बेहमई कांड: जवान से बूढ़े हुए और मिली सिर्फ तारीख

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कानपुर देहात। वह जवान से बूढ़े हो गए लेकिन गांव में 35 साल पहले हुए बेहमई कांड नरसंहार के फैसले का उन्हें इंतजार है। मुख्य आरोपी की हत्या हो गई और उसके हत्यारे को सजा भी हो गई लेकिन उन्हें अभी तक न्याय मिलने की जगह तारीख ही मिली। अब जब कई पीड़ित व 40 में से 32 आरोपियों की मौत हो चुकी है। जो पीड़ित जिन्दा हैं वह भी निशक्त जैसी जिंदगी जी रहे हैं। उन्हें अब भी बेहमई कांड फैसले के दिन का इंतजार है। हालांकि उनकी इस हालत को देखते हुए न्यायालय ने गांव में ही उनकी सुनवाई करने की बात स्वीकार कर ली है।

बेहमई कांड

बेहमई कांड की गांव में होगी सुनवाई

प्रदेश के सबसे बड़े नरसंहार यानी बेहमई काण्ड को लगभग 35 साल का वक्त गुज़र गया। बेहमई काण्ड से जुड़े अधिकांश लोग मर गए है और जो बचे है वो बिस्तर पर है। उनके हाथ पैर काम नहीं करते। आँखों से कम दिखाई देता है लिहाज़ा उन लोगों ने न्यायालय तारीख पर जाने से मना कर दिया है। जिसके बाद कोर्ट ने बेहमही गाँव में ही सुनवाई के आदेश दिए है। शायद ये इतिहास में पहली बार होगा जब न्यायालय की सुनवाई कोर्ट से बाहर किसी गाँव में होगी। यानी बेहमई काण्ड से जुड़े लोगो को अब कोर्ट नहीं जाना पड़ेगा और मामले की सुनवाई बेहमई काण्ड गाँव में ही होगी।
गौरतलब है कि 14 फरवरी 1981 को दस्यु सुंदरी फूलन देवी ने बेहमही गाँव में एक ही जाति के 20 लोगो को गोली मार कर उन सब की हत्या कर दी थी, जिसे प्रदेश का सबसे बड़ा नरसंहार कहा जाता है। जिसकी बेहमई गाँव में रहने वाले लोगों के दिलो में दहशत आज भी है। इस घटना को गुज़रे 35 साल हो गए और 35 सालों से मामला न्यायालय में चल रहा है। 40 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था जिसमे अब सिर्फ 8 लोग, पोसा, भीखा,विश्वनाथ उर्फ़ कृष्ण स्वरुप, श्याम बाबू केवट, राम सिंह जिन्दा बचे हैं। जबकि मान सिंह, विश्वनाथ उर्फ़ अशोक और राम रतन अभी फरार है। पुलिस ने अभी इनके खिलाफ चार्जशीट नहीं लगाई है।

फूलन देवी के हत्यारे को हो चुकी है सजा

फूलन देवी की हत्या हो गयी। हत्यारे को सज़ा भी हो गयी लेकिन बेहमई काण्ड का फैसला अभी तक नहीं आया। मामले से जुड़े अधिकांश लोग मर चुके है। जो लोग बचे है वो बिस्तर पर है। चलने फिरने से मोहताज हाथ पैरों ने काम करना बंद कर दिया है। आँखों से दिखाई भी कम पड़ता है और ये सब के बाद न्याय की आस लगाए इन लोगो कों 35 सालो से अगर कुछ मिला है तो वो है तारीख़। इतने सालो से कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते काटते ये लोग अब इस लायक नहीं बचे है की कही आ जा पाये और बेहमही में आज भी कही आने जाने के लिए साधन का आकाल है क्योंकि ये इलाका बीहड़ और दस्यु प्रभावित रहा है। लिहाज़ा इन लोगो ने कोर्ट में तारीख़ पड़ने पर कोर्ट जाने से मना कर् दिया। इन लोगो के वकील ने कोर्ट में याचिका दायर की है क़ि वादी पक्ष बेहमही गाँव से कोर्ट तक आने में असमर्थ है। क्योंकि बेहमई गाँव से कानपुर देहात कोर्ट का फासला तकरीबन 45 किलोमीटर है और सभी वादी बुज़ुर्ग है जो अब चल फिर भी नहीं सकते। इस याचिका को न्यायालय ने स्वीकार करते हुए ये फैसला दिया है की वादी पक्ष की सुनवाई अब बेहमई गाँव में ही होगी।

गिरफ्तारी न होना भी देरी की वजह

गौरतलब है की बेहमई काण्ड में शामिल फूलन देवी के साथ मान सिंह विश्वनाथ उर्फ़ अशोक और राम रतन भी मुख्य आरोपियों में है और अभी भी मान सिंह विश्वनाथ उर्फ़ अशोक और राम रतन फरार है। जबकि घटना के 35 साल बीत गए। हालांकि पुलिस ने डाकू मान सिंह के जालौन स्थित घर की कुड़की कर ली और राजपुर गाँव में बने घर की भी कुड़की कर ली है। लेकिन पुलिस गुज़रे 35 सालो में मान सिंह विश्वनाथ उर्फ़ अशोक और राम रतन को गिरफ्तार नहीं कर पायी है। वादी पक्ष का आरोप है की पुलिस की लापरवाही के चलते डाकू मान सिंह विश्वनाथ उर्फ़ अशोक और राम रतन अभी भी फरार है। जानकार बताते है की बेहमई काण्ड में देरी की वजह मान सिंह विश्वनाथ उर्फ़ अशोक और राम रतन का अभी तक गिरफ्तारी ना होना भी शामिल है।

पीड़ितों की सरकार ने भी नहीं सुनी

बेहमई काण्ड के चश्मदींद बताते है कि फूलन ने इसी दर पर 20 लोगों को एक लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था। गाँव में 20 मौते हुयी थी। 20 औरतें विधवा हुयी थी। क्या सरकार उन 20 विधवाओ को पेंशन नहीं दे सकती थी। अगर सरकार 100 रूपये भी पेंशन बाँध देती तो उन बेसहाराओं को सहारा मिलता। उनका कोई कमाने वाला नहीं बचा था जो उनके परिवार का पालन पोषण करता।

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