जल संरचनाओं का पुनर्जीवन। जिसके लिए सभी को काम करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा , बुंदलेखंड में तीन स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। पहली तात्कालिक स्तर पर पेयजल, भोजन एवं चारे की उपलब्धता। दूसरा तालाबों और नदियों का पुनर्जीवन। तीसरे स्तर पर जल साक्षरता अभियान से बूढे, बच्चे और जवानों को जोड़ना और पर्यावरण और जल संकट को बढ़ावा देने वाले नदियों से होने वाले खनन को रोकना होगा। बुंदेलखंड के मुद्दे पर राजनीति नहीं बल्कि सकारात्मक कार्य करने की आवश्यकता है। जिसकी शुरुआत के लिए गांव गांव में जल संरक्षण कार्य योजनाओं का निर्माण किया जाए और उन्हें लागू किया जाए।

परमार्थ संस्था के सचिव एवं जल जन जोड़ो के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह ने कहा कि बुंदेलखंड के सूखे का समाधान एकीकृत जल प्रबंधन पद्धितों के विकास से ही संभव है। जिसमें जल संरक्षण, टिकाऊ एवं कम लागत की खेती, पेयजल एवं स्वच्छता और आजीविका के वैकल्पिक संसांधनों के विकास से संभव है। इन सबके लिए आवश्यक कि वर्षा जल संचयन के लिए विशेष प्रयास किए जाएं। बुंदेलखंड में बढ़ रही आद्रता की कमी ना केवल फसलों को प्रभावित कर रही है बल्कि यहां होने वाली वनस्पतियों को भी प्रभावित कर रही है। जो आने वाले समय के लिए सबसे बड़ा संकट है। बुंदेलखंड देश के सर्वाधिक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का क्षेत्र है। जिसे ठीक करने के लिए वैज्ञानिक पद्धितियों एवं परंपराओं का उपयोग करना होगा।

एक साल में पानीदार बनेंगे एक हजार गाँव

संजय सिंह ने कहा कि आने वाले एक साल में बुंदेलखंड के एक हज़ार गांव को सामुदायिक सहयोग से पानीदार बनाने का कार्य किया जाएगा। जिसके लिए गांव गांव में जल कर्मी, जल योद्धा, जल ऋषि एवं जल सहेलियों काे तैयार किया जाएगा। इनके प्रशिक्षण के लिए अलवर के भीकमपुरा गांव में तरुण जल विद्या पीठ की स्थापना की गई है। जहां पर विशेष तौर से युवाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा। बुंदेलखंड में परमार्थ समाज सेवी संस्थान के नेतृत्व में सूखा निवारण संसाधन केंद्र की स्थापना झांसी में की जाएगी। जहां पर सूखे से निपटने के लिए शोध एवं हस्तक्षेपों के लिए अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे। बुंदेलखंड में पेयजल के संकट के समाधान के लिए एकल पेयजल आपूर्ति परियोजना एवं बहुग्रामीण परियोजनाओं के निर्माण को प्राथमिकता दी जाएगी और ये कार्य ग्रीष्म ऋतु से पहले पूर्ण कर लिया जाएगा। जल सहेलियों द्वारा जल सरंक्षण के लिए किए जा रहे प्रयास ना केवल सराहनीय हैं बल्कि इस तरह प्रयासों ने यहां की सामाजिक संरचना को बदलने में सार्थक भूमिका निभाई है। आवश्यकता है इन प्रयासों को सभी का सहयोग एवं संबल प्राप्त हो।

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